योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें✻ निर्वाण प्रकरण ✻ २५५
आकाश का ही रूप आकाशरूप आत्मा में आकाशरूप में स्थित है।
हे अर्जुन ! वास्तव में आत्मा ऐसा है। ऐसे अद्वैतरूप आत्मा में जो उत्थान हुआ है, उस उत्थान से उसको स्वरूप का प्रमाद हुआ है, जिससे दृश्य भ्रम देख पड़ता है और अनेक वासनाएँ उत्पन्न होती हैं। वासणारूपी रस्सी से बँधा हुआ जीव भटकता है और वासना में घिरा हुआ अहं-त्व आदिक शब्दों को जानने लगता है और नाना प्रकार के भ्रम देखता है। तो भी उसका स्वरूप ज्यों का त्यों है। जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब पड़ता है और दर्पण ज्यों का त्यों रहता है; वैसे ही आत्मा में जगत् प्रतिबिम्बित होता है और आत्मा भेद-भेद से रहित है। ब्रह्म ही ब्रह्म में स्थित है। जब सब वही है, तब भेद-भेद किसका हो ? जैसे जल में तरङ्ग और बुलबुले जलरूप हैं, वैसे ही यह सब ब्रह्म ही से पूर्ण है। उसमें द्वैत कुछ नहीं। जैसे आकाश में आकाश स्थित है, वैसे ही आत्मा में आत्मा स्थित है। उसमें वास्य-वासक कल्पना कोई नहीं, परन्तु स्वरूप के प्रमाद से वास्य-वासक भेद होता है। जब स्वरूप का ज्ञान होता है, तब वासना नष्ट हो जाती है।
हे अर्जुन ! जो वासना से मुक्त है, वही मुक्त है और वासना से बँधा हुआ बन्धन में पड़ा है। यदि सब शास्त्रों का वेत्ता भी हो और सर्वधर्मों से पूर्ण हो तो भी यदि वासना से मुक्त नहीं हुआ तो बन्धन में बँधा ही है। जैसे पिंजड़े में पक्षी बंद होता है, वैसे ही वह वासना से बँधा हुआ है। हे अर्जुन ! जिसके हृदय में वासना का बीज है, वह बीज यद्यपि बाह्य नजर नहीं आता तो भी बहुत फैल जायगा। जैसे वट का बीज फैल जाता है, वैसे ही वह वासना फैल जायगी। जिस पुरुष ने आत्मचिन्तन का अभ्यास किया है और उसमे ज्ञानरूपी अग्नि उपजाकर वासना के बीज को जलाया है, उसको फिर संसार-भ्रम नहीं होता। वह न वस्तु बुद्धि से पदार्थों को ग्रहण करता है, न सुख-दुःख आदिक में डूबता है—सदा निर्लेप रहता है। जैसे तोंबी जल के ऊपर ही रहती है, वैसे ही वह सुख-दुःख के ऊपर रहता है। हे अर्जुन ! तुम शान्त आत्मा हो। तुम्हारा भ्रम अब दूर हुआ और तुम आत्मपद