योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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है, तब जगतभ्रम निवृत्त हो जाता है। यद्यपि प्रकट देख पड़ता है परन्तु लीन हो जाता है और शरत्काल के आकाश की तरह आत्मा निर्मल भासित होता है। जैसे चितेरे के मन में जो चित्र जगते हैं वे आकाश-रूप हैं, वैसे ही यह जगत् आकाशरूप है।
हे अर्जुन! भाव-अभाववृत्ति को त्यागकर स्वरूप में स्थित होओ, तब आकाशसदृश निर्मल हो जाओगे। जैसे मेघ की प्रवृत्ति और निवृत्ति में आकाश निर्मल ही रहता है, वैसे ही तुम भी पदार्थ के भाव-अभाव में निर्मल हो। जो कुछ पदार्थ दीखते हैं, वे सब आकाश-रूप हैं। जैसे चितेरे के मन में पुतलियाँ भासित होती हैं, वैसे ही यह जगत् आकाशरूप है। जैसे एक क्षण में मन के स्फुरण से नाना प्रकार के पदार्थ भासित होते हैं और गुप्त होने से लीन हो जाते हैं, वैसे ही प्रमाद से यह जगत् भासित होता है और आत्मा के जानने से लीन हो जाता है। आत्मा में जगत् निर्वाणरूप है, पर आत्मा में एक निमेष के स्फुरण द्वारा प्रमाद से वज्रसार की तरह दृढ़ स्पष्ट भासित होता है और चित्त के चेतने से सत् जान पड़ता है। यह सब जगत् आकाशरूप है—द्वैत कुछ हुआ ही नहीं, पर बड़ा आश्चर्य है कि आकाश पर लिखे हुए चित्र नानारूप रमणीय होकर भासित होते और मन को मोहते हैं। हे अर्जुन! यही आश्चर्य है कि कुछ नहीं है, पर नाना प्रकार के रङ्ग भासित होते हैं। आकाशरूपी नील सरोवर में चन्द्रमा और तारे आदि फूल खिले हैं और उनमें मेघरूपी पत्ते लगे हैं। हे अर्जुन! और आश्चर्य देखो कि चित्र भी तब होता है, जब उसका आधार भीत अथवा वस्त्र होता है। पर यहाँ चित्र प्रथम उत्पन्न होते हैं, आधार अर्थात् दीवार पीछे बनती है। प्रथम ये मूर्तियाँ और चित्र बने हैं और पीछे भीत हुई है। यही आश्चर्य है। हे अर्जुन! यह माया की प्रधानता है कि वास्तव आकाशरूप चितेरे ने आकाश में आकाशरूप पुतलियाँ रची हैं। आकाश में आकाशरूप पुतलियाँ उपजती हैं और आकाश में लीन होती हैं; आकाश ही को भोजन करती हैं। आकाश ही को आकाश देखता है, आकाश ही यह सृष्टि है और