सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 972, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 972

१६२ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

में पृथ्वी, जल में जल, तेज में तेज, वृक्षों में रस, मन में मन, बुद्धि में बुद्धि, अहंकार में अहंकार, अग्नि में अग्नि, उष्णता में उष्णता, घट में घट, पट में पट, वट में वट, स्थावर में स्थावर, जङ्गम में जङ्गम, चेतन में चेतन, जड़ में जड़, काल में काल, नाश में नाश, बालक में बालक, यौवन में युवा, वृद्धता में वृद्ध और मृत्यु में मृत्युरूप होकर वही परमेश्वर स्थित है ।

हे राम ! इस प्रकार सब पदार्थों में वह अभिन्नरूप स्थित है । नानात्व- दृष्टि भी आती है, परन्तु नाना नहीं है और भ्रम से भासित होती है । जैसे परछाहीं में भ्रम से बेताल जान पड़ता है, वैसे ही आत्मा में नानात्व भासित होता है । सबमें, सब ठौर, सब प्रकार, सब आत्मा ही स्थित है । ऐसा जो आत्मदेव सनातन है, उसमें स्थित हो । इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले कि इस प्रकार जब वशिष्ठजी ने कहा, तब दिन अस्त होने से सब सभासद् परस्पर नमस्कार करके स्नान को गये और सूर्य के निकलते ही फिर अपने-अपने आसन पर आ बैठे ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विभूतियोगोपदेशो नामाष्ट- पञ्चाशत्तमःसर्गः ॥ ५८ ॥

रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! जैसे हमारे स्वप्न में पुर, नगर और मण्डल होते हैं, वैसे ही ब्रह्मादिक ने इस देह को ग्रहण किया है । उनको असत् प्रतीति है, तब हमको दृढ़ प्रतीति कैसे उपजी है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! प्रथम ब्रह्मा को सर्ग अमन मा भासित होता है, वास्तव नहीं । सर्वगत चैतन्य संवित् संसार के दर्शन में जब सम्यक् दर्शन का अभाव हुआ और स्वप्नरूप में आपमे अहंप्रतीति उपजी, तब वह दृढ़ होकर देखने लगा । जैसे अपने स्वप्न में जगन दृढ़ भासता है और मनुष्य उसे स्वप्न नहीं जानता, वैसे ही ब्रह्मा का जगत् भी सत्य भासित होता है, स्वप्न नहीं जान पड़ता है । जो स्वप्न पुरुष में उपजा है, सो स्वप्नरूप है । हे राम ! ऐसा जो सर्ग है, वह जीव जीव प्रति उदय हुआ है । जैसे समुद्र में तरंग निकलते हैं, वैसे ही चैतन्यतत्त्व का आभास जगत् दिखता है । जैसे स्वप्नपुर में असत् पदार्थ होते हैं, वैसे