योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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सत्य है। उनके जैसा संकल्प उठता है, वैसा ही होता है। ऐसे मन संकल्पवाले मैंने अनेक देखे हैं।
एक राजा सहस्रबाहु अर्जुन था। वह अपने घर में बैठा था और उसके सिर पर छत्र झूलता और चँवर होते थे। उसके मन में संकल्प हुआ कि मैं मेघ होकर बरसूँ। उस संकल्प के करने से उसका एक शरीर तो राजा का रहा और एक शरीर से वह मेघ होकर बरसने लगा। विष्णु भगवान् एक शरीर से तो क्षीरसमुद्र में शयन करते हैं और प्रजा की रक्षा के निमित्त और शरीर भी रख लेते हैं, जो अवतार कहलाते हैं। यज्ञदेवियाँ अपने-अपने स्थानों में होती हैं और बड़े ऐश्वर्य में विचरती हैं। इन्द्र एक शरीर से स्वर्ग में रहता है और दूसरे शरीर से जगत में भी उपस्थित रहता है। योगेश्वरों का जैसा संकल्प होता है, वैसा ही सिद्ध होता है। और जो अज्ञानी मूर्ख हैं उनके मन में बड़ा भ्रम होता है और वे बड़े मोह को प्राप्त होकर मोह में नीच गति पाते हैं। जैसे बड़े पर्वत के ऊपर से पत्थर गिरता है तो वह नीचे को जाता है, वैसे ही मूर्ख आत्मपद से गिरकर संसाररूपी गढ़े में गिरते और बड़े दुःख पाते हैं। रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! आपने कहा कि संसार स्वप्नमात्र है सो मैंने जाना कि अनन्त मोहरूपी विषमता है और आत्मचैतन्यरूप आनन्द के प्रमाद से जीव अपने को जड़ और दुःखी जानता है। यह बड़ा आश्चर्य है। हे भगवन् ! यह जो आपने संन्यासी का वृत्तांत कहा, उसके समान कोई और भी है अथवा नहीं सो कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! संसाररूपी मढ़ी में मैं रात्रि के समय समाधि करके देखूँगा और तुमसे प्रभात को जैसा होगा, वैसा कहूँगा।
इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले, हे राजन् ! वशिष्ठजी ने जब यह कहा, तब मध्याह्न का समय था। नौबत-नगाड़े बजने लगे, जिनका प्रलयकाल के मेघ का सा शब्द होने लगा। वशिष्ठजी के चरणों पर राजा और देवताओं ने फूल चढ़ाये और सबने बड़ी पूजा की। जैसे बड़ा पवन चलता है और उसके वेग से बाग में वृक्षों के फूल पृथ्वी