योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
१५६ ॐ योगवासिष्ठ ॐ
को प्राप्त हुए हो। तुम्हारे मन और मोह का निर्वाण हो गया है और तुम सम्यक्ज्ञानी हुए हो। व्यवहार करना और चुप रहना दोनों तुमको तुल्य है; क्योंकि तुम शान्तरूप और निःशब्द को प्राप्त हुए हो। यह मैं जानता हूँ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे श्रीकृष्णसंवादे अर्जुनविश्रान्तिवर्णनं नाम पञ्चपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५५ ॥
अर्जुन बोले, हे अच्युत ! मेरा मोह अब नष्ट हुआ और मुझे आत्म-स्मृति प्राप्त हुई। आपके प्रसाद से मैं अब निर्मदेत हो गया हूँ; अब जो कुछ आप कहिये, वह मैं करूँ। श्रीभगवान् बोले, हे अर्जुन ! मन की पाँच वृत्तियाँ हैं—प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, अभाव और स्मृति। जब ये पाँचों हृदय से निवृत्त हों, तब चित्त शान्त हो। उसके पीछे चेत से रहित चैतन्य जो शेष रहता है, उसको प्रत्यक् चैतन्य कहते हैं। वह वस्तुरूप, सब उपाधियों से रहित पूर्ण और सर्वरूप है। जो उस पद को प्राप्त हुआ है, उसको आधि-व्याधि आदिक दुःख नहीं हो सकते। जैसे जाल से निकलकर पक्षी आकाश को उड़ता है, वैसे ही वह देहाभिमान से मुक्त होकर आत्मपद को प्राप्त होता है। हे अर्जुन ! प्रत्यक् चैतन्य सत्ता परम प्रकाशरूप, शुद्ध और संकल्प-विकल्प से रहित है और इन्द्रियों के विषय में नहीं आती, इन्द्रियों से परे है। जो पुरुष सबसे अतीत पद को प्राप्त हुआ है, उसको वासना नहीं स्पर्श कर सकती। उसके प्राप्त होने पर ये घट-पट आदिक पदार्थ सब शून्य हो जाते हैं और वहाँ तुच्छ वासना का कुछ बल नहीं चलता। जैसे अग्नि-समूह के निकट बरफ गल जाती है और उसकी शीतलता नहीं रहती, वैसे ही शुद्ध पद का साक्षात्कार होने पर चित्त वृत्ति नष्ट हो जाती है और वासना का भी अभाव हो जाता है।
हे अर्जुन ! वासना तब तक फुरती है, जब तक मनुष्य संसार को सत्य जानता है। जब आत्मपद की प्राप्ति होती है, तब संसार और वासना का अभाव हो जाता है। इस कारण विरक्त पुरुष की सत्य जान लेने पर कुछ भी वासना नहीं रहती। नाना प्रकार के आकार और
- निर्वाण प्रकरण * | १५७
विकार से संयुक्त अविद्या तब तक फुरती है, जब तक शुद्ध आत्मा का अपने आप से ज्ञान नहीं होता। शुद्ध आत्मा को प्राप्त होने पर जगत-भ्रम नष्ट हो जाता है; मनुष्य स्वच्छपद आत्मतत्त्व में स्थित होता है, आकाश की तरह निर्मलभाव को प्राप्त होता है और अपने आपको सबमें पूर्ण देखता है। वह आत्मसत्ता सब आकाररूप है और सब आकार-रूपों से रहित भी है। हे अर्जुन ! जो शब्द से अतीत परमवस्तु है, उसकी किससे उपमा दी जाय ? जो वासनारूपी विषूचिका को त्याग-कर अपने आत्मस्वभाव में स्थित हुआ पृथ्वी में विचरता है, वह त्रिलोकी का नाथ है।
इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब इस प्रकार त्रिलोकी के नाथ कहेंगे, तब अर्जुन एक क्षण मौन हो जावेंगे और उसके उपरान्त कहेंगे कि हे भगवन् ! मेरे शोक नष्ट हो गये। जैसे सूर्य उदय होने पर कमल खिल जाते हैं, वैसे ही आपके वचनों से मेरा बोध खिल गया है—अब जो कुछ आपकी आज्ञा हो, वह मैं करूँ। इस प्रकार कहकर अर्जुन गाण्डीव धनुष ग्रहण करेंगे और भगवान् को सारथी करके निःसन्देह और निशङ्क होकर युद्ध करेंगे, जिसमें हाथी, घोड़े, मनुष्य मारकर लोहू के प्रवाह बहावेंगे तो भी आत्मतत्त्व में स्थित रहेंगे और स्वरूप से चलायमान न होंगे। जैसे पवन मेघ का अभाव कर देता है, वैसे ही योद्धाओं का नाश करेंगे।
इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे श्रीकृष्ण अर्जुनसंवादे भविष्यद् गीतानामोपाख्यानममासिनामषट्पञ्चाशत्सर्गः ॥ ५६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ऐसी दृष्टि का आश्रय करो, जो दुःख का नाश करती है। निःसंग संन्यासी होकर अपने सब कर्म और चेष्टाओं को ब्रह्म-अर्पण करो। जिसमें यह सब है और जिससे यह सब है, ऐसी सत्ता को तुम परमात्मा जानो ! अनुभवरूप आत्मा है। उसकी भावना से मनुष्य उसी को प्राप्त होता है—इसमें संशय नहीं। जो सत्तासंवेदन से रहित चैतन्य है, उसी को तुम परमपद जानो। वह सबका परम द्रष्टारूप और सबका प्रकाशक है, महा उत्तम परमगुरु
१५८ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
