योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
☸ निर्वाण प्रकरण ☸
धारण किये सो वे सत् कैसे हुए और उनकी सृष्टि कैसे सत हुई ?
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! आत्मा सर्वव्यापक, शुद्ध, चैतन्य आकाश और अनुभवरूप है। उसमें जैसे देशकाल और वस्तु का निश्चय होता है, वैसा ही वह बन जाता है। जैसा-जैसा-स्फुरित होता है, वैसा ही वैसा आगे होना है। जिसका मन शुद्ध होता है, उसका मन संकल्प होता है और वह जैसा संकल्प करता है, वैसा ही होता है। जो तुम कहो कि संन्यासी का अन्तःकरण शुद्ध था, उसने नीच-ऊँच जन्म कैसे पाये ? अर्थात मद्यपान करनेवाला, भँवेरी, बेल आदि नीच और ऊँच अर्थात ब्राह्मण, राजा आदि ऐसे जन्म शुद्ध अन्तःकरण में न चाहिये, तो इसका उत्तर यह है कि संवेदन में जैसी भावना उठती है, वैसा ही होता देख पड़ता है। जैसे एक पुरुष का अन्तःकरण शुद्ध हो और उसके मन में आवे कि मेरा एक शरीर विद्याधर का और एक शरीर भेड़ का हो तो उसके भले और बुरे दोनों ही शरीर हो जाते हैं। जो तुम कहो कि बुरा क्यों बना, भला ही बनता तो इसका उत्तर सुनो। देखो, किसी भले पण्डित के घर पुत्र होता है; वह यदि संस्कार अर्थात वासना से चोर हो जाय तो पिता को दुःख होता है। इससे हे राम ! सब वासना ही से ऊँच-नीच होते हैं। जब अभ्यास और परमयोग होता है, तब जीव शुद्ध होता है। अभ्यास, मन्त्र, जप और चित्त के स्थित करने को योग कहते हैं। इससे जैसी चिन्तना होती है, वैसी ही सिद्धि होती है, और अज्ञानी को नहीं होती। जैसे वस्तु निकट पड़ी है और भावना नहीं तो दूर है, वैसे ही अज्ञानी की भावना नहीं तो न दूरवाली वस्तु प्राप्त होती है और न निकटवाली। वह सिद्ध इस-लिए नहीं होती कि उसकी भावना दृढ़ नहीं और हृदय भी शुद्ध नहीं। संकल्प भी तब सिद्ध होता है, जब हृदय शुद्ध होता है। शुद्ध हृदयवाला जिसकी चिन्तना करता है वह चाहे दूर हो तो भी सिद्ध होता है, और जो निकट है, वह भी सिद्ध होता है। जो तुम कहो कि संन्यासी तो एक था, बहुत चैतन्य शरीर कैसे हुए तो इसका उत्तर सुनो। जो कोई योगीश्वर और योगिनी देवियाँ हैं उनका संकल्प
१७० ❊ योगवाशिष्ठ ❊
सत्य है। उनके जैसा संकल्प उठता है, वैसा ही होता है। ऐसे मन संकल्पवाले मैंने अनेक देखे हैं।
एक राजा सहस्रबाहु अर्जुन था। वह अपने घर में बैठा था और उसके सिर पर छत्र झूलता और चँवर होते थे। उसके मन में संकल्प हुआ कि मैं मेघ होकर बरसूँ। उस संकल्प के करने से उसका एक शरीर तो राजा का रहा और एक शरीर से वह मेघ होकर बरसने लगा। विष्णु भगवान् एक शरीर से तो क्षीरसमुद्र में शयन करते हैं और प्रजा की रक्षा के निमित्त और शरीर भी रख लेते हैं, जो अवतार कहलाते हैं। यज्ञदेवियाँ अपने-अपने स्थानों में होती हैं और बड़े ऐश्वर्य में विचरती हैं। इन्द्र एक शरीर से स्वर्ग में रहता है और दूसरे शरीर से जगत में भी उपस्थित रहता है। योगेश्वरों का जैसा संकल्प होता है, वैसा ही सिद्ध होता है। और जो अज्ञानी मूर्ख हैं उनके मन में बड़ा भ्रम होता है और वे बड़े मोह को प्राप्त होकर मोह में नीच गति पाते हैं। जैसे बड़े पर्वत के ऊपर से पत्थर गिरता है तो वह नीचे को जाता है, वैसे ही मूर्ख आत्मपद से गिरकर संसाररूपी गढ़े में गिरते और बड़े दुःख पाते हैं। रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! आपने कहा कि संसार स्वप्नमात्र है सो मैंने जाना कि अनन्त मोहरूपी विषमता है और आत्मचैतन्यरूप आनन्द के प्रमाद से जीव अपने को जड़ और दुःखी जानता है। यह बड़ा आश्चर्य है। हे भगवन् ! यह जो आपने संन्यासी का वृत्तांत कहा, उसके समान कोई और भी है अथवा नहीं सो कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! संसाररूपी मढ़ी में मैं रात्रि के समय समाधि करके देखूँगा और तुमसे प्रभात को जैसा होगा, वैसा कहूँगा।
इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले, हे राजन् ! वशिष्ठजी ने जब यह कहा, तब मध्याह्न का समय था। नौबत-नगाड़े बजने लगे, जिनका प्रलयकाल के मेघ का सा शब्द होने लगा। वशिष्ठजी के चरणों पर राजा और देवताओं ने फूल चढ़ाये और सबने बड़ी पूजा की। जैसे बड़ा पवन चलता है और उसके वेग से बाग में वृक्षों के फूल पृथ्वी
⚙️ निर्वाण प्रकरण १७१
पर गिर पड़ते हैं, वैसे ही सबने बहुत फूलों की वर्षा की । इस प्रकार प्रथम तो बहुत पूजा होती रही, फिर वशिष्ठजी, को नमस्कार करके सब उठ खड़े हुए और आपस में नमस्कार किया । फिर जैसे मन्दराचल पर्वत में सूर्य उदय होता है, वैसे ही वशिष्ठजी आदि ऋषि और राजा दशरथ आदि सब राजा उठे । तब पृथ्वी के राजा और प्रजा पृथ्वी पर अपने स्थान को चले और आकाश के सिद्ध और देवता आकाश को चले । सब अपने-अपने कामों में जा लगे और जैसा शास्त्रोक्त व्यवहार है उसे करने लगे । जब रात्रि हुई, तब विचार करते रहे कि वशिष्ठजी ने कैसे ज्ञान उपदेश किया है और उस विचार में उनकी रात्रि एक क्षण की तरह बीत गई । इतने में सूर्य की किरणें निकलते ही राम-लक्ष्मण आदि सब आये और परस्पर नमस्कार कर अपने-अपने आसन पर शान्तरूप होकर बैठे, जैसे पवन न चलने पर कमल स्थिर होते हैं ।
