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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 958, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 958

१४८ * योगवाशिष्ठ *

रस्सी को स्पर्श नहीं कर सकता, जैसे चित्र की अग्नि कागज को जला नहीं सकती और जैसे स्वप्न के सांप जाग्रत् पुरुष को स्पर्श नहीं कर सकते, वैसे ही इन्द्रियाँ और उनके विषय आत्मा को स्पर्श नहीं कर सकते।

हे अर्जुन ! जो सत् है वह असत् नहीं होता और जो असत् है वह सत् नहीं होता। सुख-दुःखादिक असतरूप हैं और परमात्मा सतरूप है। जगत् की सत् वस्तुएँ घटादिक और आकाश की असत् फलादिक त्यागने से जो निष्किञ्चन महासत् पद शेष रहे, उसमें स्थित हो। हे अर्जुन ! ज्ञानवान् पुरुष इष्ट अनिष्ट में चलायमान नहीं होता। वह इष्ट (सुख) में हर्षित और अनिष्ट (दुःख) में शोकातुर नहीं होता। चैतन्य पाषाण सदृश शरीर में स्थित होता है। हे माधो ! यह चित्त भी जड़ है और देह इन्द्रियादिक भी जड़ हैं। आत्मा चेतन है। अपने को इनके साथ मिला हुआ देह क्यों देखना ? चित्त और देह भी आपस में भिन्न-भिन्न हैं। देह के नष्ट होने पर चित्त नहीं नष्ट होता और चित्त के नष्ट होने पर देह नहीं नष्ट होता। इनके नष्ट होने पर जो अपने को नष्ट हुआ मानता है और इनके सुखदुःख में सुखी-दुःखी होता है, वह महामूर्ख है। हे अर्जुन ! स्वरूप के प्रमाद से जो देहादिक में अहंप्रतीति करता है और अपने को भोक्ता मानता है, वह निर्बुद्धि है। जब आत्मा का बोध होता है, तब अपने को अकर्ता, अभोक्ता और अद्वैत देखता है। जैसे रस्सी के अज्ञान में सर्प देख पड़ता है और रस्सी के बोध से सर्प का अभाव होता है, वैसे ही आत्मा के अज्ञान में देह और इन्द्रियों के सुखदुःख प्रतीत होते हैं और आत्मज्ञान से सुख-दुःख का अभाव हो जाता है।

हे अर्जुन ! यह विश्व एक अज ब्रह्मस्वरूप है। न कोई जन्मता है और न मरता है—यह सत् उपदेश है। हे अर्जुन ! ब्रह्मरूपी समुद्र में तुम एक तरङ्ग उठे हो और कुछ काल रहकर फिर ऊर्मि में लीन हो जाओगे—इसमें तुम्हारा स्वरूप निरामय ब्रह्म है। सब जगत् ब्रह्म का स्पन्दन है और समय पाकर देख पड़ता है। इसमें मान, मद, शोक और सुख, दुःख सब असतरूप है। तुम शान्ति होकर रहो। हे अर्जुन ! प्रथम तो तुम