योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ १६३
ही ये पदार्थ भी अवास्तव हैं और मन के संकल्प से भ्रममात्र ही स्पष्ट भासित होते हैं। हे राम! ऐसा पदार्थ कोई नहीं, जो इस जगत में सिद्ध नहीं होता, और का और नहीं भासित होता और मर्यादा नहीं त्यागता; क्योंकि सब पदार्थ मन के संकल्प से उपजे हैं।
तुम देखो कि जल में अग्नि स्थित है—जैसे समुद्र में बड़वाग्नि है, सो विपर्यय है। इसी कारण कहता हूँ कि सब मनोमात्र है। और देखो, आकाश में नगर बसते हैं, विमान प्रत्यक्ष चलते हैं और चिन्तामणि आदि से कमल उपजते हैं—जैसे हिमालय पर्वत में बर्फ और सब ऋतु के फूल एक ही समय उपजते हैं; जैसे संकल्प के कल्पित वृक्ष से पत्थर निकल आते हैं; शिला में जल निकलता है; चन्द्रकान्तमणि में अमृत द्रवित होता है और निमेष में घट पट और पट घट हो जाते हैं। निदान स्वरूप के विस्मरण में जीव सत् को असत् देखता है; जैसे स्वप्न में अपना मरना देखता है; जल ऊपर को चलना देखता है; मेघ होकर स्वर्ग में गंगा बहती देखता है और पत्थर उड़ते देखता है; जैसे पंखों-वाले पहाड़ उड़ते हैं और चिन्तामणि शिलारूप में सब पदार्थ उपजते हैं। इत्यादि बातें भ्रम से नानात्व विपर्ययरूप ही दिखती हैं। इनमें तुम देखो कि सब मनोमात्र हैं, और से और हो जाते हैं। हे राम! यह इन्द्रजाल, गन्धर्व-नगर और शाम्बरी माया के सदृश है। असत् ही भ्रम से सतरूप में भासित होता है। ऐसा पदार्थ कोई नहीं है, जो सत नहीं और असत भी नहीं।
इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जाग्रत्स्वप्न विचारोनामै-कोनषष्टितमसर्गः ॥ ५६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह संसार मिथ्या है। जो पुरुष इसको सत्य जानता है, वह महामूर्ख है और भ्रम में भ्रम देखकर महामोह को प्राप्त होता है। जैसे कोई मृग गढ़े में गिर पड़ता है तो दुःखी होता है और फिर उससे भी बड़े गढ़े में गिरता है तो अति दुःख पाता है; वैसे ही जो मूर्ख पुरुष है, वह आत्मा के अज्ञान से संसाररूपी गढ़े में गिरता है और उसमें अनेक भ्रम देखता है; एक स्वप्न के बाद दूसरा स्वप्न
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दखता है। इस विषय का एक इतिहास कहता हूँ, उसमें मन लगाकर सुनो। एक मननशील संन्यासी योग के आठवें अङ्ग 'समाधि' में स्थित था। उसका हृदय समाधि करते-करते शुद्ध हो गया था। वह समाधि में दिन बिताता और जब समाधि खुलती तो फिर आसन लगाकर समाधि में लग जाता था। इसी प्रकार जब बहुत काल बीता तो एक समय समाधि खुलने पर वह एक चिन्तन करने लगा कि जैसे साधारण पुरुष विचरते और चेष्टा करते हैं, वैसे ही मैं भी कुछ चेष्टा रचूँ। ऐसा विचार कर उसने मन के संकल्प से विश्व की कल्पना की और उसमें आप भी एक बना। उसका नाम धीवर हुआ। निदान वह मद्यपान करता और ब्राह्मणों की सेवा भी करता। चेष्टा करते-करते वह सो गया। स्वप्न में उसको ब्राह्मण के शरीर का भान हुआ तो वह उस ब्राह्मण शरीर में वेद का अध्ययन और पाठ करने लगा। ऐसी चेष्टा में जब उसे चिरकाल बीता तो फिर स्वप्न हुआ। उसमें उसने अपने को बड़ी सेना से युक्त राजा देखा और उस सेना के साथ वह राजा होकर विचरने लगा।
कुछ काल जब इसी प्रकार व्यतीत हुआ तो फिर स्वप्न हुआ और उस स्वप्न में उसने अपने को चक्रवर्ती राजा देखा। वह चक्रवर्ती होकर सारी पृथ्वी पर आज्ञा चलाने लगा। जब कुछ काल बीता तो फिर अपने को देवाङ्गना के रूप में देखा। वह देवता के साथ बाग में विचरने लगी और जैसे बेल वृक्ष के साथ शोभा पाती है, वैसे ही वह देवता के साथ शोभा पाने लगी। इसी प्रकार जब कुछ काल देवता के साथ बीता तो फिर स्वप्न हुआ और उसमें उसने अपने को हरिणी देखा और वन में चरने लगा। कुछ काल ऐसे भी व्यतीत हुआ तो फिर स्वप्न हुआ और उसने अपने को देवताओं के बाग की बेल देखा। जब ऐसे कुछ समय बीता तो फिर स्वप्न में अपने को भँवरी देखा और सुगन्ध को ग्रहण करने लगा। उसके अनन्तर फिर उसने स्वप्न में देखा कि मैं कमलिनी हूँ। वहाँ एक दिन हाथी आकर बेल को खा गया। जैसे कोई मूर्ख बालक भली वस्तु को भी तोड़ डालता है, वैसे ही वह
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मूर्ख हाथी बेल तोड़कर खा गया । उसके उपरान्त उस बेल ने हाथी का शरीर पाकर बड़ा दुःख पाया और गड्ढे में गिरा । थोड़े समय के उपरान्त हाथी को स्वप्न हुआ और वह भँवरी होकर कमलों में विचरने लगा । जब कुछ काल बीता तो फिर वह बेल हुआ और उस बेल के निकट एक हाथी आया और उस हाथी के पाँवों में वह बेल चूर्ण हो गई । तब उस बेल को एक हंस ने खाया । तब वह बेल हंस होकर बड़े मानसरोवर में विचरने लगी । फिर उस हंस के मन में आया कि मैं ब्रह्मा का हंस होऊँ । तब वह अपने संकल्प से ब्रह्मा का हंस बन गया जैसे जल का तरङ्ग बन जावै । तब ब्रह्मा के उपदेश से हंस को आत्मज्ञान प्राप्त हुआ ।