का गुरु है । जिसको शून्यवादी शून्य, विज्ञानवादी विज्ञान और ब्रह्म-वादी ब्रह्म कहते हैं, वह परमसार शान्तरूप शिव अपने आपमें स्थित है । वही आत्मा इस जगतरूपी मन्दिर को प्रकाश करनेवाला दीपक, जगतरूपी वृक्ष का रस, जगतरूपी पशु का पालनेवाला गोपाल और जीवरूपी मोतियों को एकत्र करनेवाला तागा है । हृदय और भूतरूपी मिचों में तीक्ष्णता है । निदान सब पदार्थों में पदार्थरूप सत्ता वही है । सत्य में सत्यता और असत्य में असत्यता वही है । जगतरूपी गृह में सब पदार्थों को प्रकट करनेवाला दीपक वही है और उसी से सब सिद्ध होते हैं । चन्द्रमा, सूर्य, तारे आदि जो प्रकाशरूप दीखते हैं, उनका भी वह प्रकाशक है । यह जड़ प्रकाश है और वह चैतन्य प्रकाश है, उसमें ये सिद्ध होते हैं और उसी से सब प्रकाश प्रकट हुए हैं । वह आत्मसंवित् अपने ही विचार से पाया जाता है ।
हे राम ! जो कुछ भाव-अभाव पदार्थ देख पड़ते हैं, वे असत हैं । वास्तव में कुछ हुए नहीं, प्रमाददोष से भासित होते हैं और जब ज्ञान-विवेक उपजता है, तब नष्ट हो जाते हैं । हे राम ! जिसके हृदय में अहंभाव है, उसे यह जो जगत-जाल मिथ्याभ्रम से भासित होता है, उसको उपजा क्या कहिये और किसकी आस्था कीजिये । यह जगत कुछ वस्तु नहीं । आदि, अन्त, मध्य की कल्पना से रहित जो देव है वह ब्रह्मसत्ता समान अपने आपमें स्थित है । और द्वैत कुछ नहीं बना । जब यह तुमको दृढ़ निश्चय होगा तो तुम व्यवहार करते भी हृदय से निःसंग और शान्तरूप होगे । हे राम ! जिस पुरुष की उस समान-सत्ता में स्थिति हुई है, वह इष्ट-अनिष्ट की प्राप्ति में रागद्वेष से रहित हृदय से सदा शान्तरूप रहता है । वह न उदय होता है, न अस्त होता है; सदा समभाव में स्थित रहता है । वह स्वस्वरूप अद्वैत-तत्त्व में स्थित होता है और जगत को अंग से सुषुप्त सा हो जाता है, व्यवहार भी करता है, परन्तु दर्पण के सदृश उसे क्षोभ नहीं होता । जैसे मणि सब प्रतिबिम्ब को ग्रहण करती है, परन्तु उसका संग नहीं करती, वैसे ही ज्ञानवान् पुरुष कर्मों कलना कलंक को नहीं प्राप्त होता;
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ १५६
उसका चित्त व्यवहार में सदा निर्मल रहता है। ज्ञानवान् को जगत् आत्मा का चमत्कार भासित होता है। वह न एक है, न अनेक। आत्म-तत्त्व सदा अपने आपमें स्थित है। चित्त में जो यह चेतनभाव भासित होता है, उस चित्त के चेतने का नाम संसार है और फुरने से रहित शान्तचित्त का नाम परमपद है।
हे राम ! महा चैतन्य में जो निज का अभाव है कि मैं आत्मा को नहीं जानता, इसी का नाम चित्तस्पन्दन है और यही संसार का कारण है। जब इस भावना का क्षय हो, तब चित्त शान्त हो। हे राम ! जहाँ निजभाव होता है, वहाँ पदार्थों का अभाव होता है। वह निज सत्ता सब ठौर अपने अर्थ को सिद्ध करती है, परन्तु आत्मा में नहीं प्रवृत्त हो सकती। जब जीव कहता है कि मैं आत्मा को नहीं जानता, तब भी आत्मा का अभाव नहीं होता; क्योंकि अभाव को जाननेवाला भी आत्मा ही है। जो आत्मतत्त्व न हो तो अभाव कौन कहे। वह आत्मा परमशून्य है, परन्तु अजड़रूप परम चैतन्य है। हे राम ! तुम निज का अर्थ आत्मा में करो और आत्मा का अभाव न मानो। अनात्म में जो निज का भावत्व है, उसका अभाव करो अर्थात् अनात्म को अभावरूप मानो। जब इस प्रकार दृढ़भावना करोगे, तब संसार का भ्रम निवृत्त हो जायगा और केवल आत्मभाव शेष रहेगा।
हे राम ! चित्त के फुरने का नाम संसार है। चित्त के फुरने से ही संसारचक्र चलता है। जैसे सुवर्ण से भूषण प्रकट होते हैं, वैसे ही चित्त से त्रिपुटी होती। पर चित्तस्पन्दन भी कुछ भिन्न वस्तु नहीं, आत्मा का आभासरूप है। अज्ञान से चित्त स्पन्दन होता है और ज्ञान से लीन हो जाता है। जैसे सुवर्ण के भूषण को लगाने से भूषण-बुद्धि नहीं रहती, वैसे ही चित्त अचल होने पर चित्तसंज्ञा जाती रहती है। और जैसे भूषण के अभाव पर सुवर्ण ही रहता है वैसे ही बोध में चित्त के लीन होने पर शुद्ध चैतन्यसत्ता शेष रहती है। फिर भोगों की तृष्णा लीन हो जाती है और जब भोगभावना निवृत्त होती है, तब ज्ञान का परम लक्षण सिद्ध होता है। हे राम ! जो ज्ञानवान् पुरुष है और जिसने
१६० * योगवाशिष्ठ *
सत्त्वरूप को जाना है, उसको भोग की इच्छा नहीं रहती ! जैसे जो पुरुष अमृतपान से अघा जाता है, उसको भाजी आदि तुच्छ भोजन की इच्छा नहीं रहती, वैसे ही आत्मज्ञान से जो संतुष्ट हुआ है, उसको विषय की तृष्णा नहीं रहती । यह निश्चय करके जानो कि जब चित्त फुरता है, तब जगत्भ्रम भासित होता है और सत्य जानकर भोग की इच्छा होती है; पर जब बोध होता है, तब जगत्भ्रम लीन हो जाता है । तब फिर तृष्णा किसकी करे । यदि इन्द्रियों के विषय प्राप्त हों और हठकर उनको न भोगे, वह मूर्ख है । वह मानों अस्त्र से आकाश को छेदता है !
