योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 977, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें✻ निर्वाण प्रकरण ✻ १६७
निश्चय हुआ कि हम चिन्मात्ररूप और आवरण से रहित हैं अर्थात अज्ञान के स्फुरण से रहित हैं।
हे राम ! तब उनके शरीर अलग-अलग देख पड़े, परन्तु चेष्टा भिन्न-भिन्न और निश्चय सबका एक हुआ। उनका नाम शतरुद्र हुआ। हे राम ! सम्पूर्ण विश्व अज्ञान के विकार से होता है, ज्ञान में देखिये तो कुछ नहीं। ऐसे ही उनका संवेदन और निश्चय एकसा हुआ। एक देखे तो जाने कि सब ही मेरे रूप हैं और जब दूसरा देखे तो विचारे कि सब मेरे ही रूप हैं। जैसे समुद्र से जो अनेक तरङ्ग उठते हैं, उनके आकार भिन्न-भिन्न होते हैं और स्वरूप एक-सा ही होता है, वैसे ही ज्ञानवान् पुरुष सारे विश्व को अपना ही स्वरूप देखते हैं और अज्ञानी उनको भिन्न-भिन्न और अपने को उनसे भिन्न जानते हैं। एक को दूसरा नहीं जानता और दूसरे को पहला नहीं जानता। हे राम ! यह विश्व अपना ही स्वरूप है, पर अज्ञान से भिन्न जान पड़ता है। चिन्मात्र में फुरने को अज्ञान कहते हैं। चित्त के चेतने से संसार होता है और न फुरने से वह आत्मस्वरूप ही है। इससे हे राम ! वासना का त्याग करो और कुछ नहीं, जिस प्रकार शत्रु मरे उस प्रकार मारिये—यहाँ यत्न करो। अब मैं तुमसे ऐसा उपाय कहता हूँ, जिसमें कुछ यत्न नहीं और शत्रु भी मारा जायगा। हे राम ! यह चिन्तना ही दुःख है और चिन्तना से रहित होना ही सुख है—आगे जो तुम्हारी इच्छा हो सो करो। इस चित्त के चिन्तन से संसार है और निवृत्त होने में स्वरूप-बोध। जैसे पत्थर में पुरुष पुतलियों की कल्पना करता है तो उसमें पत्थर से भिन्न पुतलियों का अभाव है, वैसे ही चित्त ने विश्व की कल्पना की है। जब चित्त निवृत्त हो, तब विश्व अपना ही स्वरूप है; भिन्न नहीं। चित्त से जहाँ जाता है वहाँ पञ्चभूत ही देख पड़ते हैं, आत्मा नहीं देख पड़ता। और चित्त से रहित ज्ञानी जहाँ जाता है वहाँ आत्मा ही दीखता है। जब चित्त की वृत्ति बहिर्मुख होती है, तब संसार होता है और पञ्चभूत ही दृष्टिगोचर होते हैं और जब चित्त की वृत्ति अन्तर्मुख होती है, तब अपना ज्ञानरूप आप ही भासित होता