योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸
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से नहीं देखा, तब तक बन्धन और मोक्ष भासित होता है। विचार करने में दोनों का अभाव हो जाता है। जब 'अहं', 'इदं' आदिक भावना का अभाव हुआ, तब किसको कौन बन्धन कहे और किसको कौन मोक्ष कहे। सब कल्पना चित्त के फुरने से होती है। जब चित्त का फुरना नष्ट होता है, तब सब कल्पना का अभाव हो जाता है। तभी पुरुष शान्ति पाता है, अन्यथा नहीं। इससे चित्त को आत्मपद में लीन करो। जिसके आश्रय से यह जगत् उपजता और लीन होता है, उर्मी अनुपमरूप प्रत्यक् आत्मप्रकाश ज्ञानरूप आत्मा में स्थित होओ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे प्रत्यगात्मबोधवर्णनं नाम सप्तपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५७ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! परमतत्त्व परमात्मपद हमको सदा प्रत्यक्ष है, और वस्तुरूप वही है, उससे कुछ भिन्न नहीं। यह प्रत्यक् आत्मा सब सत्ता का दर्पण है; सब सत्ता उर्मी में प्रकट होती है। जैसे बीज में वृक्ष की सत्ता प्रकट होती है, वैसे ही आत्मा में जगत् सत्ता प्रकट होती है। हे राम! मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार जडात्मक हैं। परमपद इनसे रहित है। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्रादिक सब उर्मी में स्थित हैं। जैसे चक्रवर्ती राजा निर्धन से ऊँचा है, वैसे ही उस सत्ता को पाकर जीव सब लोगों से ऊँचा हो जाता है। उस आत्मा को पाकर फिर मृत्यु को नहीं प्राप्त होता। न कभी शोकवान होता है, न क्षीण। एक क्षणमात्र भी जो अप्रमादी होकर आत्मा को ज्यों का त्यों जानता है, वह संसार-कल्पना को त्यागकर मुक्त होता है। राम ने पूछा, हे भगवन्! मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार का अभाव होने पर जो सत्ता सामान्य शेष रहती है, उसका भान कैसे होता है?
वशिष्ठजी बोले, हे राम! जो सब देहों में स्थित होकर भोजन और जल-पान करता और देखना, सुनना, बोलना इत्यादि कर्म करना देख पड़ता है, वह आदि-अन्त से रहित, संवित् सत्ता, सर्वगत अपने आप में स्थित है। सब विश्वरूप वही है। आकाश में आकाश, शब्द में शब्द, स्पर्श में स्पर्श, नासिका में गन्ध, शून्य में शून्य, नेत्रों में रूप, पृथ्वी