हे राम ! गुरु और शास्त्रों की युक्ति से मन वश होता है; युक्ति बिना उनकी शुद्धि नहीं होती ! यदि कोई अपने अङ्गों को काटे और उससे चित्त को स्थिर किया चाहे तो भी चित्त स्थिर नहीं होता और न संसारभ्रम ही मिटता है जब तक चित्त में स्थिति है तबतक जगत्भ्रम दीखता है और जब गुरु और शास्त्रों की युक्ति ग्रहण करके चित्त का अभाव होता है, तब चित्त नष्ट और अचल हो जाता है । जैसे बालक को अन्धकार में पिशाच देख पड़ता है और दीपक जलाकर देखने से अन्धकार निवृत्त होकर पिशाचभ्रम नष्ट हो जाता है, तब बालक निर्भय होता है, वैसे ही आत्म-ज्ञानरूप युक्ति से अज्ञान निवृत्त होता है । असम्यक्बुद्धि से जगत्भ्रम हुआ है और सम्यक्बोध से निवृत्त हो जाता है; फिर जाना नहीं जाता कि अज्ञान का जगत्भ्रम कहाँ गया ? जैसे दीपक का निर्वाण होने पर नहीं जाना जाता कि प्रकाश कहाँ गया, वैसे ही अज्ञान नष्ट होने पर नहीं जाना जाता कि जगत् कहाँ गया । चित्त के फुरने से बन्धन होता है और न फुरने से मोक्ष होता है परन्तु आत्मा से भिन्न कुछ नहीं । आत्मसत्ता ज्यों की त्यों है । उसमें न बन्धन है; न मोक्ष है ।
हे राम ! जब मोक्ष की इच्छा होती है, तब भी उसकी पूर्णता का क्षय होता है और निःसंवेदन होने पर कल्याण होता है । जो अना-भान अजड़रूप परमपद है, वह चैतन्योन्मुखत्व से रहित है । हे राम ! बन्धन, मोक्ष आदिक भी कल्पना से होते हैं । जब कल्पना से रहित बोध होता है, तब बन्धन मोक्ष दोनों नहीं रहते । जब तक विचार
☸ निर्वाण प्रकरण ☸
१६१
से नहीं देखा, तब तक बन्धन और मोक्ष भासित होता है। विचार करने में दोनों का अभाव हो जाता है। जब 'अहं', 'इदं' आदिक भावना का अभाव हुआ, तब किसको कौन बन्धन कहे और किसको कौन मोक्ष कहे। सब कल्पना चित्त के फुरने से होती है। जब चित्त का फुरना नष्ट होता है, तब सब कल्पना का अभाव हो जाता है। तभी पुरुष शान्ति पाता है, अन्यथा नहीं। इससे चित्त को आत्मपद में लीन करो। जिसके आश्रय से यह जगत् उपजता और लीन होता है, उर्मी अनुपमरूप प्रत्यक् आत्मप्रकाश ज्ञानरूप आत्मा में स्थित होओ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे प्रत्यगात्मबोधवर्णनं नाम सप्तपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५७ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! परमतत्त्व परमात्मपद हमको सदा प्रत्यक्ष है, और वस्तुरूप वही है, उससे कुछ भिन्न नहीं। यह प्रत्यक् आत्मा सब सत्ता का दर्पण है; सब सत्ता उर्मी में प्रकट होती है। जैसे बीज में वृक्ष की सत्ता प्रकट होती है, वैसे ही आत्मा में जगत् सत्ता प्रकट होती है। हे राम! मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार जडात्मक हैं। परमपद इनसे रहित है। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्रादिक सब उर्मी में स्थित हैं। जैसे चक्रवर्ती राजा निर्धन से ऊँचा है, वैसे ही उस सत्ता को पाकर जीव सब लोगों से ऊँचा हो जाता है। उस आत्मा को पाकर फिर मृत्यु को नहीं प्राप्त होता। न कभी शोकवान होता है, न क्षीण। एक क्षणमात्र भी जो अप्रमादी होकर आत्मा को ज्यों का त्यों जानता है, वह संसार-कल्पना को त्यागकर मुक्त होता है। राम ने पूछा, हे भगवन्! मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार का अभाव होने पर जो सत्ता सामान्य शेष रहती है, उसका भान कैसे होता है?
वशिष्ठजी बोले, हे राम! जो सब देहों में स्थित होकर भोजन और जल-पान करता और देखना, सुनना, बोलना इत्यादि कर्म करना देख पड़ता है, वह आदि-अन्त से रहित, संवित् सत्ता, सर्वगत अपने आप में स्थित है। सब विश्वरूप वही है। आकाश में आकाश, शब्द में शब्द, स्पर्श में स्पर्श, नासिका में गन्ध, शून्य में शून्य, नेत्रों में रूप, पृथ्वी
१६२ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
में पृथ्वी, जल में जल, तेज में तेज, वृक्षों में रस, मन में मन, बुद्धि में बुद्धि, अहंकार में अहंकार, अग्नि में अग्नि, उष्णता में उष्णता, घट में घट, पट में पट, वट में वट, स्थावर में स्थावर, जङ्गम में जङ्गम, चेतन में चेतन, जड़ में जड़, काल में काल, नाश में नाश, बालक में बालक, यौवन में युवा, वृद्धता में वृद्ध और मृत्यु में मृत्युरूप होकर वही परमेश्वर स्थित है ।
हे राम ! इस प्रकार सब पदार्थों में वह अभिन्नरूप स्थित है । नानात्व- दृष्टि भी आती है, परन्तु नाना नहीं है और भ्रम से भासित होती है । जैसे परछाहीं में भ्रम से बेताल जान पड़ता है, वैसे ही आत्मा में नानात्व भासित होता है । सबमें, सब ठौर, सब प्रकार, सब आत्मा ही स्थित है । ऐसा जो आत्मदेव सनातन है, उसमें स्थित हो । इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले कि इस प्रकार जब वशिष्ठजी ने कहा, तब दिन अस्त होने से सब सभासद् परस्पर नमस्कार करके स्नान को गये और सूर्य के निकलते ही फिर अपने-अपने आसन पर आ बैठे ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विभूतियोगोपदेशो नामाष्ट- पञ्चाशत्तमःसर्गः ॥ ५८ ॥
रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! जैसे हमारे स्वप्न में पुर, नगर और मण्डल होते हैं, वैसे ही ब्रह्मादिक ने इस देह को ग्रहण किया है । उनको असत् प्रतीति है, तब हमको दृढ़ प्रतीति कैसे उपजी है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! प्रथम ब्रह्मा को सर्ग अमन मा भासित होता है, वास्तव नहीं । सर्वगत चैतन्य संवित् संसार के दर्शन में जब सम्यक् दर्शन का अभाव हुआ और स्वप्नरूप में आपमे अहंप्रतीति उपजी, तब वह दृढ़ होकर देखने लगा । जैसे अपने स्वप्न में जगन दृढ़ भासता है और मनुष्य उसे स्वप्न नहीं जानता, वैसे ही ब्रह्मा का जगत् भी सत्य भासित होता है, स्वप्न नहीं जान पड़ता है । जो स्वप्न पुरुष में उपजा है, सो स्वप्नरूप है । हे राम ! ऐसा जो सर्ग है, वह जीव जीव प्रति उदय हुआ है । जैसे समुद्र में तरंग निकलते हैं, वैसे ही चैतन्यतत्त्व का आभास जगत् दिखता है । जैसे स्वप्नपुर में असत् पदार्थ होते हैं, वैसे
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ १६३
ही ये पदार्थ भी अवास्तव हैं और मन के संकल्प से भ्रममात्र ही स्पष्ट भासित होते हैं। हे राम! ऐसा पदार्थ कोई नहीं, जो इस जगत में सिद्ध नहीं होता, और का और नहीं भासित होता और मर्यादा नहीं त्यागता; क्योंकि सब पदार्थ मन के संकल्प से उपजे हैं।
तुम देखो कि जल में अग्नि स्थित है—जैसे समुद्र में बड़वाग्नि है, सो विपर्यय है। इसी कारण कहता हूँ कि सब मनोमात्र है। और देखो, आकाश में नगर बसते हैं, विमान प्रत्यक्ष चलते हैं और चिन्तामणि आदि से कमल उपजते हैं—जैसे हिमालय पर्वत में बर्फ और सब ऋतु के फूल एक ही समय उपजते हैं; जैसे संकल्प के कल्पित वृक्ष से पत्थर निकल आते हैं; शिला में जल निकलता है; चन्द्रकान्तमणि में अमृत द्रवित होता है और निमेष में घट पट और पट घट हो जाते हैं। निदान स्वरूप के विस्मरण में जीव सत् को असत् देखता है; जैसे स्वप्न में अपना मरना देखता है; जल ऊपर को चलना देखता है; मेघ होकर स्वर्ग में गंगा बहती देखता है और पत्थर उड़ते देखता है; जैसे पंखों-वाले पहाड़ उड़ते हैं और चिन्तामणि शिलारूप में सब पदार्थ उपजते हैं। इत्यादि बातें भ्रम से नानात्व विपर्ययरूप ही दिखती हैं। इनमें तुम देखो कि सब मनोमात्र हैं, और से और हो जाते हैं। हे राम! यह इन्द्रजाल, गन्धर्व-नगर और शाम्बरी माया के सदृश है। असत् ही भ्रम से सतरूप में भासित होता है। ऐसा पदार्थ कोई नहीं है, जो सत नहीं और असत भी नहीं।
इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जाग्रत्स्वप्न विचारोनामै-कोनषष्टितमसर्गः ॥ ५६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह संसार मिथ्या है। जो पुरुष इसको सत्य जानता है, वह महामूर्ख है और भ्रम में भ्रम देखकर महामोह को प्राप्त होता है। जैसे कोई मृग गढ़े में गिर पड़ता है तो दुःखी होता है और फिर उससे भी बड़े गढ़े में गिरता है तो अति दुःख पाता है; वैसे ही जो मूर्ख पुरुष है, वह आत्मा के अज्ञान से संसाररूपी गढ़े में गिरता है और उसमें अनेक भ्रम देखता है; एक स्वप्न के बाद दूसरा स्वप्न
१८४ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
दखता है। इस विषय का एक इतिहास कहता हूँ, उसमें मन लगाकर सुनो। एक मननशील संन्यासी योग के आठवें अङ्ग 'समाधि' में स्थित था। उसका हृदय समाधि करते-करते शुद्ध हो गया था। वह समाधि में दिन बिताता और जब समाधि खुलती तो फिर आसन लगाकर समाधि में लग जाता था। इसी प्रकार जब बहुत काल बीता तो एक समय समाधि खुलने पर वह एक चिन्तन करने लगा कि जैसे साधारण पुरुष विचरते और चेष्टा करते हैं, वैसे ही मैं भी कुछ चेष्टा रचूँ। ऐसा विचार कर उसने मन के संकल्प से विश्व की कल्पना की और उसमें आप भी एक बना। उसका नाम धीवर हुआ। निदान वह मद्यपान करता और ब्राह्मणों की सेवा भी करता। चेष्टा करते-करते वह सो गया। स्वप्न में उसको ब्राह्मण के शरीर का भान हुआ तो वह उस ब्राह्मण शरीर में वेद का अध्ययन और पाठ करने लगा। ऐसी चेष्टा में जब उसे चिरकाल बीता तो फिर स्वप्न हुआ। उसमें उसने अपने को बड़ी सेना से युक्त राजा देखा और उस सेना के साथ वह राजा होकर विचरने लगा।
कुछ काल जब इसी प्रकार व्यतीत हुआ तो फिर स्वप्न हुआ और उस स्वप्न में उसने अपने को चक्रवर्ती राजा देखा। वह चक्रवर्ती होकर सारी पृथ्वी पर आज्ञा चलाने लगा। जब कुछ काल बीता तो फिर अपने को देवाङ्गना के रूप में देखा। वह देवता के साथ बाग में विचरने लगी और जैसे बेल वृक्ष के साथ शोभा पाती है, वैसे ही वह देवता के साथ शोभा पाने लगी। इसी प्रकार जब कुछ काल देवता के साथ बीता तो फिर स्वप्न हुआ और उसमें उसने अपने को हरिणी देखा और वन में चरने लगा। कुछ काल ऐसे भी व्यतीत हुआ तो फिर स्वप्न हुआ और उसने अपने को देवताओं के बाग की बेल देखा। जब ऐसे कुछ समय बीता तो फिर स्वप्न में अपने को भँवरी देखा और सुगन्ध को ग्रहण करने लगा। उसके अनन्तर फिर उसने स्वप्न में देखा कि मैं कमलिनी हूँ। वहाँ एक दिन हाथी आकर बेल को खा गया। जैसे कोई मूर्ख बालक भली वस्तु को भी तोड़ डालता है, वैसे ही वह
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ १६५