हे राम ! अज्ञान से ऐसे भ्रम में पड़कर फिर ज्ञान से वह भ्रम शान्त हुआ । फिर विदेह और मुक्त वह होगा । वह हंस सुमेरुपर्वत में उड़ा जाता था । तब उसके मन में आया कि मैं रुद्र होऊँ । इसलिए मन संकल्प से रुद्र हो गया । जैसे शुद्ध दर्पण में शीघ्र ही प्रतिबिम्ब पड़ता है, वैसे ही शुद्ध अन्तःकरण के संकल्प से तुरन्त वह रुद्र हो गया । जिसको अनुत्तर ज्ञान हो, उसको रुद्र कहते हैं और अनुत्तर ज्ञान वह है जिसके पाने से और कुछ पाने को नहीं रह जाता । ध्यान से अपने को देख उस रुद्र के मन में विचार हुआ कि बड़ा आश्चर्य है कि मैं अज्ञान से इतने बड़े भ्रम को प्राप्त हुआ था । बड़ी आश्चर्यमयी माया है । मैं तो एक ओर पड़ा हूँ और यह विश्व मेरा स्वरूप है । पूर्व कल्पित जो मेरे शरीर हैं, उनको अब जाकर जगाऊँ । तब रुद्र उठ खड़ा हुआ और अपने स्थान को चला । प्रथम संन्यासी के शरीर को आकर देखा और चित्तशक्ति से उसे जगाया तो संन्यासी के शरीर में ज्ञान हुआ कि सबमें मैं ही स्थित हूँ । परन्तु संन्यासी ने जाना कि मुझको रुद्र ने जगाया है और इतने शरीर मेरे और भी हैं । फिर वहाँ से वह रुद्र और संन्यासी दोनों चले और झींवर के स्थान में आये तो देखा कि झींवर शव की नाईं पड़ा है; मदिरा के बर्तन पड़े हैं, चेतना भी वहीं भ्रमती है और नाना प्रकार के स्थान देखती है-जैसे भग्ने के छिद्र में चींटी
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अमर्त्ता है । तब उन्होंने धीवर को चित्तशक्ति में जगाया और वह उठ खड़ा हुआ । तो उसको ऐसा स्मरण हुआ कि मुझे तो इन्होंने जगाया ।
फिर धीवर के मन में विचार हुआ कि इतने शरीर मेरे और भी हैं । निदान रुद्र, संन्यासी और धीवर तीनों चले । इन्होंने विचार किया कि हमने इतने शरीर क्योंकर पाये ? आदि में तो मैं एक परमात्मा में चैतन्यान्मुख होकर संन्यासी हुआ । फिर संन्यासी धीवर हुआ और मद्यपान करने लगा । फिर ब्राह्मण होकर वेद का पाठ करने लगा और उसके पुण्य से राजा का शरीर धारण किया । उसके बाद जो बड़ा पुण्य प्राप्त हुआ, उससे चक्रवर्ती राजा हुआ । चक्रवर्ती राजा के शरीर में काम बहुत हुआ, उससे देवता की स्त्री हुआ । स्त्री के शरीर में नेत्रों में बहुत प्रीति थी, उससे हरिणी हुआ। फिर भँवरी हुआ। उसके बाद बेल हुआ और इसके बाद जो शरीर धारण किये सो मिथ्या धारण किये और अज्ञान में बहुत काल भटकता रहा । अनेक वर्ष और सहस्रों युग व्यतीत हो गये हैं । संन्यासी से लेकर रुद्र पर्यन्त वासना के कारण जन्म पाये हैं । इतने जन्म पाकर ब्रह्मा का हंस हुआ । तब वहाँ ज्ञान की प्राप्ति हुई, क्योंकि पूर्व में अभ्यास किया था, उससे अकस्मात सत्संग प्राप्त हुआ । ऐसा विचार करके वे वहाँ से चले और चैतन्य आकाश में उड़कर वेदपाठ करनेवाले ब्राह्मण की सृष्टि में गये तो उसको देखा कि मरा-सा पड़ा है । चित्तशक्ति में उन्होंने उसको जगाकर रुद्र, संन्यासी, मद्यपान करनेवाला धीवर और ब्राह्मण, चारों वहाँ से चले और चिदाकाश में उड़कर राजा की सृष्टि में पहुँचे तो देखा कि राजा की देह चेष्टा करती है । राजा, जिसकी देह सुवर्ण की नाईं शोभायमान है, अपने मन्दिर में रानी समेत शय्या पर सोये हैं और सहेलियाँ चँवर डुला रही हैं । तब उन्होंने राजा की चित्तशक्ति में जगाया । उसने देखा कि सब विश्व मेरा ही स्वरूप है और इतने शरीर मैंने अज्ञान में धारण किये हैं । निदान रुद्र, संन्यासी मद्यपान करनेवाला धीवर, ब्राह्मण और राजा वहाँ से चले और हाथी आदि जितने शरीर धारण किये थे, उन सबको जगाया । उनमें यही
✻ निर्वाण प्रकरण ✻ १६७
निश्चय हुआ कि हम चिन्मात्ररूप और आवरण से रहित हैं अर्थात अज्ञान के स्फुरण से रहित हैं।
हे राम ! तब उनके शरीर अलग-अलग देख पड़े, परन्तु चेष्टा भिन्न-भिन्न और निश्चय सबका एक हुआ। उनका नाम शतरुद्र हुआ। हे राम ! सम्पूर्ण विश्व अज्ञान के विकार से होता है, ज्ञान में देखिये तो कुछ नहीं। ऐसे ही उनका संवेदन और निश्चय एकसा हुआ। एक देखे तो जाने कि सब ही मेरे रूप हैं और जब दूसरा देखे तो विचारे कि सब मेरे ही रूप हैं। जैसे समुद्र से जो अनेक तरङ्ग उठते हैं, उनके आकार भिन्न-भिन्न होते हैं और स्वरूप एक-सा ही होता है, वैसे ही ज्ञानवान् पुरुष सारे विश्व को अपना ही स्वरूप देखते हैं और अज्ञानी उनको भिन्न-भिन्न और अपने को उनसे भिन्न जानते हैं। एक को दूसरा नहीं जानता और दूसरे को पहला नहीं जानता। हे राम ! यह विश्व अपना ही स्वरूप है, पर अज्ञान से भिन्न जान पड़ता है। चिन्मात्र में फुरने को अज्ञान कहते हैं। चित्त के चेतने से संसार होता है और न फुरने से वह आत्मस्वरूप ही है। इससे हे राम ! वासना का त्याग करो और कुछ नहीं, जिस प्रकार शत्रु मरे उस प्रकार मारिये—यहाँ यत्न करो। अब मैं तुमसे ऐसा उपाय कहता हूँ, जिसमें कुछ यत्न नहीं और शत्रु भी मारा जायगा। हे राम ! यह चिन्तना ही दुःख है और चिन्तना से रहित होना ही सुख है—आगे जो तुम्हारी इच्छा हो सो करो। इस चित्त के चिन्तन से संसार है और निवृत्त होने में स्वरूप-बोध। जैसे पत्थर में पुरुष पुतलियों की कल्पना करता है तो उसमें पत्थर से भिन्न पुतलियों का अभाव है, वैसे ही चित्त ने विश्व की कल्पना की है। जब चित्त निवृत्त हो, तब विश्व अपना ही स्वरूप है; भिन्न नहीं। चित्त से जहाँ जाता है वहाँ पञ्चभूत ही देख पड़ते हैं, आत्मा नहीं देख पड़ता। और चित्त से रहित ज्ञानी जहाँ जाता है वहाँ आत्मा ही दीखता है। जब चित्त की वृत्ति बहिर्मुख होती है, तब संसार होता है और पञ्चभूत ही दृष्टिगोचर होते हैं और जब चित्त की वृत्ति अन्तर्मुख होती है, तब अपना ज्ञानरूप आप ही भासित होता
