योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 963, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण प्रकरण १५३
प्रवाह से प्राप्त कार्य को करते हैं। तुम भी जीवन्मुक्त स्वभाव होकर विचरो और 'यह मैं करूँ', 'यह न करूँ', इस ग्रहण-त्याग की दुविधा को त्यागो। इसी से ज्ञानवान् बन्धन को नहीं प्राप्त होते। जो मूर्ख हैं, वे इस बन्धन में बँधते हैं और जीवन्मुक्त पुरुष सुप्तवत् स्थित होकर प्रवाह प्राप्त और प्रबुद्ध की तरह वासना से रहित होकर कार्य करते हैं। जैसे कच्छप अपने अङ्ग समेट लेता है, वैसे ही ज्ञानवान् वासना को समेट लेता है और अपने को चिन्मात्ररूप जानता है। मुझमें जगत् माला के दानों की तरह पिरोया हुआ है और सब जगत् मेरा अङ्ग है। जैसे अपने हाथ पसारे और समेटे और जैसे समुद्र में तरङ्ग उठते और लीन होते हैं, वैसे ही विश्व आत्मा में उपजते और लीन होते हैं-उससे भिन्न कुछ नहीं।
हे अर्जुन ! जैसे चँदवे के ऊपर नाना प्रकार के चित्र लिखे होते हैं, परन्तु वे रङ्ग और वस्त्र से भिन्न नहीं होते, वैसे ही आत्मा में मनरूपी चितेरे ने जगत् रचा है और अनउपजा होकर भी उपजा-सा लगता है। जैसे खंभ में चितेरा कल्पना करता है कि इतनी पुतलियाँ निकलेंगी, तब आकाशरूपी पुतलियाँ उसके मन में उदय होती हैं, वैसे ही ये तीनों जगत् कालसंयुक्त चित्त में प्रकट होते हैं। चितेरा भी मूर्तियाँ तब लिखता है, जब उसके चित्त के भीतर कल्पना होती है, पर यह आश्चर्य है कि मन आकाश में चित्र बनाता है। हे अर्जुन ! यह चित्र स्पष्ट दिखता है, तो भी आकाशरूप है। जैसे स्वप्नसृष्टि आकाशरूप होती है, वैसे ही यह भी है। आकाश और भीत में भेद नहीं, परन्तु आश्चर्य है कि भेद भासित होता है। जैसे मनोरथ स्वप्नपुर में मन के स्फुरण में जगत् भासित होता है और मन के सुप्त होने से लय हो जाता है सो वह मनोमात्र है, वैसे ही यह मनोमात्र है और आकाश में भी अधिक शून्य है। जैसे स्वप्नपुर और मनोरथ में एक क्षण में बड़े काल का अनुभव होता है और पूर्वरूप के विस्मरण से वह सत्-सा जान पड़ता है, वैसे ही यह जगत् सत् प्रतीत होता है, जब तक प्रमाद होता है, तब तक प्रतीत होता है, पर जब इस क्रम से जीव आत्मरूप को देखता