मूर्ख हाथी बेल तोड़कर खा गया । उसके उपरान्त उस बेल ने हाथी का शरीर पाकर बड़ा दुःख पाया और गड्ढे में गिरा । थोड़े समय के उपरान्त हाथी को स्वप्न हुआ और वह भँवरी होकर कमलों में विचरने लगा । जब कुछ काल बीता तो फिर वह बेल हुआ और उस बेल के निकट एक हाथी आया और उस हाथी के पाँवों में वह बेल चूर्ण हो गई । तब उस बेल को एक हंस ने खाया । तब वह बेल हंस होकर बड़े मानसरोवर में विचरने लगी । फिर उस हंस के मन में आया कि मैं ब्रह्मा का हंस होऊँ । तब वह अपने संकल्प से ब्रह्मा का हंस बन गया जैसे जल का तरङ्ग बन जावै । तब ब्रह्मा के उपदेश से हंस को आत्मज्ञान प्राप्त हुआ ।
हे राम ! अज्ञान से ऐसे भ्रम में पड़कर फिर ज्ञान से वह भ्रम शान्त हुआ । फिर विदेह और मुक्त वह होगा । वह हंस सुमेरुपर्वत में उड़ा जाता था । तब उसके मन में आया कि मैं रुद्र होऊँ । इसलिए मन संकल्प से रुद्र हो गया । जैसे शुद्ध दर्पण में शीघ्र ही प्रतिबिम्ब पड़ता है, वैसे ही शुद्ध अन्तःकरण के संकल्प से तुरन्त वह रुद्र हो गया । जिसको अनुत्तर ज्ञान हो, उसको रुद्र कहते हैं और अनुत्तर ज्ञान वह है जिसके पाने से और कुछ पाने को नहीं रह जाता । ध्यान से अपने को देख उस रुद्र के मन में विचार हुआ कि बड़ा आश्चर्य है कि मैं अज्ञान से इतने बड़े भ्रम को प्राप्त हुआ था । बड़ी आश्चर्यमयी माया है । मैं तो एक ओर पड़ा हूँ और यह विश्व मेरा स्वरूप है । पूर्व कल्पित जो मेरे शरीर हैं, उनको अब जाकर जगाऊँ । तब रुद्र उठ खड़ा हुआ और अपने स्थान को चला । प्रथम संन्यासी के शरीर को आकर देखा और चित्तशक्ति से उसे जगाया तो संन्यासी के शरीर में ज्ञान हुआ कि सबमें मैं ही स्थित हूँ । परन्तु संन्यासी ने जाना कि मुझको रुद्र ने जगाया है और इतने शरीर मेरे और भी हैं । फिर वहाँ से वह रुद्र और संन्यासी दोनों चले और झींवर के स्थान में आये तो देखा कि झींवर शव की नाईं पड़ा है; मदिरा के बर्तन पड़े हैं, चेतना भी वहीं भ्रमती है और नाना प्रकार के स्थान देखती है-जैसे भग्ने के छिद्र में चींटी
१८६ ✻ योगवाशिष्ठ ✻
अमर्त्ता है । तब उन्होंने धीवर को चित्तशक्ति में जगाया और वह उठ खड़ा हुआ । तो उसको ऐसा स्मरण हुआ कि मुझे तो इन्होंने जगाया ।
फिर धीवर के मन में विचार हुआ कि इतने शरीर मेरे और भी हैं । निदान रुद्र, संन्यासी और धीवर तीनों चले । इन्होंने विचार किया कि हमने इतने शरीर क्योंकर पाये ? आदि में तो मैं एक परमात्मा में चैतन्यान्मुख होकर संन्यासी हुआ । फिर संन्यासी धीवर हुआ और मद्यपान करने लगा । फिर ब्राह्मण होकर वेद का पाठ करने लगा और उसके पुण्य से राजा का शरीर धारण किया । उसके बाद जो बड़ा पुण्य प्राप्त हुआ, उससे चक्रवर्ती राजा हुआ । चक्रवर्ती राजा के शरीर में काम बहुत हुआ, उससे देवता की स्त्री हुआ । स्त्री के शरीर में नेत्रों में बहुत प्रीति थी, उससे हरिणी हुआ। फिर भँवरी हुआ। उसके बाद बेल हुआ और इसके बाद जो शरीर धारण किये सो मिथ्या धारण किये और अज्ञान में बहुत काल भटकता रहा । अनेक वर्ष और सहस्रों युग व्यतीत हो गये हैं । संन्यासी से लेकर रुद्र पर्यन्त वासना के कारण जन्म पाये हैं । इतने जन्म पाकर ब्रह्मा का हंस हुआ । तब वहाँ ज्ञान की प्राप्ति हुई, क्योंकि पूर्व में अभ्यास किया था, उससे अकस्मात सत्संग प्राप्त हुआ । ऐसा विचार करके वे वहाँ से चले और चैतन्य आकाश में उड़कर वेदपाठ करनेवाले ब्राह्मण की सृष्टि में गये तो उसको देखा कि मरा-सा पड़ा है । चित्तशक्ति में उन्होंने उसको जगाकर रुद्र, संन्यासी, मद्यपान करनेवाला धीवर और ब्राह्मण, चारों वहाँ से चले और चिदाकाश में उड़कर राजा की सृष्टि में पहुँचे तो देखा कि राजा की देह चेष्टा करती है । राजा, जिसकी देह सुवर्ण की नाईं शोभायमान है, अपने मन्दिर में रानी समेत शय्या पर सोये हैं और सहेलियाँ चँवर डुला रही हैं । तब उन्होंने राजा की चित्तशक्ति में जगाया । उसने देखा कि सब विश्व मेरा ही स्वरूप है और इतने शरीर मैंने अज्ञान में धारण किये हैं । निदान रुद्र, संन्यासी मद्यपान करनेवाला धीवर, ब्राह्मण और राजा वहाँ से चले और हाथी आदि जितने शरीर धारण किये थे, उन सबको जगाया । उनमें यही
✻ निर्वाण प्रकरण ✻ १६७
निश्चय हुआ कि हम चिन्मात्ररूप और आवरण से रहित हैं अर्थात अज्ञान के स्फुरण से रहित हैं।
हे राम ! तब उनके शरीर अलग-अलग देख पड़े, परन्तु चेष्टा भिन्न-भिन्न और निश्चय सबका एक हुआ। उनका नाम शतरुद्र हुआ। हे राम ! सम्पूर्ण विश्व अज्ञान के विकार से होता है, ज्ञान में देखिये तो कुछ नहीं। ऐसे ही उनका संवेदन और निश्चय एकसा हुआ। एक देखे तो जाने कि सब ही मेरे रूप हैं और जब दूसरा देखे तो विचारे कि सब मेरे ही रूप हैं। जैसे समुद्र से जो अनेक तरङ्ग उठते हैं, उनके आकार भिन्न-भिन्न होते हैं और स्वरूप एक-सा ही होता है, वैसे ही ज्ञानवान् पुरुष सारे विश्व को अपना ही स्वरूप देखते हैं और अज्ञानी उनको भिन्न-भिन्न और अपने को उनसे भिन्न जानते हैं। एक को दूसरा नहीं जानता और दूसरे को पहला नहीं जानता। हे राम ! यह विश्व अपना ही स्वरूप है, पर अज्ञान से भिन्न जान पड़ता है। चिन्मात्र में फुरने को अज्ञान कहते हैं। चित्त के चेतने से संसार होता है और न फुरने से वह आत्मस्वरूप