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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 976, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 976

१८६ ✻ योगवाशिष्ठ ✻

अमर्त्ता है । तब उन्होंने धीवर को चित्तशक्ति में जगाया और वह उठ खड़ा हुआ । तो उसको ऐसा स्मरण हुआ कि मुझे तो इन्होंने जगाया ।

फिर धीवर के मन में विचार हुआ कि इतने शरीर मेरे और भी हैं । निदान रुद्र, संन्यासी और धीवर तीनों चले । इन्होंने विचार किया कि हमने इतने शरीर क्योंकर पाये ? आदि में तो मैं एक परमात्मा में चैतन्यान्मुख होकर संन्यासी हुआ । फिर संन्यासी धीवर हुआ और मद्यपान करने लगा । फिर ब्राह्मण होकर वेद का पाठ करने लगा और उसके पुण्य से राजा का शरीर धारण किया । उसके बाद जो बड़ा पुण्य प्राप्त हुआ, उससे चक्रवर्ती राजा हुआ । चक्रवर्ती राजा के शरीर में काम बहुत हुआ, उससे देवता की स्त्री हुआ । स्त्री के शरीर में नेत्रों में बहुत प्रीति थी, उससे हरिणी हुआ। फिर भँवरी हुआ। उसके बाद बेल हुआ और इसके बाद जो शरीर धारण किये सो मिथ्या धारण किये और अज्ञान में बहुत काल भटकता रहा । अनेक वर्ष और सहस्रों युग व्यतीत हो गये हैं । संन्यासी से लेकर रुद्र पर्यन्त वासना के कारण जन्म पाये हैं । इतने जन्म पाकर ब्रह्मा का हंस हुआ । तब वहाँ ज्ञान की प्राप्ति हुई, क्योंकि पूर्व में अभ्यास किया था, उससे अकस्मात सत्संग प्राप्त हुआ । ऐसा विचार करके वे वहाँ से चले और चैतन्य आकाश में उड़कर वेदपाठ करनेवाले ब्राह्मण की सृष्टि में गये तो उसको देखा कि मरा-सा पड़ा है । चित्तशक्ति में उन्होंने उसको जगाकर रुद्र, संन्यासी, मद्यपान करनेवाला धीवर और ब्राह्मण, चारों वहाँ से चले और चिदाकाश में उड़कर राजा की सृष्टि में पहुँचे तो देखा कि राजा की देह चेष्टा करती है । राजा, जिसकी देह सुवर्ण की नाईं शोभायमान है, अपने मन्दिर में रानी समेत शय्या पर सोये हैं और सहेलियाँ चँवर डुला रही हैं । तब उन्होंने राजा की चित्तशक्ति में जगाया । उसने देखा कि सब विश्व मेरा ही स्वरूप है और इतने शरीर मैंने अज्ञान में धारण किये हैं । निदान रुद्र, संन्यासी मद्यपान करनेवाला धीवर, ब्राह्मण और राजा वहाँ से चले और हाथी आदि जितने शरीर धारण किये थे, उन सबको जगाया । उनमें यही