योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१५६ ॐ योगवासिष्ठ ॐ
को प्राप्त हुए हो। तुम्हारे मन और मोह का निर्वाण हो गया है और तुम सम्यक्ज्ञानी हुए हो। व्यवहार करना और चुप रहना दोनों तुमको तुल्य है; क्योंकि तुम शान्तरूप और निःशब्द को प्राप्त हुए हो। यह मैं जानता हूँ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे श्रीकृष्णसंवादे अर्जुनविश्रान्तिवर्णनं नाम पञ्चपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५५ ॥
अर्जुन बोले, हे अच्युत ! मेरा मोह अब नष्ट हुआ और मुझे आत्म-स्मृति प्राप्त हुई। आपके प्रसाद से मैं अब निर्मदेत हो गया हूँ; अब जो कुछ आप कहिये, वह मैं करूँ। श्रीभगवान् बोले, हे अर्जुन ! मन की पाँच वृत्तियाँ हैं—प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, अभाव और स्मृति। जब ये पाँचों हृदय से निवृत्त हों, तब चित्त शान्त हो। उसके पीछे चेत से रहित चैतन्य जो शेष रहता है, उसको प्रत्यक् चैतन्य कहते हैं। वह वस्तुरूप, सब उपाधियों से रहित पूर्ण और सर्वरूप है। जो उस पद को प्राप्त हुआ है, उसको आधि-व्याधि आदिक दुःख नहीं हो सकते। जैसे जाल से निकलकर पक्षी आकाश को उड़ता है, वैसे ही वह देहाभिमान से मुक्त होकर आत्मपद को प्राप्त होता है। हे अर्जुन ! प्रत्यक् चैतन्य सत्ता परम प्रकाशरूप, शुद्ध और संकल्प-विकल्प से रहित है और इन्द्रियों के विषय में नहीं आती, इन्द्रियों से परे है। जो पुरुष सबसे अतीत पद को प्राप्त हुआ है, उसको वासना नहीं स्पर्श कर सकती। उसके प्राप्त होने पर ये घट-पट आदिक पदार्थ सब शून्य हो जाते हैं और वहाँ तुच्छ वासना का कुछ बल नहीं चलता। जैसे अग्नि-समूह के निकट बरफ गल जाती है और उसकी शीतलता नहीं रहती, वैसे ही शुद्ध पद का साक्षात्कार होने पर चित्त वृत्ति नष्ट हो जाती है और वासना का भी अभाव हो जाता है।
हे अर्जुन ! वासना तब तक फुरती है, जब तक मनुष्य संसार को सत्य जानता है। जब आत्मपद की प्राप्ति होती है, तब संसार और वासना का अभाव हो जाता है। इस कारण विरक्त पुरुष की सत्य जान लेने पर कुछ भी वासना नहीं रहती। नाना प्रकार के आकार और