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❇ योगवाशिष्ठ ❇
है । ये सब पदार्थ ज्ञानरूप आत्मा बिना सिद्ध नहीं होते । प्रथम आपको जानना है तो और पदार्थ जाने जाते हैं । इसी से ज्ञानवान् सब अपना आप जानता है ।
हे राम ! ये जो कुछ पदार्थ हैं, सो चिन्तन मे हैं । और जितने जीव हैं उनकी संवेदना भिन्न-भिन्न है । संवेदना में अपनी-अपनी सृष्टि है । जैसे किसी सोये हुए पुरुष को अपने स्वप्न की सृष्टि भासित होती है और जो उसके पास बैठा होता है उसको नहीं भासित होती, क्योंकि उसकी दृष्टि विश्व-स्वप्न को नहीं जानती, वैसे ही जो ज्ञानी है, उसको अपना रूप आप ही भासित होता है और इस सब जगत् का वह अपना ही रूप जानता है । अज्ञानी जिस ओर देखता है, उसी ओर पञ्चभूत दृष्टिगोचर होते हैं । जैसे पृथ्वी को खोदने से आकाश ही देख पड़ता है, वैसे ही ज्ञानी चित्तरहित जहाँ देखता है, वहाँ पञ्चभूत ही दृष्टि आते हैं । इससे हे राम ! तुम कामना से रहित हो । कामना ही से बन्धन है और कामना वासना न रहना ही मोक्ष है । आगे जैसी तुम्हारी इच्छा हो वैसा करो । हे राम ! जो न चेतने में अस्त हो जाय, उसके नाश में कृपणता क्या करना है । जो वासना-विनाश से प्राप्त हो, उसको प्राप्त रूप जानो । राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! ये स्वप्न में धीवर और ब्राह्मण से लेकर अनेक रूपी संन्यासी के हुए, फिर उनके उपगन्त क्या हुआ ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ब्राह्मण आदि जितने शरीर थे, वे रुद्र के जगाने पर सुखी हुए । जब सब इकट्ठे हुए, तब रुद्र ने उनसे कहा, हे साधो ! तुम अपने-अपने स्थान को जाओ और कुछ काल अपने पुत्र-कलत्र के साथ भोग भोगो । तब तुम मेरे गण होकर मुझको प्राप्त होगे और महाकल्प में हम सभी विदेहमुक्त होंगे ।
हे राम ! जब रुद्र ने ऐसे कहा, तब सब अपने-अपने स्थान को गये । रुद्र भी अन्तर्धान हो गये । वे अब भी नागों का आकार धारण किये कभी-कभी हमको आकाश में दृष्टिगोचर होते हैं । राम ने पूछा, हे भगवन् ! आपने कहा कि संन्यासी ने धीवर आदि सब शरीर
☸ निर्वाण प्रकरण ☸
धारण किये सो वे सत् कैसे हुए और उनकी सृष्टि कैसे सत हुई ?
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! आत्मा सर्वव्यापक, शुद्ध, चैतन्य आकाश और अनुभवरूप है। उसमें जैसे देशकाल और वस्तु का निश्चय होता है, वैसा ही वह बन जाता है। जैसा-जैसा-स्फुरित होता है, वैसा ही वैसा आगे होना है। जिसका मन शुद्ध होता है, उसका मन संकल्प होता है और वह जैसा संकल्प करता है, वैसा ही होता है। जो तुम कहो कि संन्यासी का अन्तःकरण शुद्ध था, उसने नीच-ऊँच जन्म कैसे पाये ? अर्थात मद्यपान करनेवाला, भँवेरी, बेल आदि नीच और ऊँच अर्थात ब्राह्मण, राजा आदि ऐसे जन्म शुद्ध अन्तःकरण में न चाहिये, तो इसका उत्तर यह है कि संवेदन में जैसी भावना उठती है, वैसा ही होता देख पड़ता है। जैसे एक पुरुष का अन्तःकरण शुद्ध हो और उसके मन में आवे कि मेरा एक शरीर विद्याधर का और एक शरीर भेड़ का हो तो उसके भले और बुरे दोनों ही शरीर हो जाते हैं। जो तुम कहो कि बुरा क्यों बना, भला ही बनता तो इसका उत्तर सुनो। देखो, किसी भले पण्डित के घर पुत्र होता है; वह यदि संस्कार अर्थात वासना से चोर हो जाय तो पिता को दुःख होता है। इससे हे राम ! सब वासना ही से ऊँच-नीच होते हैं। जब अभ्यास और परमयोग होता है, तब जीव शुद्ध होता है। अभ्यास, मन्त्र, जप और चित्त के स्थित करने को योग कहते हैं। इससे जैसी चिन्तना होती है, वैसी ही सिद्धि होती है, और अज्ञानी को नहीं होती। जैसे वस्तु निकट पड़ी है और भावना नहीं तो दूर है, वैसे ही अज्ञानी की भावना नहीं तो न दूरवाली वस्तु प्राप्त होती है और न निकटवाली। वह सिद्ध इस-लिए नहीं होती कि उसकी भावना दृढ़ नहीं और हृदय भी शुद्ध नहीं। संकल्प भी तब सिद्ध होता है, जब हृदय शुद्ध होता है। शुद्ध हृदयवाला जिसकी चिन्तना करता है वह चाहे दूर हो तो भी सिद्ध होता है, और जो निकट है, वह भी सिद्ध होता है। जो तुम कहो कि संन्यासी तो एक था, बहुत चैतन्य शरीर कैसे हुए तो इसका उत्तर सुनो। जो कोई योगीश्वर और योगिनी देवियाँ हैं उनका संकल्प
१७० ❊ योगवाशिष्ठ ❊
सत्य है। उनके जैसा संकल्प उठता है, वैसा ही होता है। ऐसे मन संकल्पवाले मैंने अनेक देखे हैं।
