योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 91, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें६२ | योगवाशिष्ठ ।
آदिकल त्याग करके चुप हो बैठे और आप ही दैव कर जावे सो भी किये बिना नहीं होता इसमें दैव नहीं, कोई अपना पुरुषार्थ ही कल्याण-कर्ता है । हे रामजी ! जीव का किया कुछ नहीं होता और दैव ही करने-वाला होता तो शास्त्र और गुरु का उपदेश भी न होता । इससे स्पष्ट है की सन्शास्त्र के उपदेश से अपने पुरुषार्थ द्वारा इसको वाञ्छित पदवी प्राप्त होती है इसमें और जो कोई दैव शब्द है सो व्यर्थ है । इस भ्रम को त्याग करके सन्तों और शास्त्रों के अनुसार पुरुषार्थ करे तब दुःख से मुक्त होगा । हे रामजी ! और दैव कोई नहीं है इसका पुरुषार्थ जो स्पन्द है सोई दैव है, हे रामजी ! जो कोई और दैव करनेवाला होता तो जब जीव शरीर को त्यागता है और शरीर नष्ट ही जाता है-कुछ किया नहीं होती क्योंकि चेष्टा करनेवाला त्याग जाता है तब भी शरीर से चेष्टा कराता सो तो चेष्टा कुछ नहीं होती, इसमें जाना जाता है कि दैव शब्द व्यर्थ है । हे रामजी ! पुरुषार्थ की वार्ता अज्ञानी जीव को भी प्रत्यक्ष है कि अपने पुरुषार्थ बिना कुछ नहीं होता । गोपाल भी जानता है कि में गौओं को न चराऊँ तो भूखी ही रहेंगी । इसमें वह और दैव के आश्रय नहीं बैठ रहता, आप ही चराने आता है । हे रामजी ! दैव की कल्पना भ्रम से करते हैं । हमको तो दैव कोई दृष्टि नहीं आता और हाथ, पाँव, शरीर भी दैव का कोई दृष्टि नहीं आता । अपने पुरुषार्थ से ही सिद्धता दृष्टि आती है । जो कोई आकार से रहित दैव कल्पिये तो भी नहीं बनता, क्योंकि निराकार और साकार का संयोग कैसे हो । हे रामजी ! दैव कोई नहीं केवल अपना पुरुषार्थ ही दैवरूप है । जो राजा ऋद्धि-सिद्धि संयुक्त भासता है सो भी अपने पुरुषार्थ से ही हुआ है । हे रामजी ! ये जो विश्वामित्र हैं, इन्होंने दैव शब्द दूर ही से त्याग दिया है । ये भी अपने पुरुषार्थ से ही क्षत्रिय से ब्राह्मण हुए हैं और भी जो बड़े-बड़े विभूतिमान हुए हैं सो भी अपने पुरुषार्थ से ही दृष्टि आते हैं । हे रामजी ! जो दैव पढ़े बिना पण्डित करे तो जानिये दैव ने किया, पर पढ़े बिना तो पण्डित नहीं होता । जो अज्ञानी से ज्ञानवान् होते हैं सो भी अपने पुरुषार्थ से ही होते हैं । इससे दैव कोई नहीं । मिथ्या भ्रम को त्यागकर