ही है। इससे हे राम ! वासना का त्याग करो और कुछ नहीं, जिस प्रकार शत्रु मरे उस प्रकार मारिये—यहाँ यत्न करो। अब मैं तुमसे ऐसा उपाय कहता हूँ, जिसमें कुछ यत्न नहीं और शत्रु भी मारा जायगा। हे राम ! यह चिन्तना ही दुःख है और चिन्तना से रहित होना ही सुख है—आगे जो तुम्हारी इच्छा हो सो करो। इस चित्त के चिन्तन से संसार है और निवृत्त होने में स्वरूप-बोध। जैसे पत्थर में पुरुष पुतलियों की कल्पना करता है तो उसमें पत्थर से भिन्न पुतलियों का अभाव है, वैसे ही चित्त ने विश्व की कल्पना की है। जब चित्त निवृत्त हो, तब विश्व अपना ही स्वरूप है; भिन्न नहीं। चित्त से जहाँ जाता है वहाँ पञ्चभूत ही देख पड़ते हैं, आत्मा नहीं देख पड़ता। और चित्त से रहित ज्ञानी जहाँ जाता है वहाँ आत्मा ही दीखता है। जब चित्त की वृत्ति बहिर्मुख होती है, तब संसार होता है और पञ्चभूत ही दृष्टिगोचर होते हैं और जब चित्त की वृत्ति अन्तर्मुख होती है, तब अपना ज्ञानरूप आप ही भासित होता
१६=
❇ योगवाशिष्ठ ❇
है । ये सब पदार्थ ज्ञानरूप आत्मा बिना सिद्ध नहीं होते । प्रथम आपको जानना है तो और पदार्थ जाने जाते हैं । इसी से ज्ञानवान् सब अपना आप जानता है ।
हे राम ! ये जो कुछ पदार्थ हैं, सो चिन्तन मे हैं । और जितने जीव हैं उनकी संवेदना भिन्न-भिन्न है । संवेदना में अपनी-अपनी सृष्टि है । जैसे किसी सोये हुए पुरुष को अपने स्वप्न की सृष्टि भासित होती है और जो उसके पास बैठा होता है उसको नहीं भासित होती, क्योंकि उसकी दृष्टि विश्व-स्वप्न को नहीं जानती, वैसे ही जो ज्ञानी है, उसको अपना रूप आप ही भासित होता है और इस सब जगत् का वह अपना ही रूप जानता है । अज्ञानी जिस ओर देखता है, उसी ओर पञ्चभूत दृष्टिगोचर होते हैं । जैसे पृथ्वी को खोदने से आकाश ही देख पड़ता है, वैसे ही ज्ञानी चित्तरहित जहाँ देखता है, वहाँ पञ्चभूत ही दृष्टि आते हैं । इससे हे राम ! तुम कामना से रहित हो । कामना ही से बन्धन है और कामना वासना न रहना ही मोक्ष है । आगे जैसी तुम्हारी इच्छा हो वैसा करो । हे राम ! जो न चेतने में अस्त हो जाय, उसके नाश में कृपणता क्या करना है । जो वासना-विनाश से प्राप्त हो, उसको प्राप्त रूप जानो । राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! ये स्वप्न में धीवर और ब्राह्मण से लेकर अनेक रूपी संन्यासी के हुए, फिर उनके उपगन्त क्या हुआ ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ब्राह्मण आदि जितने शरीर थे, वे रुद्र के जगाने पर सुखी हुए । जब सब इकट्ठे हुए, तब रुद्र ने उनसे कहा, हे साधो ! तुम अपने-अपने स्थान को जाओ और कुछ काल अपने पुत्र-कलत्र के साथ भोग भोगो । तब तुम मेरे गण होकर मुझको प्राप्त होगे और महाकल्प में हम सभी विदेहमुक्त होंगे ।
हे राम ! जब रुद्र ने ऐसे कहा, तब सब अपने-अपने स्थान को गये । रुद्र भी अन्तर्धान हो गये । वे अब भी नागों का आकार धारण किये कभी-कभी हमको आकाश में दृष्टिगोचर होते हैं । राम ने पूछा, हे भगवन् ! आपने कहा कि संन्यासी ने धीवर आदि सब शरीर
☸ निर्वाण प्रकरण ☸
धारण किये सो वे सत् कैसे हुए और उनकी सृष्टि कैसे सत हुई ?
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! आत्मा सर्वव्यापक, शुद्ध, चैतन्य आकाश और अनुभवरूप है। उसमें जैसे देशकाल और वस्तु का निश्चय होता है, वैसा ही वह बन जाता है। जैसा-जैसा-स्फुरित होता है, वैसा ही वैसा आगे होना है। जिसका मन शुद्ध होता है, उसका मन संकल्प होता है और वह जैसा संकल्प करता है, वैसा ही होता है। जो तुम कहो कि संन्यासी का अन्तःकरण शुद्ध था, उसने नीच-ऊँच जन्म कैसे पाये ? अर्थात मद्यपान करनेवाला, भँवेरी, बेल आदि नीच और ऊँच अर्थात ब्राह्मण, राजा आदि ऐसे जन्म शुद्ध अन्तःकरण में न चाहिये, तो इसका उत्तर यह है कि संवेदन में जैसी भावना उठती है, वैसा ही होता देख पड़ता है। जैसे एक पुरुष का अन्तःकरण शुद्ध हो और उसके मन में आवे कि मेरा एक शरीर विद्याधर का और एक शरीर भेड़ का हो तो उसके भले और बुरे दोनों ही शरीर हो जाते हैं। जो तुम कहो कि बुरा क्यों बना, भला ही बनता तो इसका उत्तर सुनो। देखो, किसी भले पण्डित के घर पुत्र होता है; वह यदि संस्कार अर्थात वासना से चोर हो जाय तो पिता को दुःख होता है। इससे हे राम ! सब वासना ही से ऊँच-नीच होते हैं। जब अभ्यास और परमयोग होता है, तब जीव शुद्ध होता है। अभ्यास, मन्त्र, जप और चित्त के स्थित करने को योग कहते हैं। इससे जैसी चिन्तना होती है, वैसी ही सिद्धि होती है, और अज्ञानी को नहीं होती। जैसे वस्तु निकट पड़ी है और भावना नहीं तो दूर है, वैसे ही अज्ञानी की भावना नहीं तो न दूरवाली वस्तु प्राप्त होती है और न निकटवाली। वह सिद्ध इस-लिए नहीं होती कि उसकी भावना दृढ़ नहीं और हृदय भी शुद्ध नहीं। संकल्प भी तब सिद्ध होता है, जब हृदय शुद्ध होता है। शुद्ध हृदयवाला जिसकी चिन्तना करता है वह चाहे दूर हो तो भी सिद्ध होता है, और जो निकट है, वह भी सिद्ध होता है। जो तुम कहो कि संन्यासी तो एक था, बहुत चैतन्य शरीर कैसे हुए तो इसका उत्तर सुनो। जो कोई योगीश्वर और योगिनी देवियाँ हैं उनका संकल्प
