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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 981, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 981

⚙️ निर्वाण प्रकरण १७१

पर गिर पड़ते हैं, वैसे ही सबने बहुत फूलों की वर्षा की । इस प्रकार प्रथम तो बहुत पूजा होती रही, फिर वशिष्ठजी, को नमस्कार करके सब उठ खड़े हुए और आपस में नमस्कार किया । फिर जैसे मन्दराचल पर्वत में सूर्य उदय होता है, वैसे ही वशिष्ठजी आदि ऋषि और राजा दशरथ आदि सब राजा उठे । तब पृथ्वी के राजा और प्रजा पृथ्वी पर अपने स्थान को चले और आकाश के सिद्ध और देवता आकाश को चले । सब अपने-अपने कामों में जा लगे और जैसा शास्त्रोक्त व्यवहार है उसे करने लगे । जब रात्रि हुई, तब विचार करते रहे कि वशिष्ठजी ने कैसे ज्ञान उपदेश किया है और उस विचार में उनकी रात्रि एक क्षण की तरह बीत गई । इतने में सूर्य की किरणें निकलते ही राम-लक्ष्मण आदि सब आये और परस्पर नमस्कार कर अपने-अपने आसन पर शान्तरूप होकर बैठे, जैसे पवन न चलने पर कमल स्थिर होते हैं ।

तब वशिष्ठजी ने अनुग्रह करके आप ही कहा, हे राम ! तुम्हारी प्रीति के लिए मैंने संसार में बहुत खोजा और आकाश, पाताल और सप्तद्वीप सब ढूँढ़ डाले; परन्तु ऐसा कोई संन्यासी न देखा और न अन्य किसी का संकल्प उसका जैसा भासित होता है । जब एक पहर रात्रि रही तब मैंने फिर ढूँढ़कर उत्तर दिशा में एक प्राचीन चिन्माचीन नाम के नगर में एक मढ़ी देखी । उसके दरवाजे भीतर से बंद थे । उसमें पके बालोंवाला एक संन्यासी बैठा था । बाहर उसके चेले बैठे थे । वे इस डर से दरवाजा नहीं खोलते थे कि कहीं ऐसा न हो कि हमारे गुरु की समाधि खुल जाय । वह मुनि उस स्थान में दूसरे ब्रह्मा के समान बैठा है । उसको बैठे अभी इक्कीस दिन हुए हैं, पर उसको समाधि में सहस्र वर्षों का अनुभव हुआ है और उसने बहुत जन्म भी पाये हैं, जो उसको प्रत्यक्ष भासित हुए हैं । उसने सृष्टि भी प्रत्यक्ष देखी है और उसमें विचरा है । हे राम ! इसका सा एक और मुनि भी पूर्व कल्प में था । इतना सुन राजा दशरथ ने कहा, हे महामुनीश्वर ! जो आप आज्ञा दें तो मैं अपना अनुचर चिन्माचीन नगर में भेजूँ कि वह वहाँ जाकर उस संन्यासी को जगावे ।