योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 979, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸
धारण किये सो वे सत् कैसे हुए और उनकी सृष्टि कैसे सत हुई ?
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! आत्मा सर्वव्यापक, शुद्ध, चैतन्य आकाश और अनुभवरूप है। उसमें जैसे देशकाल और वस्तु का निश्चय होता है, वैसा ही वह बन जाता है। जैसा-जैसा-स्फुरित होता है, वैसा ही वैसा आगे होना है। जिसका मन शुद्ध होता है, उसका मन संकल्प होता है और वह जैसा संकल्प करता है, वैसा ही होता है। जो तुम कहो कि संन्यासी का अन्तःकरण शुद्ध था, उसने नीच-ऊँच जन्म कैसे पाये ? अर्थात मद्यपान करनेवाला, भँवेरी, बेल आदि नीच और ऊँच अर्थात ब्राह्मण, राजा आदि ऐसे जन्म शुद्ध अन्तःकरण में न चाहिये, तो इसका उत्तर यह है कि संवेदन में जैसी भावना उठती है, वैसा ही होता देख पड़ता है। जैसे एक पुरुष का अन्तःकरण शुद्ध हो और उसके मन में आवे कि मेरा एक शरीर विद्याधर का और एक शरीर भेड़ का हो तो उसके भले और बुरे दोनों ही शरीर हो जाते हैं। जो तुम कहो कि बुरा क्यों बना, भला ही बनता तो इसका उत्तर सुनो। देखो, किसी भले पण्डित के घर पुत्र होता है; वह यदि संस्कार अर्थात वासना से चोर हो जाय तो पिता को दुःख होता है। इससे हे राम ! सब वासना ही से ऊँच-नीच होते हैं। जब अभ्यास और परमयोग होता है, तब जीव शुद्ध होता है। अभ्यास, मन्त्र, जप और चित्त के स्थित करने को योग कहते हैं। इससे जैसी चिन्तना होती है, वैसी ही सिद्धि होती है, और अज्ञानी को नहीं होती। जैसे वस्तु निकट पड़ी है और भावना नहीं तो दूर है, वैसे ही अज्ञानी की भावना नहीं तो न दूरवाली वस्तु प्राप्त होती है और न निकटवाली। वह सिद्ध इस-लिए नहीं होती कि उसकी भावना दृढ़ नहीं और हृदय भी शुद्ध नहीं। संकल्प भी तब सिद्ध होता है, जब हृदय शुद्ध होता है। शुद्ध हृदयवाला जिसकी चिन्तना करता है वह चाहे दूर हो तो भी सिद्ध होता है, और जो निकट है, वह भी सिद्ध होता है। जो तुम कहो कि संन्यासी तो एक था, बहुत चैतन्य शरीर कैसे हुए तो इसका उत्तर सुनो। जो कोई योगीश्वर और योगिनी देवियाँ हैं उनका संकल्प