सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 978, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 978

१६=

❇ योगवाशिष्ठ ❇

है । ये सब पदार्थ ज्ञानरूप आत्मा बिना सिद्ध नहीं होते । प्रथम आपको जानना है तो और पदार्थ जाने जाते हैं । इसी से ज्ञानवान् सब अपना आप जानता है ।

हे राम ! ये जो कुछ पदार्थ हैं, सो चिन्तन मे हैं । और जितने जीव हैं उनकी संवेदना भिन्न-भिन्न है । संवेदना में अपनी-अपनी सृष्टि है । जैसे किसी सोये हुए पुरुष को अपने स्वप्न की सृष्टि भासित होती है और जो उसके पास बैठा होता है उसको नहीं भासित होती, क्योंकि उसकी दृष्टि विश्व-स्वप्न को नहीं जानती, वैसे ही जो ज्ञानी है, उसको अपना रूप आप ही भासित होता है और इस सब जगत् का वह अपना ही रूप जानता है । अज्ञानी जिस ओर देखता है, उसी ओर पञ्चभूत दृष्टिगोचर होते हैं । जैसे पृथ्वी को खोदने से आकाश ही देख पड़ता है, वैसे ही ज्ञानी चित्तरहित जहाँ देखता है, वहाँ पञ्चभूत ही दृष्टि आते हैं । इससे हे राम ! तुम कामना से रहित हो । कामना ही से बन्धन है और कामना वासना न रहना ही मोक्ष है । आगे जैसी तुम्हारी इच्छा हो वैसा करो । हे राम ! जो न चेतने में अस्त हो जाय, उसके नाश में कृपणता क्या करना है । जो वासना-विनाश से प्राप्त हो, उसको प्राप्त रूप जानो । राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! ये स्वप्न में धीवर और ब्राह्मण से लेकर अनेक रूपी संन्यासी के हुए, फिर उनके उपगन्त क्या हुआ ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ब्राह्मण आदि जितने शरीर थे, वे रुद्र के जगाने पर सुखी हुए । जब सब इकट्ठे हुए, तब रुद्र ने उनसे कहा, हे साधो ! तुम अपने-अपने स्थान को जाओ और कुछ काल अपने पुत्र-कलत्र के साथ भोग भोगो । तब तुम मेरे गण होकर मुझको प्राप्त होगे और महाकल्प में हम सभी विदेहमुक्त होंगे ।

हे राम ! जब रुद्र ने ऐसे कहा, तब सब अपने-अपने स्थान को गये । रुद्र भी अन्तर्धान हो गये । वे अब भी नागों का आकार धारण किये कभी-कभी हमको आकाश में दृष्टिगोचर होते हैं । राम ने पूछा, हे भगवन् ! आपने कहा कि संन्यासी ने धीवर आदि सब शरीर