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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 970, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 970

१६० * योगवाशिष्ठ *

सत्त्वरूप को जाना है, उसको भोग की इच्छा नहीं रहती ! जैसे जो पुरुष अमृतपान से अघा जाता है, उसको भाजी आदि तुच्छ भोजन की इच्छा नहीं रहती, वैसे ही आत्मज्ञान से जो संतुष्ट हुआ है, उसको विषय की तृष्णा नहीं रहती । यह निश्चय करके जानो कि जब चित्त फुरता है, तब जगत्भ्रम भासित होता है और सत्य जानकर भोग की इच्छा होती है; पर जब बोध होता है, तब जगत्भ्रम लीन हो जाता है । तब फिर तृष्णा किसकी करे । यदि इन्द्रियों के विषय प्राप्त हों और हठकर उनको न भोगे, वह मूर्ख है । वह मानों अस्त्र से आकाश को छेदता है !

हे राम ! गुरु और शास्त्रों की युक्ति से मन वश होता है; युक्ति बिना उनकी शुद्धि नहीं होती ! यदि कोई अपने अङ्गों को काटे और उससे चित्त को स्थिर किया चाहे तो भी चित्त स्थिर नहीं होता और न संसारभ्रम ही मिटता है जब तक चित्त में स्थिति है तबतक जगत्भ्रम दीखता है और जब गुरु और शास्त्रों की युक्ति ग्रहण करके चित्त का अभाव होता है, तब चित्त नष्ट और अचल हो जाता है । जैसे बालक को अन्धकार में पिशाच देख पड़ता है और दीपक जलाकर देखने से अन्धकार निवृत्त होकर पिशाचभ्रम नष्ट हो जाता है, तब बालक निर्भय होता है, वैसे ही आत्म-ज्ञानरूप युक्ति से अज्ञान निवृत्त होता है । असम्यक्बुद्धि से जगत्भ्रम हुआ है और सम्यक्बोध से निवृत्त हो जाता है; फिर जाना नहीं जाता कि अज्ञान का जगत्भ्रम कहाँ गया ? जैसे दीपक का निर्वाण होने पर नहीं जाना जाता कि प्रकाश कहाँ गया, वैसे ही अज्ञान नष्ट होने पर नहीं जाना जाता कि जगत् कहाँ गया । चित्त के फुरने से बन्धन होता है और न फुरने से मोक्ष होता है परन्तु आत्मा से भिन्न कुछ नहीं । आत्मसत्ता ज्यों की त्यों है । उसमें न बन्धन है; न मोक्ष है ।

हे राम ! जब मोक्ष की इच्छा होती है, तब भी उसकी पूर्णता का क्षय होता है और निःसंवेदन होने पर कल्याण होता है । जो अना-भान अजड़रूप परमपद है, वह चैतन्योन्मुखत्व से रहित है । हे राम ! बन्धन, मोक्ष आदिक भी कल्पना से होते हैं । जब कल्पना से रहित बोध होता है, तब बन्धन मोक्ष दोनों नहीं रहते । जब तक विचार

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