एक राजा सहस्रबाहु अर्जुन था। वह अपने घर में बैठा था और उसके सिर पर छत्र झूलता और चँवर होते थे। उसके मन में संकल्प हुआ कि मैं मेघ होकर बरसूँ। उस संकल्प के करने से उसका एक शरीर तो राजा का रहा और एक शरीर से वह मेघ होकर बरसने लगा। विष्णु भगवान् एक शरीर से तो क्षीरसमुद्र में शयन करते हैं और प्रजा की रक्षा के निमित्त और शरीर भी रख लेते हैं, जो अवतार कहलाते हैं। यज्ञदेवियाँ अपने-अपने स्थानों में होती हैं और बड़े ऐश्वर्य में विचरती हैं। इन्द्र एक शरीर से स्वर्ग में रहता है और दूसरे शरीर से जगत में भी उपस्थित रहता है। योगेश्वरों का जैसा संकल्प होता है, वैसा ही सिद्ध होता है। और जो अज्ञानी मूर्ख हैं उनके मन में बड़ा भ्रम होता है और वे बड़े मोह को प्राप्त होकर मोह में नीच गति पाते हैं। जैसे बड़े पर्वत के ऊपर से पत्थर गिरता है तो वह नीचे को जाता है, वैसे ही मूर्ख आत्मपद से गिरकर संसाररूपी गढ़े में गिरते और बड़े दुःख पाते हैं। रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! आपने कहा कि संसार स्वप्नमात्र है सो मैंने जाना कि अनन्त मोहरूपी विषमता है और आत्मचैतन्यरूप आनन्द के प्रमाद से जीव अपने को जड़ और दुःखी जानता है। यह बड़ा आश्चर्य है। हे भगवन् ! यह जो आपने संन्यासी का वृत्तांत कहा, उसके समान कोई और भी है अथवा नहीं सो कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! संसाररूपी मढ़ी में मैं रात्रि के समय समाधि करके देखूँगा और तुमसे प्रभात को जैसा होगा, वैसा कहूँगा।
इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले, हे राजन् ! वशिष्ठजी ने जब यह कहा, तब मध्याह्न का समय था। नौबत-नगाड़े बजने लगे, जिनका प्रलयकाल के मेघ का सा शब्द होने लगा। वशिष्ठजी के चरणों पर राजा और देवताओं ने फूल चढ़ाये और सबने बड़ी पूजा की। जैसे बड़ा पवन चलता है और उसके वेग से बाग में वृक्षों के फूल पृथ्वी
⚙️ निर्वाण प्रकरण १७१
पर गिर पड़ते हैं, वैसे ही सबने बहुत फूलों की वर्षा की । इस प्रकार प्रथम तो बहुत पूजा होती रही, फिर वशिष्ठजी, को नमस्कार करके सब उठ खड़े हुए और आपस में नमस्कार किया । फिर जैसे मन्दराचल पर्वत में सूर्य उदय होता है, वैसे ही वशिष्ठजी आदि ऋषि और राजा दशरथ आदि सब राजा उठे । तब पृथ्वी के राजा और प्रजा पृथ्वी पर अपने स्थान को चले और आकाश के सिद्ध और देवता आकाश को चले । सब अपने-अपने कामों में जा लगे और जैसा शास्त्रोक्त व्यवहार है उसे करने लगे । जब रात्रि हुई, तब विचार करते रहे कि वशिष्ठजी ने कैसे ज्ञान उपदेश किया है और उस विचार में उनकी रात्रि एक क्षण की तरह बीत गई । इतने में सूर्य की किरणें निकलते ही राम-लक्ष्मण आदि सब आये और परस्पर नमस्कार कर अपने-अपने आसन पर शान्तरूप होकर बैठे, जैसे पवन न चलने पर कमल स्थिर होते हैं ।
तब वशिष्ठजी ने अनुग्रह करके आप ही कहा, हे राम ! तुम्हारी प्रीति के लिए मैंने संसार में बहुत खोजा और आकाश, पाताल और सप्तद्वीप सब ढूँढ़ डाले; परन्तु ऐसा कोई संन्यासी न देखा और न अन्य किसी का संकल्प उसका जैसा भासित होता है । जब एक पहर रात्रि रही तब मैंने फिर ढूँढ़कर उत्तर दिशा में एक प्राचीन चिन्माचीन नाम के नगर में एक मढ़ी देखी । उसके दरवाजे भीतर से बंद थे । उसमें पके बालोंवाला एक संन्यासी बैठा था । बाहर उसके चेले बैठे थे । वे इस डर से दरवाजा नहीं खोलते थे कि कहीं ऐसा न हो कि हमारे गुरु की समाधि खुल जाय । वह मुनि उस स्थान में दूसरे ब्रह्मा के समान बैठा है । उसको बैठे अभी इक्कीस दिन हुए हैं, पर उसको समाधि में सहस्र वर्षों का अनुभव हुआ है और उसने बहुत जन्म भी पाये हैं, जो उसको प्रत्यक्ष भासित हुए हैं । उसने सृष्टि भी प्रत्यक्ष देखी है और उसमें विचरा है । हे राम ! इसका सा एक और मुनि भी पूर्व कल्प में था । इतना सुन राजा दशरथ ने कहा, हे महामुनीश्वर ! जो आप आज्ञा दें तो मैं अपना अनुचर चिन्माचीन नगर में भेजूँ कि वह वहाँ जाकर उस संन्यासी को जगावे ।
१७२ ❖ योगवाशिष्ठ ❖
वशिष्ठजी ने कहा, हे राजन्! वह संन्यासी अब ब्रह्मा का हंस होकर ब्रह्मा के उपदेश से जीवन्मुक्त हुआ है और यह शरीर उसका अब मृतक हुआ है। अब उसमें पुर्यष्टका अर्थात् जीव नहीं है। अब उसको क्या जगाना है? एक महीने पीछे शिष्य उसका दरवाजा खोलेंगे तो उस नगर के लोग देखेंगे कि वह मृतक पड़ा है। इससे हे राम! यह विश्व संकल्पमात्र ही है। और जो तुम कहो कि एक से बहुत क्योंकर हुए तो सुनो, ये मुनीश्वर, ऋषि, राजा आदि जो लोग हैं, वे अनेक बार एकसा शरीर धारण करते हैं। कभी कई बार कुछ सदृश और कुछ असदृश धारण करते हैं, कभी थोड़ा मिलता हुआ शरीर धारण करते हैं। और अनेक बार पहले से बिल्कुल न मिलता हुआ विलक्षण शरीर धारण करते हैं। इन नारदजी के समान और भी नारद होंगे। उनकी चेष्टा भी ऐसी ही होगी और शरीर भी ऐसा ही होगा। व्यास, शुकदेव, भृगु, भृगु के पिता जनक, कर्कश ऋषीश्वर अत्रि और अत्रि की स्त्री भी जैसी कि अब है वैसी ही होगी। जैसे समुद्र में तरङ्ग एक से और न्यून या अधिक भी होते हैं, वैसे ही यह संसार ब्रह्मलोक से लेकर पाताल तक सब मन का रचा हुआ है और सब मिथ्या है। जब यह चित्तकला बहिर्मुख होती है, तब संसार और देश काल होता है। और जब अन्तर्मुख होती है, तब आत्मपद प्राप्त होता है। जब तक बहिर्मुख होती है, तब तक दुःख प्राप्त होता है। अपना स्वरूप आनन्दरूप है। उसमें चित्तकला जानती है कि मैं सदा दुःखी हूँ। देह और इन्द्रियों से मिलकर जीव दुःखी होता है। इससे हे राम! इस अज्ञानरूप वासना से तुम रहित बनो। वासना से यह अवस्था प्राप्त होती है। जैसे चन्द्रमा अमृत से पूर्ण है और उसमें चर्मदृष्टि से कलङ्क देख पड़ता है, वैसे ही अमृतमय चन्द्रमारूप आत्मा में अज्ञानदृष्टि से जन्म, मरण, शोक, दुःख भय आदि कलङ्क दीखते हैं। यह माया महा आश्चर्य रूप है। जैसे चन्द्रमा एक है और नेत्रदोष से बहुत चन्द्रमा भासित होते हैं, वैसे ही एक अद्वैत आत्मा में नानात्वरूप विश्व का भान अज्ञान से होता है। यही माया है।
