सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 855, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 855

४४ ❋ योगवाशिष्ठ ❋

प्रतीत होते हैं। वे सदा आत्मानन्द से तृप्त रहते हैं। वे अद्वैतनिष्ठ हैं; उनकी द्वैतकल्पना नहीं रही, वे सदा आत्मानन्द में स्थित हैं। ऐसे पुरुष सन्त कहाते हैं।

उन सन्तों की संगति ऐसी है, जैसे चिन्तामणि होती है; जिसके पाने से सब दुःख नष्ट हो जाते हैं। हे मुनीश्वर ! त्रिलोकीरूपी कमल के भँवरे और सब ज्ञानवानों से उत्तम तुम्हीं देख पड़े हो। तुम्हारे वचन स्निग्ध, कोमल और आत्मरस से पूर्ण, हृदयगम्य और उचित है। तुम्हारा हृदय महागम्भीर, उदार, धैर्यवान् और सदा आत्मानन्द से तृप्त है; इसलिए तुम सबसे उत्तम मुझको दीखते हो। तुम्हारे दर्शन से मेरे सब दुःख नष्ट हैं और आज मेरा जन्म सफल हुआ है। तुम जैसे सन्तों का संग आत्मपद को प्राप्त कराता है। उससे दुःख और भय नष्ट होते हैं और मनुष्य निर्भय हो जाता है।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे सन्तमाहात्म्यवर्णनं नाम सप्तदशस्सर्गः ॥ १७ ॥

भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर ! तुमने जो पूछा था कि सूर्य, वायु और जल को क्षोभ होता है तो तुमको क्षोभ क्यों नहीं होता, उसका उत्तर सुनो। जब जगत् को क्षोभ होता है, तब भी मेरा यह कल्पवृक्ष स्थिर रहता है, क्षोभ को नहीं प्राप्त होता। हे मुनीश्वर ! यह मेरा वृक्ष सब प्राणियों के लिए अगम्य है। प्राणी नष्ट होते हैं तब भी मैं सुखी रहता हूँ। जब हिरण्याक्ष द्वीपों सहित पृथ्वी को समेटकर पाताल ले गया था, तब भी मेरा वृक्ष कम्पायमान नहीं हुआ। जब देवता और दैत्यों का युद्ध हुआ, तब और सब पर्वत चलायमान हुए, पर मेरा वृक्ष स्थिर रहा। जब क्षीरसमुद्र के मथने के निमित्त विष्णुजी सुमेरु को भुजा से उखाड़ने लगे, तब भी मेरा वृक्ष कम्पायमान नहीं हुआ, तब वह मन्दराचल को ले गये और उससे क्षीरसमुद्र को मथने लगे। प्रलयकाल के पवन और मेघ को क्षोभ हुआ तब भी मेरा वृक्ष कम्पायमान नहीं हुआ। फिर एक दैत्य आकार सुमेरु को उखाड़ने लगा और उसने कुछ उखाड़ा भी, परन्तु मेरा वृक्ष कम्पायमान नहीं हुआ। हे