योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 962, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें१५२ ✵ योगवाशिष्ट ✵
देह वासनारूप है । जब वासना निवृत्त होगी, तब देह भी लीन हो जायगी और जब देह लीन हुई तब देश, काल, क्रिया, जन्म, मरण भी न रहेंगे । ये जीव के अपने ही संकल्प से उठे हैं और भ्रमरूप हैं । उनकी वासना मे घिरा हुआ जीव भटकता है । जब आत्मबोध होता है, तब जीव वासना मे मुक्त होता है और निरालम्ब असंकल्प अविनाशी आत्मतत्त्व पाता है । उर्मी को मोक्ष कहते हैं ।
हे अर्जुन ! जब जीव को तत्त्वबोध होता है तब वासनारूपी जाल मे वह मुक्त हो जाता है और जो वासना मे मुक्त हुआ सो मुक्त हुआ । कोई पुरुष सर्वधर्म-परायण सर्वज्ञ और शास्त्रों का ज्ञाता भी हो, पर यदि वासना मे मुक्त नहीं हुआ, तो वह सब ओर से बँधा हुआ है । जैसे दृष्टि के दोष से निर्मल आकाश में मोर की पूँछ की तरह तारे भासित होते हैं, वैसे ही मूर्ख को शुद्ध आत्मा में वासनारूपी मल यह जगत् भासित होता है । जैसे पिंजड़े में पक्षी बन्द होता है, वैसे ही वह बन्धन में पड़ता है । जिसके हृदय में वासना है, वह बंधन में है और जिसके हृदय में वासना नहीं है, उसको मुक्त जानो । हे अर्जुन ! जिसके हृदय में जगत् की वासना है, वह यदि बड़ी प्रभुता में संयुक्त देख पड़े तो भी दरिद्र और दुःख का भागी है । जिसकी वासना नष्ट हुई है, वह यदि प्रभुता में रहित देख पड़े तो भी बड़ा प्रभुतासम्पन्न ऐश्वर्यशाली है ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे जीवनिर्णयो नाम चतुष्पञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५४ ॥
श्रीभगवान बोले, हे अर्जुन ! इस प्रकार तुम निर्वासनिक जीवन्मुक्त होकर विचरो, तब तुम्हारा अन्तःकरण शीतल हो जायगा । तुम जगमरण से मुक्त और निःसंग आकाश समान होगे और इष्ट-अनिष्ट को त्याग वीतराग होकर स्थित होगे । हे अर्जुन ! प्रवाह में जो कार्य आकर प्राप्त हो, उसको करो । युद्ध में कायरपन न करो । आत्मा अविनाशी और देह नाशवान् है । देह का नाश होने से आत्मा का नाश नहीं होता । हे अर्जुन ! जो जीवन्मुक्त पुरुष हैं, वे रागद्वेष से रहित होकर