योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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दखता है। इस विषय का एक इतिहास कहता हूँ, उसमें मन लगाकर सुनो। एक मननशील संन्यासी योग के आठवें अङ्ग 'समाधि' में स्थित था। उसका हृदय समाधि करते-करते शुद्ध हो गया था। वह समाधि में दिन बिताता और जब समाधि खुलती तो फिर आसन लगाकर समाधि में लग जाता था। इसी प्रकार जब बहुत काल बीता तो एक समय समाधि खुलने पर वह एक चिन्तन करने लगा कि जैसे साधारण पुरुष विचरते और चेष्टा करते हैं, वैसे ही मैं भी कुछ चेष्टा रचूँ। ऐसा विचार कर उसने मन के संकल्प से विश्व की कल्पना की और उसमें आप भी एक बना। उसका नाम धीवर हुआ। निदान वह मद्यपान करता और ब्राह्मणों की सेवा भी करता। चेष्टा करते-करते वह सो गया। स्वप्न में उसको ब्राह्मण के शरीर का भान हुआ तो वह उस ब्राह्मण शरीर में वेद का अध्ययन और पाठ करने लगा। ऐसी चेष्टा में जब उसे चिरकाल बीता तो फिर स्वप्न हुआ। उसमें उसने अपने को बड़ी सेना से युक्त राजा देखा और उस सेना के साथ वह राजा होकर विचरने लगा।
कुछ काल जब इसी प्रकार व्यतीत हुआ तो फिर स्वप्न हुआ और उस स्वप्न में उसने अपने को चक्रवर्ती राजा देखा। वह चक्रवर्ती होकर सारी पृथ्वी पर आज्ञा चलाने लगा। जब कुछ काल बीता तो फिर अपने को देवाङ्गना के रूप में देखा। वह देवता के साथ बाग में विचरने लगी और जैसे बेल वृक्ष के साथ शोभा पाती है, वैसे ही वह देवता के साथ शोभा पाने लगी। इसी प्रकार जब कुछ काल देवता के साथ बीता तो फिर स्वप्न हुआ और उसमें उसने अपने को हरिणी देखा और वन में चरने लगा। कुछ काल ऐसे भी व्यतीत हुआ तो फिर स्वप्न हुआ और उसने अपने को देवताओं के बाग की बेल देखा। जब ऐसे कुछ समय बीता तो फिर स्वप्न में अपने को भँवरी देखा और सुगन्ध को ग्रहण करने लगा। उसके अनन्तर फिर उसने स्वप्न में देखा कि मैं कमलिनी हूँ। वहाँ एक दिन हाथी आकर बेल को खा गया। जैसे कोई मूर्ख बालक भली वस्तु को भी तोड़ डालता है, वैसे ही वह