तब वशिष्ठजी ने अनुग्रह करके आप ही कहा, हे राम ! तुम्हारी प्रीति के लिए मैंने संसार में बहुत खोजा और आकाश, पाताल और सप्तद्वीप सब ढूँढ़ डाले; परन्तु ऐसा कोई संन्यासी न देखा और न अन्य किसी का संकल्प उसका जैसा भासित होता है । जब एक पहर रात्रि रही तब मैंने फिर ढूँढ़कर उत्तर दिशा में एक प्राचीन चिन्माचीन नाम के नगर में एक मढ़ी देखी । उसके दरवाजे भीतर से बंद थे । उसमें पके बालोंवाला एक संन्यासी बैठा था । बाहर उसके चेले बैठे थे । वे इस डर से दरवाजा नहीं खोलते थे कि कहीं ऐसा न हो कि हमारे गुरु की समाधि खुल जाय । वह मुनि उस स्थान में दूसरे ब्रह्मा के समान बैठा है । उसको बैठे अभी इक्कीस दिन हुए हैं, पर उसको समाधि में सहस्र वर्षों का अनुभव हुआ है और उसने बहुत जन्म भी पाये हैं, जो उसको प्रत्यक्ष भासित हुए हैं । उसने सृष्टि भी प्रत्यक्ष देखी है और उसमें विचरा है । हे राम ! इसका सा एक और मुनि भी पूर्व कल्प में था । इतना सुन राजा दशरथ ने कहा, हे महामुनीश्वर ! जो आप आज्ञा दें तो मैं अपना अनुचर चिन्माचीन नगर में भेजूँ कि वह वहाँ जाकर उस संन्यासी को जगावे ।
१७२ ❖ योगवाशिष्ठ ❖
वशिष्ठजी ने कहा, हे राजन्! वह संन्यासी अब ब्रह्मा का हंस होकर ब्रह्मा के उपदेश से जीवन्मुक्त हुआ है और यह शरीर उसका अब मृतक हुआ है। अब उसमें पुर्यष्टका अर्थात् जीव नहीं है। अब उसको क्या जगाना है? एक महीने पीछे शिष्य उसका दरवाजा खोलेंगे तो उस नगर के लोग देखेंगे कि वह मृतक पड़ा है। इससे हे राम! यह विश्व संकल्पमात्र ही है। और जो तुम कहो कि एक से बहुत क्योंकर हुए तो सुनो, ये मुनीश्वर, ऋषि, राजा आदि जो लोग हैं, वे अनेक बार एकसा शरीर धारण करते हैं। कभी कई बार कुछ सदृश और कुछ असदृश धारण करते हैं, कभी थोड़ा मिलता हुआ शरीर धारण करते हैं। और अनेक बार पहले से बिल्कुल न मिलता हुआ विलक्षण शरीर धारण करते हैं। इन नारदजी के समान और भी नारद होंगे। उनकी चेष्टा भी ऐसी ही होगी और शरीर भी ऐसा ही होगा। व्यास, शुकदेव, भृगु, भृगु के पिता जनक, कर्कश ऋषीश्वर अत्रि और अत्रि की स्त्री भी जैसी कि अब है वैसी ही होगी। जैसे समुद्र में तरङ्ग एक से और न्यून या अधिक भी होते हैं, वैसे ही यह संसार ब्रह्मलोक से लेकर पाताल तक सब मन का रचा हुआ है और सब मिथ्या है। जब यह चित्तकला बहिर्मुख होती है, तब संसार और देश काल होता है। और जब अन्तर्मुख होती है, तब आत्मपद प्राप्त होता है। जब तक बहिर्मुख होती है, तब तक दुःख प्राप्त होता है। अपना स्वरूप आनन्दरूप है। उसमें चित्तकला जानती है कि मैं सदा दुःखी हूँ। देह और इन्द्रियों से मिलकर जीव दुःखी होता है। इससे हे राम! इस अज्ञानरूप वासना से तुम रहित बनो। वासना से यह अवस्था प्राप्त होती है। जैसे चन्द्रमा अमृत से पूर्ण है और उसमें चर्मदृष्टि से कलङ्क देख पड़ता है, वैसे ही अमृतमय चन्द्रमारूप आत्मा में अज्ञानदृष्टि से जन्म, मरण, शोक, दुःख भय आदि कलङ्क दीखते हैं। यह माया महा आश्चर्य रूप है। जैसे चन्द्रमा एक है और नेत्रदोष से बहुत चन्द्रमा भासित होते हैं, वैसे ही एक अद्वैत आत्मा में नानात्वरूप विश्व का भान अज्ञान से होता है। यही माया है।
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ १७३
हे राम ! तुम एकरूप आत्मा हो । उसमें फुरने मे विश्व कल्पित हुआ है । इसमें वासना मे रहित हुए बिना आत्मा का दर्शन नहीं होता । जैसे उदय हुआ सूर्य भी बादल के होते शुद्ध नहीं दिखता, वैसे ही स्फुरणरूपी बादल के दूर होने पर ही आत्मरूपी सूर्य शुद्ध भासित होता है और दृश्य, दर्शन, द्रष्टा फुरने मे ही कल्पित हुए हैं । हे राम ! इस संसार का सार जो आत्मा है, जिसमें सुषुप्त की तरह मौन हो रहो ।
रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! मैं तीन मौन जानता हूँ—एक वाणी का मौन अर्थात् चुप रहना; दूसरा इन्द्रियों का मौन और तीसरा काष्ठ-मौन अर्थात् हठ करके मन और इन्द्रियों को वश करना । सुषुप्त मौन मैं नहीं जानता । आप बताइए ।
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ये तीनों काष्ठ-मौन तपस्वियों के हैं और सुषुप्त मौन ज्ञानी और जीवन्मुक्त का है । वे तीनों मौन जो तुमने कहे, सो अज्ञानी तपस्वियों के हैं । उनको फिर सुनो । एक वाणी का मौन कि बोलना नहीं, दूसरा मौन समाधि कि नेत्रों का मूँद लेना और कुछ न देखना और तीसरा हठकर स्थित होना और मन और इन्द्रियों को स्थिर करना । एक मौन इन्द्रियों की चेष्टा मे रहित होना है । अब ज्ञानी का सुषुप्त मौन सुनो । वाणी और इन्द्रियों से चेष्टा करना, पर आत्मा मे भिन्न और कुछ न भासित होना, अथवा ऐसे होना कि न मैं हूँ, न जगत् है, अथवा ऐसे होना कि सब मैं ही हूँ । ऐसे निश्चय में स्थित होना बड़ा उत्तम मौन है ।
हे राम ! आत्मा की सिद्धि विधि से भी होती है और निषेध से भी । उस आत्मा में स्थित होना बड़ा मौन है । हे राम ! यह जो मैंने सुषुप्त मौन कहा है, सो क्या है, सुनो ! द्वैतरूप संसार के फुरने मे सुषुप्त होना; आत्मा मे जागना और ऐसे देखना कि न मुझमें जाग्रत है, न स्वप्न है और न सुषुप्ति है—इस निश्चय में स्थित होना तुरीयातीत अवस्था है । यह पञ्चम मौन है । ऐसा तुरीयातीत पद अनादि, अनन्त, जरा से रहित, शुद्ध निर्दोष है । हे राम ! ज्ञानी इन्द्रियों को रोकने की इच्छा भी नहीं करता और न विचरने की इच्छा करता है । जो स्वाभाविक आ पड़े, उसी मे स्थित होता है । यह परम मौन है ।
