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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 967, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 967
  • निर्वाण प्रकरण * | १५७

विकार से संयुक्त अविद्या तब तक फुरती है, जब तक शुद्ध आत्मा का अपने आप से ज्ञान नहीं होता। शुद्ध आत्मा को प्राप्त होने पर जगत-भ्रम नष्ट हो जाता है; मनुष्य स्वच्छपद आत्मतत्त्व में स्थित होता है, आकाश की तरह निर्मलभाव को प्राप्त होता है और अपने आपको सबमें पूर्ण देखता है। वह आत्मसत्ता सब आकाररूप है और सब आकार-रूपों से रहित भी है। हे अर्जुन ! जो शब्द से अतीत परमवस्तु है, उसकी किससे उपमा दी जाय ? जो वासनारूपी विषूचिका को त्याग-कर अपने आत्मस्वभाव में स्थित हुआ पृथ्वी में विचरता है, वह त्रिलोकी का नाथ है।

इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब इस प्रकार त्रिलोकी के नाथ कहेंगे, तब अर्जुन एक क्षण मौन हो जावेंगे और उसके उपरान्त कहेंगे कि हे भगवन् ! मेरे शोक नष्ट हो गये। जैसे सूर्य उदय होने पर कमल खिल जाते हैं, वैसे ही आपके वचनों से मेरा बोध खिल गया है—अब जो कुछ आपकी आज्ञा हो, वह मैं करूँ। इस प्रकार कहकर अर्जुन गाण्डीव धनुष ग्रहण करेंगे और भगवान् को सारथी करके निःसन्देह और निशङ्क होकर युद्ध करेंगे, जिसमें हाथी, घोड़े, मनुष्य मारकर लोहू के प्रवाह बहावेंगे तो भी आत्मतत्त्व में स्थित रहेंगे और स्वरूप से चलायमान न होंगे। जैसे पवन मेघ का अभाव कर देता है, वैसे ही योद्धाओं का नाश करेंगे।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे श्रीकृष्ण अर्जुनसंवादे भविष्यद् गीतानामोपाख्यानममासिनामषट्पञ्चाशत्सर्गः ॥ ५६ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ऐसी दृष्टि का आश्रय करो, जो दुःख का नाश करती है। निःसंग संन्यासी होकर अपने सब कर्म और चेष्टाओं को ब्रह्म-अर्पण करो। जिसमें यह सब है और जिससे यह सब है, ऐसी सत्ता को तुम परमात्मा जानो ! अनुभवरूप आत्मा है। उसकी भावना से मनुष्य उसी को प्राप्त होता है—इसमें संशय नहीं। जो सत्तासंवेदन से रहित चैतन्य है, उसी को तुम परमपद जानो। वह सबका परम द्रष्टारूप और सबका प्रकाशक है, महा उत्तम परमगुरु