योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 959, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☀️ निर्वाण प्रकरण ☀️ १४६
ब्रह्ममय युद्ध करो और जो कुछ अक्षौहिणी सेना है, उसका अनुभव में नाश करो । यह द्वैत कुछ नहीं । सर्वदा एक ही परब्रह्म स्थित है। ब्रह्ममय युद्ध करो और सुख, दुःख, हानि, लाभ और जय, पराजय को उस युद्ध में समान मानो । ब्रह्मा से लेकर तृण पर्यन्त जो कुछ जगत् दीखता है, सो सब ब्रह्म ही है, ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं, ऐसा जानकर लाभ-हानि में सम होकर स्थित हो और कुछ चिन्ता न करो । हे अर्जुन ! जड़-शरीर में कर्म स्वाभाविक होते हैं । जैसे वायु का स्फुरण स्वाभाविक होता है, वैसे ही शरीर से कर्म स्वाभाविक होते हैं ।
हे अर्जुन ! भोजन, यजन, दान इत्यादिक जो कुछ कार्य करो, सब आत्मा ही को अर्पण करो । सदा आत्मसत्ता में स्थित रहो और सबको आत्मरूप देखो । हे अर्जुन ! जो किसी के हृदय में दृढ़ निश्चय होता है, वही रूप उसको भासित होता है । जब तुम इस प्रकार अभ्यास करोगे, तब ब्रह्मारूप हो जाओगे—इसमें संशय नहीं । हे अर्जुन ! जो आत्मा को कर्मों का अकर्ता देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान् है और सम्पूर्ण कर्मों के करते भी कुछ नहीं करता । हे अर्जुन ! कर्मों के फल की इच्छा भी न हो और कर्मों से विरमता भी न हो-योग में स्थित होकर कर्म को करो ! हे धनंजय ! कर्तृत्व के अभिमान और फल की वाञ्छा को त्यागकर कर्म करो । जो कर्मों के फल और संग को त्यागकर नित्य तृप्त हुआ है, वह करता हुआ भी कुछ नहीं करता । हे अर्जुन ! जिसने सब आरम्भों में कामना और संकल्प का त्याग किया है और ज्ञान-अग्नि में कर्म जलाये हैं, उसी को बुद्धिमान् लोग पण्डित कहते हैं । जो आत्मा में समवस्थित है और सब अर्थों में निस्पृह और निर्द्वन्द्वसत्ता में स्थित है, यथा प्राप्त में वरतता है, वह पृथ्वी का भूषण है । वह समुद्र की तरह अचल और अपने में तृप्त है । जैसे समुद्र में अनिच्छित जल प्रवेश करता है, वैसे ही ज्ञानवान् में सुख प्रवेश करते हैं । वह शान्तरूप सब कामनाओं से रहित है ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे अर्जुनोपदेशे सर्वब्रह्मप्रति- पादनं नाम त्रिपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५३ ॥