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ १७३
हे राम ! तुम एकरूप आत्मा हो । उसमें फुरने मे विश्व कल्पित हुआ है । इसमें वासना मे रहित हुए बिना आत्मा का दर्शन नहीं होता । जैसे उदय हुआ सूर्य भी बादल के होते शुद्ध नहीं दिखता, वैसे ही स्फुरणरूपी बादल के दूर होने पर ही आत्मरूपी सूर्य शुद्ध भासित होता है और दृश्य, दर्शन, द्रष्टा फुरने मे ही कल्पित हुए हैं । हे राम ! इस संसार का सार जो आत्मा है, जिसमें सुषुप्त की तरह मौन हो रहो ।
रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! मैं तीन मौन जानता हूँ—एक वाणी का मौन अर्थात् चुप रहना; दूसरा इन्द्रियों का मौन और तीसरा काष्ठ-मौन अर्थात् हठ करके मन और इन्द्रियों को वश करना । सुषुप्त मौन मैं नहीं जानता । आप बताइए ।
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ये तीनों काष्ठ-मौन तपस्वियों के हैं और सुषुप्त मौन ज्ञानी और जीवन्मुक्त का है । वे तीनों मौन जो तुमने कहे, सो अज्ञानी तपस्वियों के हैं । उनको फिर सुनो । एक वाणी का मौन कि बोलना नहीं, दूसरा मौन समाधि कि नेत्रों का मूँद लेना और कुछ न देखना और तीसरा हठकर स्थित होना और मन और इन्द्रियों को स्थिर करना । एक मौन इन्द्रियों की चेष्टा मे रहित होना है । अब ज्ञानी का सुषुप्त मौन सुनो । वाणी और इन्द्रियों से चेष्टा करना, पर आत्मा मे भिन्न और कुछ न भासित होना, अथवा ऐसे होना कि न मैं हूँ, न जगत् है, अथवा ऐसे होना कि सब मैं ही हूँ । ऐसे निश्चय में स्थित होना बड़ा उत्तम मौन है ।
हे राम ! आत्मा की सिद्धि विधि से भी होती है और निषेध से भी । उस आत्मा में स्थित होना बड़ा मौन है । हे राम ! यह जो मैंने सुषुप्त मौन कहा है, सो क्या है, सुनो ! द्वैतरूप संसार के फुरने मे सुषुप्त होना; आत्मा मे जागना और ऐसे देखना कि न मुझमें जाग्रत है, न स्वप्न है और न सुषुप्ति है—इस निश्चय में स्थित होना तुरीयातीत अवस्था है । यह पञ्चम मौन है । ऐसा तुरीयातीत पद अनादि, अनन्त, जरा से रहित, शुद्ध निर्दोष है । हे राम ! ज्ञानी इन्द्रियों को रोकने की इच्छा भी नहीं करता और न विचरने की इच्छा करता है । जो स्वाभाविक आ पड़े, उसी मे स्थित होता है । यह परम मौन है ।
१७४ ॐ योगवाशिष्ठ ॐ
ज्ञानी को सुख की इच्छा भी नहीं और दुःख का त्रास भी नहीं। वह हेय और उपादेय से रहित है। हे राम! तुम रघुवंश में चन्द्रमा हो, अपने स्वभाव में स्थित हो। संसारभ्रम मन के फुरने से होता है, सो मिथ्या है, वास्तव नहीं। और न शरीर सत्य है, न माया सत्य है। हे राम! तुम्हारा स्वरूप ओंकार (चैतन्य ब्रह्म) है। इस ओंकार को अङ्गीकार करके स्थित होना परम उत्तम मौन है।
राम ने पूछा, हे भगवन्! यह जो पीछे आपने सब रुद्र कहे, वे रुद्र थे, अथवा रुद्र के गण थे? वशिष्ठजी बोले, हे राम! जिसको रुद्र कहते हैं, उसी को गण कहते हैं। ये सभी रुद्र हैं। फिर राम ने पूछा, हे भगवन्! यह जो आपने कहा कि सब रुद्र हुए सो ये एक चित्त थे, सब क्योंकर हुए? जैसे दीपक में दीपक होता है, क्या इसी भाँति हुए? वशिष्ठजी बोले, हे राम! एक मावरण है, दुसरा निगावरण। जिसका शुद्ध अन्तःकरण है, वह निगावरण है और जिसका मलिन अन्तःकरण है, वह मावरण है। शुद्ध अन्तःकरण में जैसा निश्चय होता है, वैसा ही तत्काल आगे सिद्ध होता है और मलिन अन्तःकरण का निश्चय सिद्ध नहीं होता। इसमें जो शुद्ध, निगावरण रुद्र है, वही आत्मा और सर्वव्यापी है। जो उसका निश्चय होता है, वह सत्य है। राम ने पूछा, हे भगवन्! सदाशिव की चेष्टा तो मलिन है। रूण्डों की माला गले में धारण करते हैं और विभूति लगाकर शमशान में विहार करते हैं। स्त्री बायें अङ्ग में रहती है। आप क्योंकर कहते हैं कि उनका अन्तःकरण शुद्ध है? वशिष्ठजी बोले, हे राम! शुद्ध, अशुद्ध अज्ञानी को कहते हैं। जो शुद्ध रहे, अशुद्ध में न लिप्त हो, वह ज्ञानी है। वह अपने में क्रिया नहीं देखता और उसको शुद्ध-अशुद्ध में राग-द्वेष नहीं होता। ऐसे सदाशिवजी को ग्रहण या त्याग नहीं है। उनकी दृष्टि में जो स्वाभाविक चेष्टा होती है सो हो। वह ऐसे होती है, जैसे आदि परमात्मा विष्णु भगवान् चार भुजा धारण किये जगत् की रक्षा करने के लिए शुद्ध चेष्टा में अवतार लेकर धर्म की रक्षा करते हैं और पापियों को मारते हैं। यह आदि स्फुरण हुआ है।
✽ निर्वाण प्रकरण ✽ १७५
जो क्रिया स्वाभाविक ही आकर प्राप्त हो, उस क्रिया का रागद्वेष करके उनको हेय या उपादेय कुछ नहीं है। उनको क्रिया का अभिमान भी नहीं होता, इसी से क्रिया का बंधन उनको नहीं होता। इससे यह सिद्ध है कि संसार स्फुरण मात्र है। जब तुम फुरने से रहित होगे, तब तुमको त्रिपुटी न भासेगी अर्थात् आत्मा से भिन्न कुछ नहीं भासित होगा। इससे अज्ञानरूप फुरने से रहित होकर जब तुमको आत्मपद का साक्षात्कार होगा, तब तुम जानोगे कि मुझमें स्फुरण, दृश्य, अदृश्य कुछ नहीं, केवल आत्मपद है, जिसमें एक कहना भी नहीं, तो द्वैत कहाँ से हो ?
