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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 856, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 856

* निर्वाण प्रकरण * [४५]

मुनीश्वर ! जब बड़े-बड़े उपद्रव हुए और प्रलयकाल के मेघ पवन और सूर्य तपे, तब भी मेरा वृक्ष स्थिर रहा है ।

इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे राम ! फिर मैंने उससे पूछा कि हे साधो ! जब प्रलयकाल के वायु और मेघ क्षोभ को प्राप्त होते हैं, तब तुम विगतज्वर कैसे रहते हो ? भुशुण्डिजी ने कहा, हे साधो ! जब प्रलयकाल के वायु, मेघादिक क्षोभ को प्राप्त होते हैं, तब मैं कृतघ्न की नाईं अपने आलय को त्यागकर सब क्षोभ से रहित आकाश में स्थित होता हूँ और सब अंगों को समेट लेता हूँ । जैसे वासना को रोकने से मन सकुच जाता है, वैसे ही मैं भी अङ्ग को समेट लेता हूँ। हे मुनीश्वर ! जब प्रलयकाल का सूर्य तपता है, तब मैं जल की धारणा से जलरूप हो जाता हूँ। जब वायु चलता है, तब पर्वत की धारणा बाँधकर स्थित हो जाता हूँ । जब बहुत तत्त्वों का क्षोभ होता है, तब सबको त्यागकर ब्रह्माण्ड के पार जो निर्मल परमपद है, वहाँ मैं सुषुप्ति सा अचल गम्भीर हो जाता हूँ । जब ब्रह्मा उपजकर फिर सृष्टि रचते हैं, तब मैं सुमेरु के वृक्ष पर इसी आलय में स्थित होता हूँ । फिर मैंने पूछा, हे पक्षियों के ईश्वर ! जैसे तुम अखण्ड स्थित होते हो, वैसे ही और योगीश्वर क्यों नहीं स्थित होते ? भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर ! परमात्मा की यह नीति किसी से नाँघी नहीं जाती । उन योगीश्वरों की नीति इसी प्रकार बनाई गई है और मेरी उत्पत्ति इसी प्रकार है । ईश्वर की नीति अतुल है । उसकी तुलना किसी से नहीं की जाती । जहाँ जैसी नीति बनी है वहाँ वैसी ही है; अन्यथा किसी से नहीं होती । मुझको इसी प्रकार है कि कल्प-कल्प में इसी पर्वत के वृक्ष पर मेरा आलय होता है और मैं आकर निवास करता हूँ ।

वशिष्ठजी बोले, हे पक्षियों के नायक ! तुम्हारी अत्यन्त दीर्घ आयु है । तुम ज्ञान-विज्ञान से सम्पन्न योगेश्वर हो । तुमने अनेक आश्चर्य देखे हैं । उनमें जो स्मरण हों, उन्हें कहो । भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर ! ऐसा याद आता है कि एक बार पृथ्वी पर तृण और वृक्ष ही थे और कुछ न था । फिर एक बार एकादश सहस्र वर्ष पर्यन्त भस्म ही भस्म

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