योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 92, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ेंमुमुक्षु प्रकरण । ६३
सन्तजनों और सतशास्त्रों के अनुसार संसारसमुद्र तरने का प्रयत्न करो। तुम्हारे पुरुषार्थ बिना दैव कोई नहीं। जो और दैव होता तो बहुत बेर क्रियावाला भी अपनी क्रिया को त्याग के सो रहता कि दैव आप ही करेगा, पर ऐसे तो कोई नहीं करता। इससे अपने पुरुषार्थ बिना कुछ सिद्ध नहीं होता। जो कुछ इसका किया न होता तो पाप करने वाले नरक न जाते और पुण्य करनेवाले स्वर्ग न जाते परन्तु पाप करने-वाले नरक में जाते हैं और पुण्य करनेवाले स्वर्ग में जाते हैं; इससे जो कुछ प्राप्त होता है सो अपने पुरुषार्थ से ही होता है। हे रामजी! जो कोई ऐसा कहे कि कोई दैव करता है तो उसका शिर काटिये जो वह दैव को आश्रय जीता रहे तो जानिये कि कोई दैव है, पर सो तो जीता कोई भी नहीं। इससे दैव शब्द को मिथ्या भ्रम जानके सन्तजनों और सतशास्त्रों के अनुसार अपने पुरुषार्थ से आत्मपद में स्थित हो।
इति श्रीयोगवाशिष्टे मुमुक्षुप्रकरणे परमपुरुषार्थ- वर्णनन्नामष्टमसर्गः ॥ = ॥
इतना सुनकर रामजी ने पूछा, हे भगवन्, सर्वधर्म के वेत्ता ! आप कहते हैं कि दैव कोई नहीं परन्तु इस लोक में प्रसिद्ध है कि ब्रह्मा भी दैव है और दैव का किया सब कुछ होता है। वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! मैं तुमको इसलिए कहता हूँ कि तुम्हारा भ्रम निवृत्त हो जावे। अपने ही किये हुए शुभ अथवा अशुभकर्म का फल अवश्यमेव भोगना होता है, उसे दैव कहो वा पुरुषार्थ कहो और दैव कोई नहीं। कर्त्ता, क्रिया, कर्म आदिक में तो दैव कोई नहीं और न कोई दैव का स्थान ही है और न रूप ही है तो और दैव क्या कहिये। हे रामजी ! मूर्खों के परचाने के निमित्त दैव शब्द कहा है। जैसे आकाश शून्य है वैसे दैव भी शून्य है। फिर रामजी बोले, हे भगवन्, सर्वधर्म के वेत्ता ! तुम कहते हो कि और दैव कोई नहीं और आकाश की नाईं शून्य है सो तुम्हारे कहने से भी दैव सिद्ध होता है। तुम कहते हो कि उसके पुरुषार्थ का नाम दैव है और जगत् में भी दैव शब्द प्रसिद्ध है। वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! मैं इस-लिए तुमको कहता हूँ कि जिसमें दैव शब्द तुम्हारे हृदय से उठ जावे।