१७४ ॐ योगवाशिष्ठ ॐ
ज्ञानी को सुख की इच्छा भी नहीं और दुःख का त्रास भी नहीं। वह हेय और उपादेय से रहित है। हे राम! तुम रघुवंश में चन्द्रमा हो, अपने स्वभाव में स्थित हो। संसारभ्रम मन के फुरने से होता है, सो मिथ्या है, वास्तव नहीं। और न शरीर सत्य है, न माया सत्य है। हे राम! तुम्हारा स्वरूप ओंकार (चैतन्य ब्रह्म) है। इस ओंकार को अङ्गीकार करके स्थित होना परम उत्तम मौन है।
राम ने पूछा, हे भगवन्! यह जो पीछे आपने सब रुद्र कहे, वे रुद्र थे, अथवा रुद्र के गण थे? वशिष्ठजी बोले, हे राम! जिसको रुद्र कहते हैं, उसी को गण कहते हैं। ये सभी रुद्र हैं। फिर राम ने पूछा, हे भगवन्! यह जो आपने कहा कि सब रुद्र हुए सो ये एक चित्त थे, सब क्योंकर हुए? जैसे दीपक में दीपक होता है, क्या इसी भाँति हुए? वशिष्ठजी बोले, हे राम! एक मावरण है, दुसरा निगावरण। जिसका शुद्ध अन्तःकरण है, वह निगावरण है और जिसका मलिन अन्तःकरण है, वह मावरण है। शुद्ध अन्तःकरण में जैसा निश्चय होता है, वैसा ही तत्काल आगे सिद्ध होता है और मलिन अन्तःकरण का निश्चय सिद्ध नहीं होता। इसमें जो शुद्ध, निगावरण रुद्र है, वही आत्मा और सर्वव्यापी है। जो उसका निश्चय होता है, वह सत्य है। राम ने पूछा, हे भगवन्! सदाशिव की चेष्टा तो मलिन है। रूण्डों की माला गले में धारण करते हैं और विभूति लगाकर शमशान में विहार करते हैं। स्त्री बायें अङ्ग में रहती है। आप क्योंकर कहते हैं कि उनका अन्तःकरण शुद्ध है? वशिष्ठजी बोले, हे राम! शुद्ध, अशुद्ध अज्ञानी को कहते हैं। जो शुद्ध रहे, अशुद्ध में न लिप्त हो, वह ज्ञानी है। वह अपने में क्रिया नहीं देखता और उसको शुद्ध-अशुद्ध में राग-द्वेष नहीं होता। ऐसे सदाशिवजी को ग्रहण या त्याग नहीं है। उनकी दृष्टि में जो स्वाभाविक चेष्टा होती है सो हो। वह ऐसे होती है, जैसे आदि परमात्मा विष्णु भगवान् चार भुजा धारण किये जगत् की रक्षा करने के लिए शुद्ध चेष्टा में अवतार लेकर धर्म की रक्षा करते हैं और पापियों को मारते हैं। यह आदि स्फुरण हुआ है।
✽ निर्वाण प्रकरण ✽ १७५
जो क्रिया स्वाभाविक ही आकर प्राप्त हो, उस क्रिया का रागद्वेष करके उनको हेय या उपादेय कुछ नहीं है। उनको क्रिया का अभिमान भी नहीं होता, इसी से क्रिया का बंधन उनको नहीं होता। इससे यह सिद्ध है कि संसार स्फुरण मात्र है। जब तुम फुरने से रहित होगे, तब तुमको त्रिपुटी न भासेगी अर्थात् आत्मा से भिन्न कुछ नहीं भासित होगा। इससे अज्ञानरूप फुरने से रहित होकर जब तुमको आत्मपद का साक्षात्कार होगा, तब तुम जानोगे कि मुझमें स्फुरण, दृश्य, अदृश्य कुछ नहीं, केवल आत्मपद है, जिसमें एक कहना भी नहीं, तो द्वैत कहाँ से हो ?
हे राम ! दृश्य, अदृश्य, फुरना न फुरना और विद्या, अविद्या, ये सब उपदेश के निमित्त कहते हैं, आत्मा में कुछ नहीं कहा जाता। आत्मा एक है, जिसमें द्वैत का अभाव है। जब चित्त परिणाम बहिर्मुख होता है, तब विश्व का भान होता है और जब चित्त अन्तर्मुख परिणाम पाता है, तब अहंता और ममता का नाश होता है और चैतन्य शेष रहता है। जब अतिशय अन्तर्मुख परिणाम होता है, तब चैतन्य भी नहीं कहा जाता, और जब इससे भी अतिशय परिणाम पाता है, तब 'है' या 'नहीं' भी नहीं कहा जाता। हे राम ! ऐसा तुम्हारा आत्मा अपना आप स्वरूप और शान्तपद है। उसमें वाणी की गति नहीं कि वह ऐसा है या वैसा है, यह कहा जाय। ऐसा कहिये तो इन्द्रियों का विषय है और वैसा कहिये तो इन्द्रियों से परे है। जब तुम अपने में स्थित होगे, तब जानोगे कि मुझमें अहं का फुरना कुछ नहीं है। आत्मरूपी सूर्य का साक्षात्कार होने से दृश्यरूपी अन्धकार का अभाव हो जायगा क्योंकि आत्मा तुम्हारा अपना रूप है जो केवल शान्तरूप और निर्मल है। जैसे गम्भीर समुद्र वायु से रहित होता है, वैसे ही आत्मरूपी समुद्र संकल्परूपी वायु से रहित गम्भीर और शुद्ध है। यह संसार चित्त का चमत्कार है। यह निरंश है, इसमें अंशांशी भाव नहीं-यह अद्वैत है। हे राम ! जब ऐसे बोध में स्थित होगे, तब इस विश्व को भी आत्मरूप देखोगे। यदि बोध बिना
१७६ * योगवाशिष्ठ *
देखोगे तो विश्व का भान होगा। इससे हे राम! बोध में स्थित रहो।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे ब्रह्मैकत्वप्रतिपादनं नाम षष्टितमःसर्गः॥ ६० ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! सदाशिव का आदि में स्फुरण हुआ है। वह त्रिनेत्र है, विश्व का संहार करते हैं और सिरों की माला धारण किये हैं। ब्रह्मा के चार मुख हैं और चारों वेद हाथ में हैं। वह संसार की उत्पत्ति करते हैं। उनकी ऐसे ही उत्पत्ति हुई है। हे राम! ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र, ये तीनों एकरूप हैं। इनकी यही चेष्टा स्वाभाविक है। उन्होंने यह अपना कर्म न राग से अङ्गीकार किया है और न द्वेष करके उसका त्याग करते हैं। उनकी यह संज्ञा भी लोगों के देखने के लिए है। वे अपनी जान में कुछ नहीं करते; क्योंकि बोध में ही उनका जाग्रत है। बोध में जाग्रत क्या और कैसे होता है सो भी सुनो। बोध सांख्यमार्ग से होता है और जाग्रति योगमार्ग से होती है। सांख्यमार्ग है तत्त्व और मिथ्या को विचारना। तत्त्व इस ज्ञान को कहते हैं कि मैं आत्मा, सत् और चैतन्य हूँ, और सब दृश्य मिथ्या, जड़ और असत् हैं। अज्ञान मुझमें कल्पित है। असल में मैं अद्वैत आत्मा हूँ और मुझमें अज्ञान और दृश्य, दोनों नहीं हैं। ऐसे निश्चय में स्थित होना सांख्यविचार है। योग प्राणों के स्थिर करने को कहते हैं। जब प्राण स्थिर होते हैं, तब मन भी स्थिर हो जाता है और जब मन स्थिर होता है तब प्राण भी स्थिर होते हैं—इनका परस्पर सम्बन्ध है।