हे राम ! दृश्य, अदृश्य, फुरना न फुरना और विद्या, अविद्या, ये सब उपदेश के निमित्त कहते हैं, आत्मा में कुछ नहीं कहा जाता। आत्मा एक है, जिसमें द्वैत का अभाव है। जब चित्त परिणाम बहिर्मुख होता है, तब विश्व का भान होता है और जब चित्त अन्तर्मुख परिणाम पाता है, तब अहंता और ममता का नाश होता है और चैतन्य शेष रहता है। जब अतिशय अन्तर्मुख परिणाम होता है, तब चैतन्य भी नहीं कहा जाता, और जब इससे भी अतिशय परिणाम पाता है, तब 'है' या 'नहीं' भी नहीं कहा जाता। हे राम ! ऐसा तुम्हारा आत्मा अपना आप स्वरूप और शान्तपद है। उसमें वाणी की गति नहीं कि वह ऐसा है या वैसा है, यह कहा जाय। ऐसा कहिये तो इन्द्रियों का विषय है और वैसा कहिये तो इन्द्रियों से परे है। जब तुम अपने में स्थित होगे, तब जानोगे कि मुझमें अहं का फुरना कुछ नहीं है। आत्मरूपी सूर्य का साक्षात्कार होने से दृश्यरूपी अन्धकार का अभाव हो जायगा क्योंकि आत्मा तुम्हारा अपना रूप है जो केवल शान्तरूप और निर्मल है। जैसे गम्भीर समुद्र वायु से रहित होता है, वैसे ही आत्मरूपी समुद्र संकल्परूपी वायु से रहित गम्भीर और शुद्ध है। यह संसार चित्त का चमत्कार है। यह निरंश है, इसमें अंशांशी भाव नहीं-यह अद्वैत है। हे राम ! जब ऐसे बोध में स्थित होगे, तब इस विश्व को भी आत्मरूप देखोगे। यदि बोध बिना
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देखोगे तो विश्व का भान होगा। इससे हे राम! बोध में स्थित रहो।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे ब्रह्मैकत्वप्रतिपादनं नाम षष्टितमःसर्गः॥ ६० ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! सदाशिव का आदि में स्फुरण हुआ है। वह त्रिनेत्र है, विश्व का संहार करते हैं और सिरों की माला धारण किये हैं। ब्रह्मा के चार मुख हैं और चारों वेद हाथ में हैं। वह संसार की उत्पत्ति करते हैं। उनकी ऐसे ही उत्पत्ति हुई है। हे राम! ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र, ये तीनों एकरूप हैं। इनकी यही चेष्टा स्वाभाविक है। उन्होंने यह अपना कर्म न राग से अङ्गीकार किया है और न द्वेष करके उसका त्याग करते हैं। उनकी यह संज्ञा भी लोगों के देखने के लिए है। वे अपनी जान में कुछ नहीं करते; क्योंकि बोध में ही उनका जाग्रत है। बोध में जाग्रत क्या और कैसे होता है सो भी सुनो। बोध सांख्यमार्ग से होता है और जाग्रति योगमार्ग से होती है। सांख्यमार्ग है तत्त्व और मिथ्या को विचारना। तत्त्व इस ज्ञान को कहते हैं कि मैं आत्मा, सत् और चैतन्य हूँ, और सब दृश्य मिथ्या, जड़ और असत् हैं। अज्ञान मुझमें कल्पित है। असल में मैं अद्वैत आत्मा हूँ और मुझमें अज्ञान और दृश्य, दोनों नहीं हैं। ऐसे निश्चय में स्थित होना सांख्यविचार है। योग प्राणों के स्थिर करने को कहते हैं। जब प्राण स्थिर होते हैं, तब मन भी स्थिर हो जाता है और जब मन स्थिर होता है तब प्राण भी स्थिर होते हैं—इनका परस्पर सम्बन्ध है।
राम ने पूछा, हे भगवन्! जो प्राण ही स्थिर होने से जीव मुक्त होता है, तो मृतक पुरुषों के तो प्राण नहीं रहते—वे सब मुक्त होने चाहिए? वशिष्ठजी बोले, हे राम! प्रथम तो श्रवण करो कि प्राण क्या पदार्थ है। यह जीव पुर्यष्टका में स्थित होकर जैसी वासना करता है, शरीर को त्यागकर उसी के अनुसार आकाश में स्थित होता है। उसी का नाम प्राण है। उस वासनारूप प्राण से फिर उसको संसार का भान होता है और जब प्राण की वासना क्षय होती है तब वह मुक्त होता है। ज्ञानी की वासना क्षीण हो जाती है, इससे वह जन्म-मरण
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से रहित होता है। जैसे भुना बीज फिर नहीं उगता, वैसे ही ज्ञानी को वासना के अभाव मे जन्म-मरण नहीं होता। हे राम ! जन्म-मरण दोनों मार्गों से निवृत्त होता है और उसे दोनों का फल कहा है। हे राम ! ज्ञान मे चित्त सत्यपद को प्राप्त होता है और योग मे प्राणवायु स्थिर होती है। तब वासना का क्षय हो जाता है। जब स्वरूप की प्राप्ति होती है, तब संसार के पदार्थों का अभाव हो जाता है। जैसे रसायन मे ताँबा सोना हो जाता है, फिर ताँबे का भाव नहीं रहता, वैसे ही ज्ञान मे विश्वरूपी ताँवे की संज्ञा नहीं रहती। जैसे ताँबे का ताँवापन जाता रहता है, वैसे ही ज्ञान मे जब चित्त सत्यरूप हुआ तब फिर संसारी नहीं होता। आत्मा में न बन्धन है और न मोक्ष। परमात्मा एक अद्वैत है। तब उसमें बन्ध कहाँ और मोक्ष कहाँ ? बन्धन और मुक्ति चित्त की कल्पना है। और जो चित्त को शान्त करने का उपाय कहा है उससे वह शान्त होता है। इसी को मुक्ति कहते हैं। और बन्धन-मुक्ति कोई नहीं। चित्त के उदय होने का नाम बन्धन है और चित्त का शान्त होना ही मुक्ति है।
हे राम ! जब मन अपने वश होता है, तब आत्मपद प्राप्त होता है। अथवा जब प्राण स्थिर होते हैं, तब आत्मपद प्राप्त होता है। यह संसार मृगतृष्णा के जल सा मिथ्या है। जब वासना निवृत्त होती है, तब आत्मपद में स्थिति होती है। जैसे मेघ जब जल-संयुक्त होते हैं, तब गर्जते हैं और वर्षा करते हैं और जब वर्षा से रहित होते हैं तब शान्त हो जाते हैं, वैसे ही जब वासना का क्षय होता है, तब चित्त शान्त हो जाता है। जैसे शरत् काल में बादल और कुहरा निवृत्त होकर शुद्ध और निर्मल आकाश ही रहता है वैसे ही वासना के निवृत्त होने से शुद्ध और केवल चैतन्य आत्मा होकर भासित होता है। जो तुम एक मुहूर्त भी चित्त बिना स्थित हो तो तुमको आत्मपद की प्राप्ति हो। जब तक चित्त की वासना क्षय नहीं होती तब तक जीव बड़े भ्रम देखता है। हे राम ! यह संसार मृगतृष्णा के जल सा असत् है और आभासमात्र स्फुरता है। इस पर एक आख्यान जो पहले कभी हुआ है, सो कहता हूँ, मन
