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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 961, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 961

* निर्वाण प्रकरण *

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हे अर्जुन ! जैसे यह जीव भोगता है, सो तुम सुनो । इस जीव ने अपने स्वरूप के प्रमाद से संकल्पमय शरीर रचे हैं । पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश में मन, बुद्धि और अहंकार में जीव प्रकट होता है । उस अंतःकरण में मिलकर जैसी वासना करता है, वैसा ही आगे भोगता है । वह वासना तीन प्रकार की है—एक सात्त्विकी, दूसरी राजसी और तीसरी तामसी । जैसी वासना होती है, वैसा ही स्वर्ग और नरक बन जाता है । सात्त्विकी वासना से स्वर्ग बन जाता है और राजसी-तामसी से नरकादिक बन जाते हैं । स्वर्ग-नरक केवल वासनामात्र हैं; वास्तव में न कोई स्वर्ग है, न नरक है; न कोई मरता है, न जन्मता है । केवल एक आत्मा ही ज्यों का त्यों स्थित है, परन्तु यह जगत् आभास भ्रम से होता है । इस जीव ने अज्ञान में चिरकाल तक वासना का अभ्यास किया है, उसी में भ्रम देखता है । अर्जुन बोले, हे जगत्पते ! यह जीव जो नरक, स्वर्गादिक योनि जगत् में देखता है, उसका कारण क्या है ? श्रीभगवान् बोले, हे अर्जुन ! अज्ञान में जो अनात्मा में आत्माभिमान हुआ है, उससे जगत् को सत् जानकर जीव वासना करने लगा है और जैसे-जैसे जगत् को सत् जानकर वासना करता है, वैसे ही वैसे जगत्-भ्रम देखता है । जब आत्मविचार उपजता है, तब जगत् को स्वप्न की तरह देखता है और वासना का भी क्षय हो जाता है । जब वासना का क्षय होता है, तब कल्याण होता है ।

फिर अर्जुन ने पूछा, हे भगवन् ! चिर अभ्यास में जो संसारभ्रम दृढ़ हो रहा है, वह किस प्रकार उपजता है और किस प्रकार लीन होगा ? श्रीभगवान् बोले, हे अर्जुन ! मूर्खता और अज्ञान में जो अनात्म देहादिक में आत्मभावना होती है, उससे जगत् को सत् जानकर जीव वासना करता है और उस वासना के अनुसार जगत्-भ्रम देखता है । पर जब स्वरूप का अभ्यास करता है, तब वासना नष्ट हो जाती है । इससे हे अर्जुन ! तुम स्वरूप का अभ्यास करो । अहं, मम आदिक वासना को त्यागकर केवल आत्मा की भावना करो । यह