राम ने पूछा, हे भगवन्! जो प्राण ही स्थिर होने से जीव मुक्त होता है, तो मृतक पुरुषों के तो प्राण नहीं रहते—वे सब मुक्त होने चाहिए? वशिष्ठजी बोले, हे राम! प्रथम तो श्रवण करो कि प्राण क्या पदार्थ है। यह जीव पुर्यष्टका में स्थित होकर जैसी वासना करता है, शरीर को त्यागकर उसी के अनुसार आकाश में स्थित होता है। उसी का नाम प्राण है। उस वासनारूप प्राण से फिर उसको संसार का भान होता है और जब प्राण की वासना क्षय होती है तब वह मुक्त होता है। ज्ञानी की वासना क्षीण हो जाती है, इससे वह जन्म-मरण
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ १७७
से रहित होता है। जैसे भुना बीज फिर नहीं उगता, वैसे ही ज्ञानी को वासना के अभाव मे जन्म-मरण नहीं होता। हे राम ! जन्म-मरण दोनों मार्गों से निवृत्त होता है और उसे दोनों का फल कहा है। हे राम ! ज्ञान मे चित्त सत्यपद को प्राप्त होता है और योग मे प्राणवायु स्थिर होती है। तब वासना का क्षय हो जाता है। जब स्वरूप की प्राप्ति होती है, तब संसार के पदार्थों का अभाव हो जाता है। जैसे रसायन मे ताँबा सोना हो जाता है, फिर ताँबे का भाव नहीं रहता, वैसे ही ज्ञान मे विश्वरूपी ताँवे की संज्ञा नहीं रहती। जैसे ताँबे का ताँवापन जाता रहता है, वैसे ही ज्ञान मे जब चित्त सत्यरूप हुआ तब फिर संसारी नहीं होता। आत्मा में न बन्धन है और न मोक्ष। परमात्मा एक अद्वैत है। तब उसमें बन्ध कहाँ और मोक्ष कहाँ ? बन्धन और मुक्ति चित्त की कल्पना है। और जो चित्त को शान्त करने का उपाय कहा है उससे वह शान्त होता है। इसी को मुक्ति कहते हैं। और बन्धन-मुक्ति कोई नहीं। चित्त के उदय होने का नाम बन्धन है और चित्त का शान्त होना ही मुक्ति है।
हे राम ! जब मन अपने वश होता है, तब आत्मपद प्राप्त होता है। अथवा जब प्राण स्थिर होते हैं, तब आत्मपद प्राप्त होता है। यह संसार मृगतृष्णा के जल सा मिथ्या है। जब वासना निवृत्त होती है, तब आत्मपद में स्थिति होती है। जैसे मेघ जब जल-संयुक्त होते हैं, तब गर्जते हैं और वर्षा करते हैं और जब वर्षा से रहित होते हैं तब शान्त हो जाते हैं, वैसे ही जब वासना का क्षय होता है, तब चित्त शान्त हो जाता है। जैसे शरत् काल में बादल और कुहरा निवृत्त होकर शुद्ध और निर्मल आकाश ही रहता है वैसे ही वासना के निवृत्त होने से शुद्ध और केवल चैतन्य आत्मा होकर भासित होता है। जो तुम एक मुहूर्त भी चित्त बिना स्थित हो तो तुमको आत्मपद की प्राप्ति हो। जब तक चित्त की वासना क्षय नहीं होती तब तक जीव बड़े भ्रम देखता है। हे राम ! यह संसार मृगतृष्णा के जल सा असत् है और आभासमात्र स्फुरता है। इस पर एक आख्यान जो पहले कभी हुआ है, सो कहता हूँ, मन
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* योगवाशिष्ठ *
लगाकर सुना । दक्षिण दिशा में एक मन्दराचल पर्वत है । उसकी कन्दरा में महाभयानक आकार का एक बेताल रहता था और मनुष्यों को खाता था । उसके मन में विचार उपजा कि किसी नगर के जीवों का भोजन करूँ । पर वह एक समय साधु का संग भी करता था, और एक साधु को खा भी जाता था । उस साधु-संग के प्रसाद से बेताल के मन में यह आया कि मेरी कौन गति होगी ? मेरा आहार मनुष्य है और मनुष्यों को भोजन करना बड़ी हत्या है । इससे में एक वृत्ति बाँध नूँ कि जो मूर्ख और अज्ञानी मनुष्य हों, उनको भोजन करूँ और जो उत्तम पुरुष हैं उनको न खाऊँ ।
हे राम ! निदान वह बेताल क्षुधातुर होने पर भी भले मनुष्यों को न खाता था । इसी प्रकार एक समय वह क्षुधा से बहुत व्याकुल हो रात्रि के समय घर से बाहर निकला तो संयोगवश उस नगर के राजा से, जो वीर यात्रा को निकला था, भेंट हो गई । बेताल ने कहा, हे राजन् ! तुम मुझे भोजन मिले हो । अब में तुमको खाता हूँ । तुम कहाँ जाओगे ? राजा ने कहा, हे रात्रि के विचरनेवाले बेताल ! जो तू मेरे निकट अन्याय से आवेगा तो तेरा माथा हजार टुकड़े हो जायगा और तू मरेगा । बेताल ने कहा, हे राजन् ! मैं तुझसे नहीं डरता । हे अपने हत्यारे ! मैं तुझे भोजन करूँगा; तू चाहे जैसा बली हो, मैं नहीं डरता । परन्तु मेरी एक प्रतिज्ञा है कि में अज्ञानी को भोजन करता हूँ और ज्ञानी को नहीं मारता । जो तू ज्ञानी है तो न मारूँगा और जो अज्ञानी है तो मारूँगा, जैसे बाजपक्षी पक्षियों को मारता है । जो तू ज्ञानी है तो मेरे प्रश्नों का उत्तर दे । एक प्रश्न यह है कि जिसमें यह ब्रह्माण्ड त्रसरेणु के समान है वह सूर्य कौन है ? दूसरा प्रश्न यह है कि जिस पवन में आकाशरूपी अणु उड़ते हैं, वह पवन कौन है ? तीसरा प्रश्न यह है जिसमें केले के वृक्ष की तरह और कुछ नहीं निकलता, वह कौन वृक्ष है ? और चौथा प्रश्न यह है कि वह पुरुष कौन है, जो स्वप्न में स्वप्न और फिर उसमें और स्वप्न देखता है और एक रहता है, परिणाम को नहीं प्राप्त होता ? इन प्रश्नों का उत्तर दे ।