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लगाकर सुना । दक्षिण दिशा में एक मन्दराचल पर्वत है । उसकी कन्दरा में महाभयानक आकार का एक बेताल रहता था और मनुष्यों को खाता था । उसके मन में विचार उपजा कि किसी नगर के जीवों का भोजन करूँ । पर वह एक समय साधु का संग भी करता था, और एक साधु को खा भी जाता था । उस साधु-संग के प्रसाद से बेताल के मन में यह आया कि मेरी कौन गति होगी ? मेरा आहार मनुष्य है और मनुष्यों को भोजन करना बड़ी हत्या है । इससे में एक वृत्ति बाँध नूँ कि जो मूर्ख और अज्ञानी मनुष्य हों, उनको भोजन करूँ और जो उत्तम पुरुष हैं उनको न खाऊँ ।
हे राम ! निदान वह बेताल क्षुधातुर होने पर भी भले मनुष्यों को न खाता था । इसी प्रकार एक समय वह क्षुधा से बहुत व्याकुल हो रात्रि के समय घर से बाहर निकला तो संयोगवश उस नगर के राजा से, जो वीर यात्रा को निकला था, भेंट हो गई । बेताल ने कहा, हे राजन् ! तुम मुझे भोजन मिले हो । अब में तुमको खाता हूँ । तुम कहाँ जाओगे ? राजा ने कहा, हे रात्रि के विचरनेवाले बेताल ! जो तू मेरे निकट अन्याय से आवेगा तो तेरा माथा हजार टुकड़े हो जायगा और तू मरेगा । बेताल ने कहा, हे राजन् ! मैं तुझसे नहीं डरता । हे अपने हत्यारे ! मैं तुझे भोजन करूँगा; तू चाहे जैसा बली हो, मैं नहीं डरता । परन्तु मेरी एक प्रतिज्ञा है कि में अज्ञानी को भोजन करता हूँ और ज्ञानी को नहीं मारता । जो तू ज्ञानी है तो न मारूँगा और जो अज्ञानी है तो मारूँगा, जैसे बाजपक्षी पक्षियों को मारता है । जो तू ज्ञानी है तो मेरे प्रश्नों का उत्तर दे । एक प्रश्न यह है कि जिसमें यह ब्रह्माण्ड त्रसरेणु के समान है वह सूर्य कौन है ? दूसरा प्रश्न यह है कि जिस पवन में आकाशरूपी अणु उड़ते हैं, वह पवन कौन है ? तीसरा प्रश्न यह है जिसमें केले के वृक्ष की तरह और कुछ नहीं निकलता, वह कौन वृक्ष है ? और चौथा प्रश्न यह है कि वह पुरुष कौन है, जो स्वप्न में स्वप्न और फिर उसमें और स्वप्न देखता है और एक रहता है, परिणाम को नहीं प्राप्त होता ? इन प्रश्नों का उत्तर दे ।
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जो तूने मेरे प्रश्नों का उत्तर न दिया तो तुझे खा जाऊँगा ।
इति श्रीयो० निर्वाणप्रकरणे वेतालप्रश्नोक्तिनामैकषष्टितमसर्गः॥६१॥
राजा बोला, हे वेताल ! इन प्रश्नों का उत्तर सुन । ब्रह्माण्डरूपी एक मिर्च का बीज है और उसमें सतपद आत्मा चैतन्यरूपी तीक्ष्णता है । एक डाल में ऐसी मिर्च कई सहस्र लगी हुई हैं और एक वृक्ष में कई सहस्र ऐसी डालें लगी हैं । ऐसे वृक्ष एक वन में कई सहस्र हैं और ऐसे कई सहस्र वन एक शिखर पर स्थित हैं । ऐसे कई सहस्र शिखर एक पर्वत पर हैं और ऐसे कई सहस्र पर्वत एक नगर में हैं । ऐसे कई सहस्र नगर एक द्वीप में हैं और ऐसे कई सहस्र द्वीप एक भव पृथ्वी में हैं । ऐसे कई सहस्र पृथ्वीभव एक अगड में हैं और ऐसे कई सहस्र अगड एक समुद्र में लहरें लेते हैं । ऐसे कई सहस्र समुद्र एक समुद्र की लहरें हैं और ऐसे कई सहस्र समुद्र एक पुरुष के उदर में हैं । ऐसे कई पुरुषों की एक पुरुष के गले में माला पिरोई हुई है । ऐसे कई लाख-कोटि सूर्य के अणु हैं, जिस सूर्य मे सब प्रकाशमान है । वह सूर्य आत्मा है, जिसमें अनन्त सृष्टि स्थित है । हे वेताल ! जैसे यह सृष्टि भासती है वैसे ही सब सृष्टियाँ जान । जो यह सृष्टि मत्य है तो सब सृष्टि मत हैं और जो यह सृष्टि स्वप्न है तो सब सृष्टियों को स्वप्न सदृश्य जानो । आत्मा ऐसा सूर्य है, जिसमें भिन्न और कोई अणु नहीं और वह सदा अपने आपमें स्थित है । अब बता और क्या पूछता है ? ऐसे आत्मा में स्थित हो जो आत्मसत्तामात्रपद है; जिस सत्तामात्रपद में कालसत्ता हुई है और ऊर्मी में आकाशसत्ता हुई है । ऊर्मी सतपद मे सब सत्ताएँ संकल्प द्वारा उदय हुई हैं और संकल्प के लय होने पर सब लय हो जाती हैं ।
तूने जो प्रश्न किया था कि वह कौन सूर्य है, जिसमें ब्रह्माण्डरूपी त्रसरेणु होते हैं ? वह ब्रह्मसूर्य है, जिससे भिन्न और कुछ नहीं । और केले का वृक्ष जो तूने पूछा था सो केले की तरह विश्व के भीतर-बाहर आत्मा स्थित है । जैसे केले के भीतर देखने में शून्य आकाश ही निक-लता है, वैसे ही विश्व के भीतर-बाहर आत्मा में भिन्न और कुछ मा-
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नहीं निकलना। जो अद्वैत है, उसमें भिन्न द्वैत कुछ नहीं। वह पवन ब्रह्म है, जिस पवन में ब्रह्माण्ड के समूह उड़ते हैं, और वह पुरुष स्वप्न में स्वप्न और आगे और स्वप्न देखता है और एक अपने आपमें स्थित है। चित्त-कला फुरने से अनन्त ब्रह्माण्डों का भान होता है। इसी को स्वप्न कहते हैं। तो भी उससे कुछ भिन्न नहीं। एक ही रूप में वह नट की तरह रहता है और ये सब उसकी आज्ञा में अपना-अपना काम करते हैं। वह सूक्ष्म में सूक्ष्म और स्थूल में स्थूल है। उसमें मन्दराचल पर्वत भी अणु है, ऐसा स्थूल है। उसमें वाणी की गति नहीं। वह अपने आप ही में स्थित है और इन्द्रियों में अगोचर है, इससे सूक्ष्म में सूक्ष्म है और पूर्णता में स्थूल में स्थूल है। हे मूर्ख वेताल! तू किसको खाता है और क्षुधा से क्यों व्याकुल हुआ है? तू तो अद्वैतरूप आत्मा और आनन्दरूप है, अपने आपमें स्थित हो। जब प्रश्न का उत्तर देकर राजा ने ऐसे उपदेश किया, तब वेताल वहाँ से चला और एकान्त स्थान में स्थित हो विचार करने लगा कि ऐसे मृगतृष्णा के जलसदृश झूठे संसार में मुझे क्या प्रयोजन है? फिर एकान्त स्थान में जाकर ध्यान लगाकर आत्मा में धारा-प्रवाह सा स्थित हुआ। धारा प्रवाह प्रवाहक उसे कहते हैं कि आत्मा का अभ्यास दृढ हो, आत्मा से भिन्न कुछ न फुरे और एकरस स्थित हो। ऐसे ध्यान में स्थित होकर वेताल मन आत्मपद को प्राप्त हुआ। हे राम! यह राजा और वेताल का आख्यान तुमको सुनाया। उस आत्मा में ब्रह्माण्ड अणु की नाईं स्थित है, इससे निर्विकल्प आत्मा में स्थित हो और इन्द्रियों को बाहर से समेटकर स्थित करो।
