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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 973, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 973

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ १६३

ही ये पदार्थ भी अवास्तव हैं और मन के संकल्प से भ्रममात्र ही स्पष्ट भासित होते हैं। हे राम! ऐसा पदार्थ कोई नहीं, जो इस जगत में सिद्ध नहीं होता, और का और नहीं भासित होता और मर्यादा नहीं त्यागता; क्योंकि सब पदार्थ मन के संकल्प से उपजे हैं।

तुम देखो कि जल में अग्नि स्थित है—जैसे समुद्र में बड़वाग्नि है, सो विपर्यय है। इसी कारण कहता हूँ कि सब मनोमात्र है। और देखो, आकाश में नगर बसते हैं, विमान प्रत्यक्ष चलते हैं और चिन्तामणि आदि से कमल उपजते हैं—जैसे हिमालय पर्वत में बर्फ और सब ऋतु के फूल एक ही समय उपजते हैं; जैसे संकल्प के कल्पित वृक्ष से पत्थर निकल आते हैं; शिला में जल निकलता है; चन्द्रकान्तमणि में अमृत द्रवित होता है और निमेष में घट पट और पट घट हो जाते हैं। निदान स्वरूप के विस्मरण में जीव सत् को असत् देखता है; जैसे स्वप्न में अपना मरना देखता है; जल ऊपर को चलना देखता है; मेघ होकर स्वर्ग में गंगा बहती देखता है और पत्थर उड़ते देखता है; जैसे पंखों-वाले पहाड़ उड़ते हैं और चिन्तामणि शिलारूप में सब पदार्थ उपजते हैं। इत्यादि बातें भ्रम से नानात्व विपर्ययरूप ही दिखती हैं। इनमें तुम देखो कि सब मनोमात्र हैं, और से और हो जाते हैं। हे राम! यह इन्द्रजाल, गन्धर्व-नगर और शाम्बरी माया के सदृश है। असत् ही भ्रम से सतरूप में भासित होता है। ऐसा पदार्थ कोई नहीं है, जो सत नहीं और असत भी नहीं।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जाग्रत्स्वप्न विचारोनामै-कोनषष्टितमसर्गः ॥ ५६ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह संसार मिथ्या है। जो पुरुष इसको सत्य जानता है, वह महामूर्ख है और भ्रम में भ्रम देखकर महामोह को प्राप्त होता है। जैसे कोई मृग गढ़े में गिर पड़ता है तो दुःखी होता है और फिर उससे भी बड़े गढ़े में गिरता है तो अति दुःख पाता है; वैसे ही जो मूर्ख पुरुष है, वह आत्मा के अज्ञान से संसाररूपी गढ़े में गिरता है और उसमें अनेक भ्रम देखता है; एक स्वप्न के बाद दूसरा स्वप्न