✽ निर्वाण प्रकरण ✽ १७६
जो तूने मेरे प्रश्नों का उत्तर न दिया तो तुझे खा जाऊँगा ।
इति श्रीयो० निर्वाणप्रकरणे वेतालप्रश्नोक्तिनामैकषष्टितमसर्गः॥६१॥
राजा बोला, हे वेताल ! इन प्रश्नों का उत्तर सुन । ब्रह्माण्डरूपी एक मिर्च का बीज है और उसमें सतपद आत्मा चैतन्यरूपी तीक्ष्णता है । एक डाल में ऐसी मिर्च कई सहस्र लगी हुई हैं और एक वृक्ष में कई सहस्र ऐसी डालें लगी हैं । ऐसे वृक्ष एक वन में कई सहस्र हैं और ऐसे कई सहस्र वन एक शिखर पर स्थित हैं । ऐसे कई सहस्र शिखर एक पर्वत पर हैं और ऐसे कई सहस्र पर्वत एक नगर में हैं । ऐसे कई सहस्र नगर एक द्वीप में हैं और ऐसे कई सहस्र द्वीप एक भव पृथ्वी में हैं । ऐसे कई सहस्र पृथ्वीभव एक अगड में हैं और ऐसे कई सहस्र अगड एक समुद्र में लहरें लेते हैं । ऐसे कई सहस्र समुद्र एक समुद्र की लहरें हैं और ऐसे कई सहस्र समुद्र एक पुरुष के उदर में हैं । ऐसे कई पुरुषों की एक पुरुष के गले में माला पिरोई हुई है । ऐसे कई लाख-कोटि सूर्य के अणु हैं, जिस सूर्य मे सब प्रकाशमान है । वह सूर्य आत्मा है, जिसमें अनन्त सृष्टि स्थित है । हे वेताल ! जैसे यह सृष्टि भासती है वैसे ही सब सृष्टियाँ जान । जो यह सृष्टि मत्य है तो सब सृष्टि मत हैं और जो यह सृष्टि स्वप्न है तो सब सृष्टियों को स्वप्न सदृश्य जानो । आत्मा ऐसा सूर्य है, जिसमें भिन्न और कोई अणु नहीं और वह सदा अपने आपमें स्थित है । अब बता और क्या पूछता है ? ऐसे आत्मा में स्थित हो जो आत्मसत्तामात्रपद है; जिस सत्तामात्रपद में कालसत्ता हुई है और ऊर्मी में आकाशसत्ता हुई है । ऊर्मी सतपद मे सब सत्ताएँ संकल्प द्वारा उदय हुई हैं और संकल्प के लय होने पर सब लय हो जाती हैं ।
तूने जो प्रश्न किया था कि वह कौन सूर्य है, जिसमें ब्रह्माण्डरूपी त्रसरेणु होते हैं ? वह ब्रह्मसूर्य है, जिससे भिन्न और कुछ नहीं । और केले का वृक्ष जो तूने पूछा था सो केले की तरह विश्व के भीतर-बाहर आत्मा स्थित है । जैसे केले के भीतर देखने में शून्य आकाश ही निक-लता है, वैसे ही विश्व के भीतर-बाहर आत्मा में भिन्न और कुछ मा-
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नहीं निकलना। जो अद्वैत है, उसमें भिन्न द्वैत कुछ नहीं। वह पवन ब्रह्म है, जिस पवन में ब्रह्माण्ड के समूह उड़ते हैं, और वह पुरुष स्वप्न में स्वप्न और आगे और स्वप्न देखता है और एक अपने आपमें स्थित है। चित्त-कला फुरने से अनन्त ब्रह्माण्डों का भान होता है। इसी को स्वप्न कहते हैं। तो भी उससे कुछ भिन्न नहीं। एक ही रूप में वह नट की तरह रहता है और ये सब उसकी आज्ञा में अपना-अपना काम करते हैं। वह सूक्ष्म में सूक्ष्म और स्थूल में स्थूल है। उसमें मन्दराचल पर्वत भी अणु है, ऐसा स्थूल है। उसमें वाणी की गति नहीं। वह अपने आप ही में स्थित है और इन्द्रियों में अगोचर है, इससे सूक्ष्म में सूक्ष्म है और पूर्णता में स्थूल में स्थूल है। हे मूर्ख वेताल! तू किसको खाता है और क्षुधा से क्यों व्याकुल हुआ है? तू तो अद्वैतरूप आत्मा और आनन्दरूप है, अपने आपमें स्थित हो। जब प्रश्न का उत्तर देकर राजा ने ऐसे उपदेश किया, तब वेताल वहाँ से चला और एकान्त स्थान में स्थित हो विचार करने लगा कि ऐसे मृगतृष्णा के जलसदृश झूठे संसार में मुझे क्या प्रयोजन है? फिर एकान्त स्थान में जाकर ध्यान लगाकर आत्मा में धारा-प्रवाह सा स्थित हुआ। धारा प्रवाह प्रवाहक उसे कहते हैं कि आत्मा का अभ्यास दृढ हो, आत्मा से भिन्न कुछ न फुरे और एकरस स्थित हो। ऐसे ध्यान में स्थित होकर वेताल मन आत्मपद को प्राप्त हुआ। हे राम! यह राजा और वेताल का आख्यान तुमको सुनाया। उस आत्मा में ब्रह्माण्ड अणु की नाईं स्थित है, इससे निर्विकल्प आत्मा में स्थित हो और इन्द्रियों को बाहर से समेटकर स्थित करो।
इति श्रीयो० नि० राजावै० वेतालब्रह्मपदप्राप्तिर्नाम द्विपष्टितमसर्गः ६२
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! मैं एक और आख्यान कहता हूँ, उसे सुनो। उसमें भगीरथ राजा की मूढ़ता गई; वह स्वस्थचित्त होकर आत्मपद में स्थित हुआ; अपने आपत्तिप्रवाह (जो सुख-दुख आ) पड़ें, उसे निर्लिप्त होकर भोगना आपत्तिप्रवाह का अर्थ है।) में विचार और पुरुषार्थ से स्वर्गलोक से गङ्गा को पृथ्वी पर ले आया। तुम
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भी वैसे ही विचरें । भगीरथ के पास जो कोई याचक आता था, उसका प्रयोजन वह पूर्ण करता था । जिस पदार्थ को माँगने का संकल्प करके कोई आता तो राजा उसको पूर्ण करता था । जैसे चन्द्रमा को देखकर चन्द्रमणि अमृत पर्मीजती है वैसे ही स्वभाव का दयार्द्र वह राजा था । जो उस राजा से शत्रुभाव रखते थे, उनका वह ऐसे नाश करता था, जैसे सूर्य के उदय होने पर अन्धकार का नाश हो जाता है । जैसे अग्नि से अनेक चिनगारियाँ उठती हैं, वैसे ही वह शत्रुओं पर शस्त्रों की वर्षा करता था । आपतित प्रवाह में स्थिर रहता था—अर्थात् भले-बुरे और सुख दुःख में एक समान रहता था । राम ने पूछा, हे भगवन् ! राजा भगीरथ के मन में क्या आई, जो गंगा को ले आये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! एक समय उसने