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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 968, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 968

१५८ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

का गुरु है । जिसको शून्यवादी शून्य, विज्ञानवादी विज्ञान और ब्रह्म-वादी ब्रह्म कहते हैं, वह परमसार शान्तरूप शिव अपने आपमें स्थित है । वही आत्मा इस जगतरूपी मन्दिर को प्रकाश करनेवाला दीपक, जगतरूपी वृक्ष का रस, जगतरूपी पशु का पालनेवाला गोपाल और जीवरूपी मोतियों को एकत्र करनेवाला तागा है । हृदय और भूतरूपी मिचों में तीक्ष्णता है । निदान सब पदार्थों में पदार्थरूप सत्ता वही है । सत्य में सत्यता और असत्य में असत्यता वही है । जगतरूपी गृह में सब पदार्थों को प्रकट करनेवाला दीपक वही है और उसी से सब सिद्ध होते हैं । चन्द्रमा, सूर्य, तारे आदि जो प्रकाशरूप दीखते हैं, उनका भी वह प्रकाशक है । यह जड़ प्रकाश है और वह चैतन्य प्रकाश है, उसमें ये सिद्ध होते हैं और उसी से सब प्रकाश प्रकट हुए हैं । वह आत्मसंवित् अपने ही विचार से पाया जाता है ।

हे राम ! जो कुछ भाव-अभाव पदार्थ देख पड़ते हैं, वे असत हैं । वास्तव में कुछ हुए नहीं, प्रमाददोष से भासित होते हैं और जब ज्ञान-विवेक उपजता है, तब नष्ट हो जाते हैं । हे राम ! जिसके हृदय में अहंभाव है, उसे यह जो जगत-जाल मिथ्याभ्रम से भासित होता है, उसको उपजा क्या कहिये और किसकी आस्था कीजिये । यह जगत कुछ वस्तु नहीं । आदि, अन्त, मध्य की कल्पना से रहित जो देव है वह ब्रह्मसत्ता समान अपने आपमें स्थित है । और द्वैत कुछ नहीं बना । जब यह तुमको दृढ़ निश्चय होगा तो तुम व्यवहार करते भी हृदय से निःसंग और शान्तरूप होगे । हे राम ! जिस पुरुष की उस समान-सत्ता में स्थिति हुई है, वह इष्ट-अनिष्ट की प्राप्ति में रागद्वेष से रहित हृदय से सदा शान्तरूप रहता है । वह न उदय होता है, न अस्त होता है; सदा समभाव में स्थित रहता है । वह स्वस्वरूप अद्वैत-तत्त्व में स्थित होता है और जगत को अंग से सुषुप्त सा हो जाता है, व्यवहार भी करता है, परन्तु दर्पण के सदृश उसे क्षोभ नहीं होता । जैसे मणि सब प्रतिबिम्ब को ग्रहण करती है, परन्तु उसका संग नहीं करती, वैसे ही ज्ञानवान् पुरुष कर्मों कलना कलंक को नहीं प्राप्त होता;