इति श्रीयो० नि० राजावै० वेतालब्रह्मपदप्राप्तिर्नाम द्विपष्टितमसर्गः ६२
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! मैं एक और आख्यान कहता हूँ, उसे सुनो। उसमें भगीरथ राजा की मूढ़ता गई; वह स्वस्थचित्त होकर आत्मपद में स्थित हुआ; अपने आपत्तिप्रवाह (जो सुख-दुख आ) पड़ें, उसे निर्लिप्त होकर भोगना आपत्तिप्रवाह का अर्थ है।) में विचार और पुरुषार्थ से स्वर्गलोक से गङ्गा को पृथ्वी पर ले आया। तुम
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भी वैसे ही विचरें । भगीरथ के पास जो कोई याचक आता था, उसका प्रयोजन वह पूर्ण करता था । जिस पदार्थ को माँगने का संकल्प करके कोई आता तो राजा उसको पूर्ण करता था । जैसे चन्द्रमा को देखकर चन्द्रमणि अमृत पर्मीजती है वैसे ही स्वभाव का दयार्द्र वह राजा था । जो उस राजा से शत्रुभाव रखते थे, उनका वह ऐसे नाश करता था, जैसे सूर्य के उदय होने पर अन्धकार का नाश हो जाता है । जैसे अग्नि से अनेक चिनगारियाँ उठती हैं, वैसे ही वह शत्रुओं पर शस्त्रों की वर्षा करता था । आपतित प्रवाह में स्थिर रहता था—अर्थात् भले-बुरे और सुख दुःख में एक समान रहता था । राम ने पूछा, हे भगवन् ! राजा भगीरथ के मन में क्या आई, जो गंगा को ले आये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! एक समय उसने अपने नगर को देखा कि लोग भले मार्ग को त्यागकर बुरे मार्ग और पापकर्म में लगे हैं और मूर्ख हो रहे हैं । तब लोगों के उपकार के निमित्त उसने तप करके ब्रह्मा, रुद्र और यज्ञ ऋषि का आराधन किया और गंगा के लाने के निमित्त मन्त्र जपने लगा । गंगा का एक प्रवाह स्वर्ग में और एक पाताल में है; राजा भगीरथ ने एक प्रवाह मर्त्यलोक में भी चलाया है । उसने गंगा को लाकर समुद्र का भी उपकार किया । समुद्र को अगस्त्य मुनि ने सुखाया था, गंगा के आने से उस समुद्र का दरिद्र (जल की कमी) भी निवृत्त हुआ । उसके मन में एक विचार आया । संसार को देखकर वह कहने लगा कि एक ही काम बारम्बार करना बड़ी मूर्खता है । मनुष्य नित वही भोगते, वही खाते और फिर वही कार्य करते हैं । जिस कर्म के करने से पीछे सुख मिले, उसके करने में कुछ दोष नहीं; ऐसे वैराग्य से उसने विचार किया कि संसार क्या है ? उस समय में राजा युवा था । जैसे मरुस्थल में कमल उपजना आश्चर्य है, वैसे ही यौवन अवस्था में ऐसा विचार उपजना आश्चर्य है ।
हे राम ! जब राजा के मन में ऐसा विचार उपजा, तब वह घर से निकलकर अपने गुरु त्रितल ऋषीश्वर के निकट पहुँचा और उनसे प्रश्न किया कि हे भगवन् ! वह कौन सुख है, जिसके पाने से जरा और
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मृत्यु के दुःख निवृत्त होते हैं? ये संसार के सुख तो भीतर से खोखले हैं; इनके परिणाम में दुःख है। त्रितल ऋषि बोले, हे राजन्! एक ही ज्ञेय अर्थात् जानने योग्य है, जिसके जानने से शान्तपद प्राप्त होता है। वह ज्ञेय आत्मज्ञान है। यह आत्मा न उदय होता है; न अस्त होता है; ज्यों का त्यों अपने आपमें है। हे राजन्! यह जग और मृत्यु तभी तक है, जब तक अज्ञान है; जब ज्ञानरूपी सूर्य उदय होगा तब अज्ञानरूपी अन्धकार निवृत्त हो जायगा और जीव केवल शान्तपद में स्थित होगा। आत्मानन्द सर्वज्ञ है। उसके जानने से चित्जड़ग्रन्थि टूट जाती है, अर्थात् अनात्म देह-इन्द्र्यादिक में आत्मा का अभिमान करना निवृत्त हो जाता है। सब कर्म भी निवृत्त होने और सब संशय नष्ट हो जाते हैं। ऐसे शुद्ध स्वरूप को पाकर ज्ञानी उर्मी में स्थित होते हैं, जो सत्ता सर्वव्यापी, सर्वगत, नित्य स्थित और उदय-अस्त से रहित है। राजा बोले, हे भगवन्! मैं जानता हूँ कि आत्मा चिन्मात्र सत्ता है और देहादिक मिथ्या है। आत्मा सर्वज्ञ, शान्त और अच्युतरूप है, यह जानता हूँ। परन्तु मुझे शान्ति नहीं मिली, क्योंकि आत्मा चिन्मात्र मुझे नहीं भासता और स्वरूप में स्थिति भी नहीं हुई। इसलिए कृपा करके उपदेश करिये कि मैं स्थित होऊँ।
ऋषि बोले, हे राजन्! तुझसे मैं एक ज्ञान कहता हूँ, जिसके जानने में फिर कोई दुःख न रहेगा और उसमें ज्ञेय में तुमको निष्ठा होगी। तब तुम सर्वात्मारूप हो स्थित होगे और तुम्हारा जीवभाव नष्ट हो जायगा। देह और इन्द्रियों में आत्म अभिमान न करके, पुत्र, स्त्री और कुटुम्ब के दुःख में अपने को दुःखी न मानना; नित्य समचित्त रहकर इष्ट-अनिष्ट की प्राप्ति में एकरस रहना; चित्त को आत्मपद में लगाकर वृत्ति को ओर न जाने देना; एकान्तदेश में स्थित होना और अज्ञानी का संग न करके, ब्रह्मविद्या का सदा विचार करना; ये ज्ञानी के लक्षण तत्त्वज्ञान के दर्शन के निमित्त तुमसे कहे हैं—इससे विपरीत अज्ञान है। हे राजन्! यह ज्ञेय जानने योग्य है; इसके जानने से केवल शान्तपद को प्राप्त होगे और देह का अहंकार भी निवृत्त होगा। हे राजन्! पहले