अपने नगर को देखा कि लोग भले मार्ग को त्यागकर बुरे मार्ग और पापकर्म में लगे हैं और मूर्ख हो रहे हैं । तब लोगों के उपकार के निमित्त उसने तप करके ब्रह्मा, रुद्र और यज्ञ ऋषि का आराधन किया और गंगा के लाने के निमित्त मन्त्र जपने लगा । गंगा का एक प्रवाह स्वर्ग में और एक पाताल में है; राजा भगीरथ ने एक प्रवाह मर्त्यलोक में भी चलाया है । उसने गंगा को लाकर समुद्र का भी उपकार किया । समुद्र को अगस्त्य मुनि ने सुखाया था, गंगा के आने से उस समुद्र का दरिद्र (जल की कमी) भी निवृत्त हुआ । उसके मन में एक विचार आया । संसार को देखकर वह कहने लगा कि एक ही काम बारम्बार करना बड़ी मूर्खता है । मनुष्य नित वही भोगते, वही खाते और फिर वही कार्य करते हैं । जिस कर्म के करने से पीछे सुख मिले, उसके करने में कुछ दोष नहीं; ऐसे वैराग्य से उसने विचार किया कि संसार क्या है ? उस समय में राजा युवा था । जैसे मरुस्थल में कमल उपजना आश्चर्य है, वैसे ही यौवन अवस्था में ऐसा विचार उपजना आश्चर्य है ।
हे राम ! जब राजा के मन में ऐसा विचार उपजा, तब वह घर से निकलकर अपने गुरु त्रितल ऋषीश्वर के निकट पहुँचा और उनसे प्रश्न किया कि हे भगवन् ! वह कौन सुख है, जिसके पाने से जरा और
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मृत्यु के दुःख निवृत्त होते हैं? ये संसार के सुख तो भीतर से खोखले हैं; इनके परिणाम में दुःख है। त्रितल ऋषि बोले, हे राजन्! एक ही ज्ञेय अर्थात् जानने योग्य है, जिसके जानने से शान्तपद प्राप्त होता है। वह ज्ञेय आत्मज्ञान है। यह आत्मा न उदय होता है; न अस्त होता है; ज्यों का त्यों अपने आपमें है। हे राजन्! यह जग और मृत्यु तभी तक है, जब तक अज्ञान है; जब ज्ञानरूपी सूर्य उदय होगा तब अज्ञानरूपी अन्धकार निवृत्त हो जायगा और जीव केवल शान्तपद में स्थित होगा। आत्मानन्द सर्वज्ञ है। उसके जानने से चित्जड़ग्रन्थि टूट जाती है, अर्थात् अनात्म देह-इन्द्र्यादिक में आत्मा का अभिमान करना निवृत्त हो जाता है। सब कर्म भी निवृत्त होने और सब संशय नष्ट हो जाते हैं। ऐसे शुद्ध स्वरूप को पाकर ज्ञानी उर्मी में स्थित होते हैं, जो सत्ता सर्वव्यापी, सर्वगत, नित्य स्थित और उदय-अस्त से रहित है। राजा बोले, हे भगवन्! मैं जानता हूँ कि आत्मा चिन्मात्र सत्ता है और देहादिक मिथ्या है। आत्मा सर्वज्ञ, शान्त और अच्युतरूप है, यह जानता हूँ। परन्तु मुझे शान्ति नहीं मिली, क्योंकि आत्मा चिन्मात्र मुझे नहीं भासता और स्वरूप में स्थिति भी नहीं हुई। इसलिए कृपा करके उपदेश करिये कि मैं स्थित होऊँ।
ऋषि बोले, हे राजन्! तुझसे मैं एक ज्ञान कहता हूँ, जिसके जानने में फिर कोई दुःख न रहेगा और उसमें ज्ञेय में तुमको निष्ठा होगी। तब तुम सर्वात्मारूप हो स्थित होगे और तुम्हारा जीवभाव नष्ट हो जायगा। देह और इन्द्रियों में आत्म अभिमान न करके, पुत्र, स्त्री और कुटुम्ब के दुःख में अपने को दुःखी न मानना; नित्य समचित्त रहकर इष्ट-अनिष्ट की प्राप्ति में एकरस रहना; चित्त को आत्मपद में लगाकर वृत्ति को ओर न जाने देना; एकान्तदेश में स्थित होना और अज्ञानी का संग न करके, ब्रह्मविद्या का सदा विचार करना; ये ज्ञानी के लक्षण तत्त्वज्ञान के दर्शन के निमित्त तुमसे कहे हैं—इससे विपरीत अज्ञान है। हे राजन्! यह ज्ञेय जानने योग्य है; इसके जानने से केवल शान्तपद को प्राप्त होगे और देह का अहंकार भी निवृत्त होगा। हे राजन्! पहले
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अहं होता है और फिर मम होता है; इससे तुम अहं-मम भाव का त्याग करो। जब अहं-मम का त्याग करोगे, तब अहं प्रत्यय में आत्मपद भासित होगा। वह आत्मा सर्वज्ञ है; सब कुछ आप है; स्वतःप्रकाश और आनन्दरूप है, पर सांसारिक विषय-भोग के सुख-दुःख से रहित है।
जब ऐसे गुरुजी ने कहा, तब राजा बोला, हे भगवन् ! यह अहंकार तो चिरकाल से देह में रहता है और अभिमानी है। उसका क्योंकर त्याग करूँ ? ऋषि बोले, हे राजन् ! अहंकार पुरुष के प्रयत्न से निवृत्त होता है। पहले भोगों में दोष-दृष्टि करना; फिर भोगों की वासना न करना; बारम्बार अपने स्वरूप की भावना करना और विचार करना। इससे तुम्हारा जीवत्व (अहंकार) निवृत्त हो जायगा। हे राजन् ! जब तुम्हारा अहंकार निवृत्त होगा, तब तुमको सर्वत्र आत्मा ही भासित होगा और दुःख से रहित शान्तरूप का प्रकाश होगा। हे राजन् ! यह लज्जा अर्थात संग या आसक्तिरूप फाँसी, जब तक नहीं कटती, तब तक आत्मपद की प्राप्ति नहीं होती। अहं, मम, तृष्णा, शोक, दुःख और भला कहाने की इच्छा इत्यादि जो मोह के स्थान हैं, उन्हें लज्जा कहते हैं। इससे तुम अहं-मम से रहित बनो। तुम्हारे शत्रु जो राज्य लेने की इच्छा करते हैं, उनको अपना राज्य दे दो और क्षोभ से रहित होकर पुत्र, स्त्री और बान्धवों के मोह से रहित बनो। अपने शरीर में जो मोह है उससे भी रहित होकर राज्य का त्याग करके एकान्तदेश में स्थित हो और इन शत्रुओं के घर में भिक्षा माँगो, जिसमें तुम्हें श्रेष्ठ या भला कहलाने की इच्छा न रहे। अब उठो और जाओ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भगीरथोपदेशो नाम त्रिषष्टितमसर्गः ॥ ६३ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब इस प्रकार त्रितल ऋषीश्वर ने उपदेश किया, तब राजा उठ खड़ा हुआ और घर को गया। गुरु का उपदेश हृदय में रखकर, अपने राज्य में रहकर राज्य करने लगा और मन में तत्त्व-विचार भी करता रहा। जब कुछ काल बीता, तब राजा ने अग्निष्टोम यज्ञ का आरम्भ किया। धन का त्याग करने को अग्निष्टोम
