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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 960, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 960

१५० * योगवाशिष्ठ *

श्रीभगवान बोले, हे अर्जुन ! तुम देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित, अविनाशी और अजर आत्मा हो। परिणाम या विकार से रहित को अजर कहते हैं। हे अर्जुन ! तुम शोक मत करो। यह जगत तुमको अज्ञान से भासित होता है। अज्ञान अपने प्रमाद को कहते हैं और प्रमाद अनात्मा में आत्माभिमान करने का नाम है। हे अर्जुन ! यह जो संसाररूपी तुम्हारी देह है, इसमें अभिमान मत करो—यह मिथ्या है—इसमें दुःख होता है। तुम असंग और अविनाशी हो; तुम्हारा नाश कदापि नहीं होता। हे अर्जुन ! जो विनाशरूप है, उसका अस्तित्व कभी न होगा और जो सत्य है उसका अभाव न होगा। तत्त्ववेत्ताओं ने इन दोनों का निर्णय किया है। हे अर्जुन ! जिससे यह सब प्रकाशित होता है, उसको तुम अविनाशी जानो। उसका कोई विनाश नहीं कर सकता। हे अर्जुन ! तुम ऐसे हो और यह आत्मा सबका अपना है, तब उसका विनाश कैसे हो ? अज्ञानी मनुष्य उसका विनाश होता मानते हैं।

अर्जुन ने पूछा, हे भगवन् ! आप कहते हैं कि आत्मा अविनाशी है और सबका अपना है तो इन प्राणियों का नाश क्यों होता है ? श्रीभगवान बोले, हे अर्जुन ! तुम सत्य कहते हो। किसी का नाश नहीं होता, परन्तु अज्ञान से लोग अपना नाश होता मानते हैं। हे अर्जुन ! तुम आत्मवेत्ता बनो। वह आत्मा एक अद्वैत है, जिसको एक भी नहीं कह सकते। तब द्वैत कहाँ से हो ? अर्जुन बोले, हे भगवन् ! आप कहते हैं कि आत्मा एक है, तो मृत्यु भी उससे भिन्न दूसरा न हुआ और यह भी सत्य है कि लोग मर कर नरक या स्वर्ग भोगते हैं। यदि मृत्यु नहीं तो लोग मरते क्यों हैं और पाप-पुण्य का फल कैसे भोगते हैं ? श्रीभगवान बोले, हे अर्जुन ! न कोई मरता है और न जन्मता है—यह स्वप्न की तरह मिथ्या कल्पना है। जैसे स्वप्न में निद्रादोष से जन्मना और मरना जान पड़ता है, वैसे ही संसार में यह जन्म-मरण अज्ञान से दीखता है। अज्ञान स्फुरण का नाम है, उसी में नरक और स्वर्ग कल्पित हुआ है।