१७० ❊ योगवाशिष्ठ ❊
सत्य है। उनके जैसा संकल्प उठता है, वैसा ही होता है। ऐसे मन संकल्पवाले मैंने अनेक देखे हैं।
एक राजा सहस्रबाहु अर्जुन था। वह अपने घर में बैठा था और उसके सिर पर छत्र झूलता और चँवर होते थे। उसके मन में संकल्प हुआ कि मैं मेघ होकर बरसूँ। उस संकल्प के करने से उसका एक शरीर तो राजा का रहा और एक शरीर से वह मेघ होकर बरसने लगा। विष्णु भगवान् एक शरीर से तो क्षीरसमुद्र में शयन करते हैं और प्रजा की रक्षा के निमित्त और शरीर भी रख लेते हैं, जो अवतार कहलाते हैं। यज्ञदेवियाँ अपने-अपने स्थानों में होती हैं और बड़े ऐश्वर्य में विचरती हैं। इन्द्र एक शरीर से स्वर्ग में रहता है और दूसरे शरीर से जगत में भी उपस्थित रहता है। योगेश्वरों का जैसा संकल्प होता है, वैसा ही सिद्ध होता है। और जो अज्ञानी मूर्ख हैं उनके मन में बड़ा भ्रम होता है और वे बड़े मोह को प्राप्त होकर मोह में नीच गति पाते हैं। जैसे बड़े पर्वत के ऊपर से पत्थर गिरता है तो वह नीचे को जाता है, वैसे ही मूर्ख आत्मपद से गिरकर संसाररूपी गढ़े में गिरते और बड़े दुःख पाते हैं। रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! आपने कहा कि संसार स्वप्नमात्र है सो मैंने जाना कि अनन्त मोहरूपी विषमता है और आत्मचैतन्यरूप आनन्द के प्रमाद से जीव अपने को जड़ और दुःखी जानता है। यह बड़ा आश्चर्य है। हे भगवन् ! यह जो आपने संन्यासी का वृत्तांत कहा, उसके समान कोई और भी है अथवा नहीं सो कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! संसाररूपी मढ़ी में मैं रात्रि के समय समाधि करके देखूँगा और तुमसे प्रभात को जैसा होगा, वैसा कहूँगा।
इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले, हे राजन् ! वशिष्ठजी ने जब यह कहा, तब मध्याह्न का समय था। नौबत-नगाड़े बजने लगे, जिनका प्रलयकाल के मेघ का सा शब्द होने लगा। वशिष्ठजी के चरणों पर राजा और देवताओं ने फूल चढ़ाये और सबने बड़ी पूजा की। जैसे बड़ा पवन चलता है और उसके वेग से बाग में वृक्षों के फूल पृथ्वी
⚙️ निर्वाण प्रकरण १७१
पर गिर पड़ते हैं, वैसे ही सबने बहुत फूलों की वर्षा की । इस प्रकार प्रथम तो बहुत पूजा होती रही, फिर वशिष्ठजी, को नमस्कार करके सब उठ खड़े हुए और आपस में नमस्कार किया । फिर जैसे मन्दराचल पर्वत में सूर्य उदय होता है, वैसे ही वशिष्ठजी आदि ऋषि और राजा दशरथ आदि सब राजा उठे । तब पृथ्वी के राजा और प्रजा पृथ्वी पर अपने स्थान को चले और आकाश के सिद्ध और देवता आकाश को चले । सब अपने-अपने कामों में जा लगे और जैसा शास्त्रोक्त व्यवहार है उसे करने लगे । जब रात्रि हुई, तब विचार करते रहे कि वशिष्ठजी ने कैसे ज्ञान उपदेश किया है और उस विचार में उनकी रात्रि एक क्षण की तरह बीत गई । इतने में सूर्य की किरणें निकलते ही राम-लक्ष्मण आदि सब आये और परस्पर नमस्कार कर अपने-अपने आसन पर शान्तरूप होकर बैठे, जैसे पवन न चलने पर कमल स्थिर होते हैं ।
तब वशिष्ठजी ने अनुग्रह करके आप ही कहा, हे राम ! तुम्हारी प्रीति के लिए मैंने संसार में बहुत खोजा और आकाश, पाताल और सप्तद्वीप सब ढूँढ़ डाले; परन्तु ऐसा कोई संन्यासी न देखा और न अन्य किसी का संकल्प उसका जैसा भासित होता है । जब एक पहर रात्रि रही तब मैंने फिर ढूँढ़कर उत्तर दिशा में एक प्राचीन चिन्माचीन नाम के नगर में एक मढ़ी देखी । उसके दरवाजे भीतर से बंद थे । उसमें पके बालोंवाला एक संन्यासी बैठा था । बाहर उसके चेले बैठे थे । वे इस डर से दरवाजा नहीं खोलते थे कि कहीं ऐसा न हो कि हमारे गुरु की समाधि खुल जाय । वह मुनि उस स्थान में दूसरे ब्रह्मा के समान बैठा है । उसको बैठे अभी इक्कीस दिन हुए हैं, पर उसको समाधि में सहस्र वर्षों का अनुभव हुआ है और उसने बहुत जन्म भी पाये हैं, जो उसको प्रत्यक्ष भासित हुए हैं । उसने सृष्टि भी प्रत्यक्ष देखी है और उसमें विचरा है । हे राम ! इसका सा एक और मुनि भी पूर्व कल्प में था । इतना सुन राजा दशरथ ने कहा, हे महामुनीश्वर ! जो आप आज्ञा दें तो मैं अपना अनुचर चिन्माचीन नगर में भेजूँ कि वह वहाँ जाकर उस संन्यासी को जगावे ।
१७२ ❖ योगवाशिष्ठ ❖
वशिष्ठजी ने कहा, हे राजन्! वह संन्यासी अब ब्रह्मा का हंस होकर ब्रह्मा के उपदेश से जीवन्मुक्त हुआ है और यह शरीर उसका अब मृतक हुआ है। अब उसमें पुर्यष्टका अर्थात् जीव नहीं है। अब उसको क्या जगाना है? एक महीने पीछे शिष्य उसका दरवाजा खोलेंगे तो उस नगर के लोग देखेंगे कि वह मृतक पड़ा है। इससे हे राम! यह विश्व संकल्पमात्र ही है। और जो तुम कहो कि एक से बहुत क्योंकर हुए तो सुनो, ये मुनीश्वर, ऋषि, राजा आदि जो लोग हैं, वे अनेक बार एकसा शरीर धारण करते हैं। कभी कई बार कुछ सदृश और कुछ असदृश धारण करते हैं, कभी थोड़ा मिलता हुआ शरीर धारण करते हैं। और अनेक बार पहले से बिल्कुल न मिलता हुआ विलक्षण शरीर धारण करते हैं। इन नारदजी के समान और भी नारद होंगे। उनकी चेष्टा भी ऐसी ही होगी और शरीर भी ऐसा ही होगा। व्यास, शुकदेव, भृगु, भृगु के पिता जनक, कर्कश ऋषीश्वर अत्रि और अत्रि की स्त्री भी जैसी कि अब है वैसी ही होगी। जैसे समुद्र में तरङ्ग