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यज्ञ कहते हैं। तीन दिन में धन का त्यागकर हाथी, घोड़े, रथ, भूषण, वस्त्र इत्यादिक जो ऐश्वर्य था सो लोगों को दे दिया। ब्राह्मण, अर्थी, पुत्र, स्त्री और शत्रुओं को सब पृथ्वी का राज्य दे दिया तब शत्रुओं ने जाना कि अब राजा भगीरथ में कुछ पराक्रम नहीं रहा। तब उन्होंने आकर उनका देश घेर लिया, हवेली पर चढ़ आये और राजा के सब स्थान रोक लिये। राजा के पास केवल धोती-अँगौछा रह गया। तब राजा वहाँ से निकलकर वनों में विचरने लगा और शान्तपद आत्मा में स्थित हुआ।
जब कुछ काल बीता तो भगीरथ फिर अपने देश में आया और अपने शत्रुओं के घर में भिक्षा माँगने लगा। तब शत्रुओं और दूसरे लोगों ने उसकी बहुत पूजा की और कहा, हे भगवन् ! तुम अपना राज्य लो। पर उसने राज्य न लिया। जैसे पृथ्वी पर पड़े तृण को तुच्छ समझकर कोई नहीं ग्रहण करता वैसे ही उसने राज्य नहीं ग्रहण किया। कुछ काल वहाँ रहकर त्रितल ऋषि के पास, जो उसका गुरु था, इच्छारहित होकर गया। गुरु ने आत्मदृष्टि से उसे ग्रहण किया। शिष्य ने भी गुरु को आत्मदृष्टि से ग्रहण किया। गुरु और शिष्य की भावना से रहित हो वे दोनों कुछ काल तक एक स्थान में रहे और फिर वन में इकट्ठे विचरने लगे। वे शान्त और आत्मपद में स्थित रहकर रागद्वेष से रहित केवल एकरस स्थित रहे। उनको न देह त्यागने की इच्छा थी, न देह रखने की। केवल स्वयं प्राप्त अनिच्छित प्रारब्ध में स्थित रहते थे। इतने में स्वर्गलोक के सिद्धों ने आकर उनकी पूजा की और बड़े ऐश्वर्य के पदार्थ चढ़ाये। बहुत सी अप्सराएँ आईं और जितने ऐश्वर्य के भोग पदार्थ थे, वे आये। पर उनको उन्होंने तुच्छ जाना; क्योंकि वे आत्मसुख में तृप्त और केवल आकाश-सदृश निर्मल शुद्ध थे अर्थात् प्रकाशरूप, समचित्त, कलङ्कतारूपी मल से रहित थे। हे राम ! जैसे राजा भगीरथ स्थित हुए हैं, वैसे ही तुम भी स्थित हो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे निर्वाणवर्णनन्नाम चतुःषष्टितमस्सर्गः ॥ ६४ ॥
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वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब कुछ काल बीता तो भगीरथ वहाँ से चला और एक देश में पहुँचा, जहाँ का राजा मर गया था और उसकी राजलक्ष्मी राजा को चाहती थी। राजा भगीरथ भिक्षा माँगता फिरता वहाँ पहुँचा। उस राजा के मन्त्री ने भगीरथ को देखा कि जो कुछ गुण और लक्षण राजा में होने चाहिए, वे इसमें हैं। इसलिए वह राजा भगीरथ से बोला, हे भगवन् ! आप इस राज्य को अङ्गीकार कीजिये; क्योंकि आपको यह बिना चाहे प्राप्त हुआ है। निदान राजा ने उस राज्य को ग्रहण किया और उसे न भला जाना, न बुरा। फिर राजा हाथी पर सवार हो सेना सहित सुशोभित हुआ। देश और सब स्थान सेना से पूर्ण हुए। जैसे मेघ से सरोवर पूर्ण होते हैं, वैसे ही वह देश और स्थान सेना से पूर्ण हो गये। नगाड़े और साज बजने लगे। तब राजा राजभवन में गया और महल की सब स्त्रियाँ आईं। इतने में जहाँ का राज्य भगीरथ ने पहले किया था, उस देश से मन्त्री और प्रजा जन आये। उन्होंने भगीरथ से कहा, हे भगवन् ! जिन शत्रुओं को तुमने राज्य दिया था, उनको मृत्यु ने भोजन कर लिया है। जैसे मछली मल मांस को खा लेती है, वैसे ही उनको मृत्यु ने भोजन कर लिया है। इससे अब चलकर तुम राज्य करो। यद्यपि इच्छा तुमको नहीं है, पर तो भी राज्य करो, क्योंकि जो वस्तु अनिच्छित प्राप्त हो उसका त्याग करना श्रेष्ठ नहीं।
इतना सुन राजा ने उस राज्य को भी अङ्गीकार किया और राज्य करने लगा। फिर राजा ने पिछला वृत्तान्त स्मरण कर कि मेरे पितर कपिल मुनि के शाप से भस्म हो कूप में पड़े हैं, यह विचार किया कि मैं उनका उद्धार करूँ; इसलिए अपने मन्त्री को राज्य देकर वह अकेला वन को चला और इच्छा की कि तप करूँ। निदान एक स्थान में स्थित होकर तप करने लगा। गङ्गा को पृथ्वी पर लाने के निमित्त उसने ब्रह्मा, रुद्र और जगत् ऋषि का सहस्र वर्ष पर्यन्त आरा-धन किया। तब गङ्गा, जो विष्णु भगवान् के चरणों से प्रकट हुई हैं, मध्य मण्डल में आईं। जब राजा पितरों के उद्धार के निमित्त गङ्गा के
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प्रवाह को से आया, तब फिर समुचित और शान्तपद में स्थित होकर विचरने लगा। उसमें क्षोभ, भय और इच्छा न थी। वह केवल शान्त आत्मपद में स्थित हुआ। जैसे पवन से रहित समुद्र स्थिर होता है, वैसे ही संकल्प-विकल्प से रहित होकर वह राजा स्थिर हुआ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भगीरथोपाख्यानसमाप्तिर्नाम पञ्चषष्टितमस्सर्गः ॥ ६५ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह जो भगीरथ की दृष्टि तुमसे कही है उसका आश्रय करके विचरो। यह दृष्टि सब दुःखों का नाश करती है। एक और ऐसा ही प्राचीन आख्यान है। ऐसे ही एक शिखिध्वज राजा हुआ था। इतना सुन राम ने पूछा, हे भगवन्! वह शिखिध्वज कौन था और उसका आचरण कैसा था, सो कृपा करके कहिये? वशिष्ठजी बोले, हे राम! सात मन्वन्तरों के बीतने के उपरान्त द्वापर-युग की चौथी चौकड़ी में राजा शिखिध्वज हुआ है और आगे फिर भी होगा। वह राजा सम्पूर्ण पृथ्वी का तिलक, महाशूरवीर और सम्पूर्ण ऐश्वर्य से सम्पन्न था, परन्तु उसमें बँधा हुआ या लिप्त न था। वह बड़े भोग भोगता था; बड़े ओज से सम्पन्न, उदार और धैर्यवान था। किसी के साथ अन्याय न करता था। समचित्त, शान्तपद में स्थित और सम्पूर्ण दुःखों से रहित था। याचक की सब प्रार्थना पूर्ण करता था। राम ने पूछा, हे भगवन्! ऐसा ज्ञानवान् राजा फिर क्यों जन्म पावेगा? ज्ञानी तो फिर जन्म नहीं पाता? वशिष्ठजी बोले, हे राम! जैसे एक समुद्र में कई समान तरङ्ग उठते हैं, कई अर्द्धसम और कई विलक्षण भाव से उठते हैं, वैसे ही आत्मसमुद्र में कई आकार एक से, कई अर्द्ध और कई विलक्षण भाव से उठते हैं, जो समान होते हैं, उनकी चेष्टा और आकार एक से दृष्टि आते हैं। इसी प्रकार शिखिध्वज की ऐसी ही उत्पत्ति होगी।
हे राम! जब इस सर्ग में सात मन्वन्तर और चार चौकड़ी द्वापर युग की बीत जायेंगी, तब जम्बूद्वीप के मालव देश में एक श्रीमान् शिखिध्वज राजा होगा। परन्तु वह आगे होनेवाला उस सा शिखर
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ १८७
ध्वज दूसरा होगा, वह न होगा। प्रथम शिखिध्वज जब षोडश वर्ष का राजकुमार था, तब एक समय शिकार को निकला। वसन्त ऋतु का समय था, राजा अपने बाग में जा ठहरा, जहाँ फूलों के विचित्र कुंजभवन बने हुए थे। कमलिनियाँ मानों स्त्रियाँ और धूलि के कण उनके भूषण थे। उनके समीप पुष्पवृक्ष लगे थे। इसी प्रकार मँवरी और भँवरों की सुन्दर लीला देख राजा को विचार उपजा कि मुझे स्त्री प्राप्त हो तो मैं भी केलि करूँ। निदान उसे अधिक चिन्तना हुई कि कब मुझे स्त्री मिलेगी और कब उसके साथ फूल की शय्या पर शयन करूँगा। जब राजा इस प्रकार भोग का चिन्तन करने लगा, तब मन्त्रियों ने, जो त्रिकाल ज्ञान रखते थे और राजा के शरीर की अवस्था जानते थे, जाना कि हमारे राजा का मन स्त्री पर है, इससे अब राजा का विवाह करना चाहिए निदान एक राजा की कन्या जो बहुत सुन्दरी थी और वर चाहती थी, उससे राजा शिखिध्वज का विवाह शास्त्र की विधि से किया गया और राजा बहुत प्रसन्न होकर अपने घर आया।
उस स्त्री का नाम चूडाला था। वह बहुत सुन्दरी थी। उससे राजा की बहुत प्रीति हुई और उस स्त्री का भी राजा में बहुत स्नेह हुआ। जो कुछ राजा मन में चाहता, वह रानी पहिले ही पूरा कर देती थी। उनकी परस्पर प्रीति ऐसी बढ़ी, जैसे भँवरे और भँवरी में होती है। एक समय राजा मन्त्रियों को राज्य का भार सौंपकर वन को गया और वहाँ नाना प्रकार की क्रीड़ाएँ करते हुए दोनों ऐसे विचरते रहे, जैसे सदाशिव और पार्वती या विष्णु और लक्ष्मी विचरें। इसके पश्चात् राजा योगकला सीखने लगे। इधर रानी राजा को भोगकला सिखाती थी। इसी प्रकार वे दोनों सम्पूर्ण कलाओं में पारंगत हुए। चूडाला की बुद्धि राजा की बुद्धि से तीक्ष्ण थी। वह शीघ्र ही सब बातें जान लेती और राजा को सिखाती थी।
इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शिखिध्वज चूडालोपाख्यानं नाम षट्षष्टितमसर्गः ॥ ६६ ॥
१८८ * योगवाशिष्ठ *
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इसी प्रकार जब राजा और रानी ने अनंत भोग भोगे तो जैसे कुम्भ में छिद्र होने से शनैः शनैः जल निकलता है, वैसे ही शनैः शनैः उनके यौवन के दिन निकल गये । जब वृद्धा-वस्था आई, तब राजा और रानी को वैराग्य उत्पन्न हुआ । वैराग्य में वे यह विचारने लगे कि यह संसार मिथ्या और बिनाशी है, एक सा नहीं रहता और ये भोग भी मिथ्या हैं। इतने काल तक हम इन्हें भोगते रहे, पर तृष्णा पूर्ण न हुई—बढ़ती ही गई । हे राम ! इस प्रकार राजा और रानी वैराग्य से विचारते रहे कि ये भोग मिथ्या हैं और हमारी यौवन अवस्था भी व्यतीत हो गई है । जैसे बिजली का चमत्कार क्षणमात्र होकर लीन जाता है, वैसे ही उनकी यौवन अवस्था व्यतीत हो गई और मृत्यु निकट आई है । जैसे नदी का वेग नीचे चला जाता है, वैसे ही आयु व्यतीत हो जाती है और जैसे हाथ पर जल डालने से बह जाता है, वैसे ही यौवन अवस्था निवृत्त हो जाती है । जैसे जल में तरङ्ग और बुलबुले उपजकर लीन हो जाते हैं, वैसे ही यह शरीर क्षणभंगुर है । जहाँ चित्त जाता है, वहाँ दुःख भी इसके साथ जाते हैं—निवृत्त नहीं होते । जैसे मांस के टुकड़े के पीछे चील दौड़ती है, वैसे ही जहाँ अज्ञान है, वहाँ दुःख भी पीछे जाते हैं । यह शरीर भी नष्ट हो जायगा । जैसे पका हुआ आम का फल वृक्ष के साथ नहीं रहता, गिर पड़ता है, तैसे ही शरीर भी नष्ट हो जाता है । जो शरीर अवश्य गिरता है उसका क्या आदर करना है । जैसे सूखा पत्ता वृक्ष से गिर पड़ता है, वैसे ही यह शरीर गिर पड़ता है । इसमें हम ऐसा कुछ करें कि संसाररूपी रोग निवृत्त हो । यह संसाररूपीरोग ब्रह्मविद्या की औषध से निवृत्त होता है; ब्रह्मविद्या से ज्ञान उपजता है और आत्मज्ञान से सब दुःख निवृत्त हो जाते हैं । इसके सिवा और कोई उपाय नहीं । इसलिए आत्मज्ञान के निमित्त हम सन्तों के पास जायँ ।
ऐसे विचार करके राजा और चूड़ाला आत्मज्ञानियों के पास चले । वे आत्मज्ञान की बातें करते थे और आत्मज्ञान में ही चित्तभावना कर