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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 969, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 969

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ १५६

उसका चित्त व्यवहार में सदा निर्मल रहता है। ज्ञानवान् को जगत् आत्मा का चमत्कार भासित होता है। वह न एक है, न अनेक। आत्म-तत्त्व सदा अपने आपमें स्थित है। चित्त में जो यह चेतनभाव भासित होता है, उस चित्त के चेतने का नाम संसार है और फुरने से रहित शान्तचित्त का नाम परमपद है।

हे राम ! महा चैतन्य में जो निज का अभाव है कि मैं आत्मा को नहीं जानता, इसी का नाम चित्तस्पन्दन है और यही संसार का कारण है। जब इस भावना का क्षय हो, तब चित्त शान्त हो। हे राम ! जहाँ निजभाव होता है, वहाँ पदार्थों का अभाव होता है। वह निज सत्ता सब ठौर अपने अर्थ को सिद्ध करती है, परन्तु आत्मा में नहीं प्रवृत्त हो सकती। जब जीव कहता है कि मैं आत्मा को नहीं जानता, तब भी आत्मा का अभाव नहीं होता; क्योंकि अभाव को जाननेवाला भी आत्मा ही है। जो आत्मतत्त्व न हो तो अभाव कौन कहे। वह आत्मा परमशून्य है, परन्तु अजड़रूप परम चैतन्य है। हे राम ! तुम निज का अर्थ आत्मा में करो और आत्मा का अभाव न मानो। अनात्म में जो निज का भावत्व है, उसका अभाव करो अर्थात् अनात्म को अभावरूप मानो। जब इस प्रकार दृढ़भावना करोगे, तब संसार का भ्रम निवृत्त हो जायगा और केवल आत्मभाव शेष रहेगा।

हे राम ! चित्त के फुरने का नाम संसार है। चित्त के फुरने से ही संसारचक्र चलता है। जैसे सुवर्ण से भूषण प्रकट होते हैं, वैसे ही चित्त से त्रिपुटी होती। पर चित्तस्पन्दन भी कुछ भिन्न वस्तु नहीं, आत्मा का आभासरूप है। अज्ञान से चित्त स्पन्दन होता है और ज्ञान से लीन हो जाता है। जैसे सुवर्ण के भूषण को लगाने से भूषण-बुद्धि नहीं रहती, वैसे ही चित्त अचल होने पर चित्तसंज्ञा जाती रहती है। और जैसे भूषण के अभाव पर सुवर्ण ही रहता है वैसे ही बोध में चित्त के लीन होने पर शुद्ध चैतन्यसत्ता शेष रहती है। फिर भोगों की तृष्णा लीन हो जाती है और जब भोगभावना निवृत्त होती है, तब ज्ञान का परम लक्षण सिद्ध होता है। हे राम ! जो ज्ञानवान् पुरुष है और जिसने