योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ १६५
मूर्ख हाथी बेल तोड़कर खा गया । उसके उपरान्त उस बेल ने हाथी का शरीर पाकर बड़ा दुःख पाया और गड्ढे में गिरा । थोड़े समय के उपरान्त हाथी को स्वप्न हुआ और वह भँवरी होकर कमलों में विचरने लगा । जब कुछ काल बीता तो फिर वह बेल हुआ और उस बेल के निकट एक हाथी आया और उस हाथी के पाँवों में वह बेल चूर्ण हो गई । तब उस बेल को एक हंस ने खाया । तब वह बेल हंस होकर बड़े मानसरोवर में विचरने लगी । फिर उस हंस के मन में आया कि मैं ब्रह्मा का हंस होऊँ । तब वह अपने संकल्प से ब्रह्मा का हंस बन गया जैसे जल का तरङ्ग बन जावै । तब ब्रह्मा के उपदेश से हंस को आत्मज्ञान प्राप्त हुआ ।
हे राम ! अज्ञान से ऐसे भ्रम में पड़कर फिर ज्ञान से वह भ्रम शान्त हुआ । फिर विदेह और मुक्त वह होगा । वह हंस सुमेरुपर्वत में उड़ा जाता था । तब उसके मन में आया कि मैं रुद्र होऊँ । इसलिए मन संकल्प से रुद्र हो गया । जैसे शुद्ध दर्पण में शीघ्र ही प्रतिबिम्ब पड़ता है, वैसे ही शुद्ध अन्तःकरण के संकल्प से तुरन्त वह रुद्र हो गया । जिसको अनुत्तर ज्ञान हो, उसको रुद्र कहते हैं और अनुत्तर ज्ञान वह है जिसके पाने से और कुछ पाने को नहीं रह जाता । ध्यान से अपने को देख उस रुद्र के मन में विचार हुआ कि बड़ा आश्चर्य है कि मैं अज्ञान से इतने बड़े भ्रम को प्राप्त हुआ था । बड़ी आश्चर्यमयी माया है । मैं तो एक ओर पड़ा हूँ और यह विश्व मेरा स्वरूप है । पूर्व कल्पित जो मेरे शरीर हैं, उनको अब जाकर जगाऊँ । तब रुद्र उठ खड़ा हुआ और अपने स्थान को चला । प्रथम संन्यासी के शरीर को आकर देखा और चित्तशक्ति से उसे जगाया तो संन्यासी के शरीर में ज्ञान हुआ कि सबमें मैं ही स्थित हूँ । परन्तु संन्यासी ने जाना कि मुझको रुद्र ने जगाया है और इतने शरीर मेरे और भी हैं । फिर वहाँ से वह रुद्र और संन्यासी दोनों चले और झींवर के स्थान में आये तो देखा कि झींवर शव की नाईं पड़ा है; मदिरा के बर्तन पड़े हैं, चेतना भी वहीं भ्रमती है और नाना प्रकार के स्थान देखती है-जैसे भग्ने के छिद्र में चींटी