एक से और न्यून या अधिक भी होते हैं, वैसे ही यह संसार ब्रह्मलोक से लेकर पाताल तक सब मन का रचा हुआ है और सब मिथ्या है। जब यह चित्तकला बहिर्मुख होती है, तब संसार और देश काल होता है। और जब अन्तर्मुख होती है, तब आत्मपद प्राप्त होता है। जब तक बहिर्मुख होती है, तब तक दुःख प्राप्त होता है। अपना स्वरूप आनन्दरूप है। उसमें चित्तकला जानती है कि मैं सदा दुःखी हूँ। देह और इन्द्रियों से मिलकर जीव दुःखी होता है। इससे हे राम! इस अज्ञानरूप वासना से तुम रहित बनो। वासना से यह अवस्था प्राप्त होती है। जैसे चन्द्रमा अमृत से पूर्ण है और उसमें चर्मदृष्टि से कलङ्क देख पड़ता है, वैसे ही अमृतमय चन्द्रमारूप आत्मा में अज्ञानदृष्टि से जन्म, मरण, शोक, दुःख भय आदि कलङ्क दीखते हैं। यह माया महा आश्चर्य रूप है। जैसे चन्द्रमा एक है और नेत्रदोष से बहुत चन्द्रमा भासित होते हैं, वैसे ही एक अद्वैत आत्मा में नानात्वरूप विश्व का भान अज्ञान से होता है। यही माया है।
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ १७३
हे राम ! तुम एकरूप आत्मा हो । उसमें फुरने मे विश्व कल्पित हुआ है । इसमें वासना मे रहित हुए बिना आत्मा का दर्शन नहीं होता । जैसे उदय हुआ सूर्य भी बादल के होते शुद्ध नहीं दिखता, वैसे ही स्फुरणरूपी बादल के दूर होने पर ही आत्मरूपी सूर्य शुद्ध भासित होता है और दृश्य, दर्शन, द्रष्टा फुरने मे ही कल्पित हुए हैं । हे राम ! इस संसार का सार जो आत्मा है, जिसमें सुषुप्त की तरह मौन हो रहो ।
रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! मैं तीन मौन जानता हूँ—एक वाणी का मौन अर्थात् चुप रहना; दूसरा इन्द्रियों का मौन और तीसरा काष्ठ-मौन अर्थात् हठ करके मन और इन्द्रियों को वश करना । सुषुप्त मौन मैं नहीं जानता । आप बताइए ।
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ये तीनों काष्ठ-मौन तपस्वियों के हैं और सुषुप्त मौन ज्ञानी और जीवन्मुक्त का है । वे तीनों मौन जो तुमने कहे, सो अज्ञानी तपस्वियों के हैं । उनको फिर सुनो । एक वाणी का मौन कि बोलना नहीं, दूसरा मौन समाधि कि नेत्रों का मूँद लेना और कुछ न देखना और तीसरा हठकर स्थित होना और मन और इन्द्रियों को स्थिर करना । एक मौन इन्द्रियों की चेष्टा मे रहित होना है । अब ज्ञानी का सुषुप्त मौन सुनो । वाणी और इन्द्रियों से चेष्टा करना, पर आत्मा मे भिन्न और कुछ न भासित होना, अथवा ऐसे होना कि न मैं हूँ, न जगत् है, अथवा ऐसे होना कि सब मैं ही हूँ । ऐसे निश्चय में स्थित होना बड़ा उत्तम मौन है ।
हे राम ! आत्मा की सिद्धि विधि से भी होती है और निषेध से भी । उस आत्मा में स्थित होना बड़ा मौन है । हे राम ! यह जो मैंने सुषुप्त मौन कहा है, सो क्या है, सुनो ! द्वैतरूप संसार के फुरने मे सुषुप्त होना; आत्मा मे जागना और ऐसे देखना कि न मुझमें जाग्रत है, न स्वप्न है और न सुषुप्ति है—इस निश्चय में स्थित होना तुरीयातीत अवस्था है । यह पञ्चम मौन है । ऐसा तुरीयातीत पद अनादि, अनन्त, जरा से रहित, शुद्ध निर्दोष है । हे राम ! ज्ञानी इन्द्रियों को रोकने की इच्छा भी नहीं करता और न विचरने की इच्छा करता है । जो स्वाभाविक आ पड़े, उसी मे स्थित होता है । यह परम मौन है ।
१७४ ॐ योगवाशिष्ठ ॐ
ज्ञानी को सुख की इच्छा भी नहीं और दुःख का त्रास भी नहीं। वह हेय और उपादेय से रहित है। हे राम! तुम रघुवंश में चन्द्रमा हो, अपने स्वभाव में स्थित हो। संसारभ्रम मन के फुरने से होता है, सो मिथ्या है, वास्तव नहीं। और न शरीर सत्य है, न माया सत्य है। हे राम! तुम्हारा स्वरूप ओंकार (चैतन्य ब्रह्म) है। इस ओंकार को अङ्गीकार करके स्थित होना परम उत्तम मौन है।
राम ने पूछा, हे भगवन्! यह जो पीछे आपने सब रुद्र कहे, वे रुद्र थे, अथवा रुद्र के गण थे? वशिष्ठजी बोले, हे राम! जिसको रुद्र कहते हैं, उसी को गण कहते हैं। ये सभी रुद्र हैं। फिर राम ने पूछा, हे भगवन्! यह जो आपने कहा कि सब रुद्र हुए सो ये एक चित्त थे, सब क्योंकर हुए? जैसे दीपक में दीपक होता है, क्या इसी भाँति हुए? वशिष्ठजी बोले, हे राम! एक मावरण है, दुसरा निगावरण। जिसका शुद्ध अन्तःकरण है, वह निगावरण है और जिसका मलिन अन्तःकरण है, वह मावरण है। शुद्ध अन्तःकरण में जैसा निश्चय होता है, वैसा ही तत्काल आगे सिद्ध होता है और मलिन अन्तःकरण का निश्चय सिद्ध नहीं होता। इसमें जो शुद्ध, निगावरण रुद्र है, वही आत्मा और सर्वव्यापी है। जो उसका निश्चय होता है, वह सत्य है। राम ने पूछा, हे भगवन्! सदाशिव की चेष्टा तो मलिन है। रूण्डों की माला गले में धारण करते हैं और विभूति लगाकर शमशान में विहार करते हैं। स्त्री बायें अङ्ग में रहती है। आप क्योंकर कहते हैं कि उनका अन्तःकरण शुद्ध है? वशिष्ठजी बोले, हे राम! शुद्ध, अशुद्ध अज्ञानी को कहते हैं। जो शुद्ध रहे, अशुद्ध में न लिप्त हो, वह ज्ञानी है। वह अपने में क्रिया नहीं देखता और उसको शुद्ध-अशुद्ध में राग-द्वेष नहीं होता। ऐसे सदाशिवजी को ग्रहण या त्याग नहीं है। उनकी दृष्टि में जो स्वाभाविक चेष्टा होती है सो हो। वह ऐसे होती है, जैसे आदि परमात्मा विष्णु भगवान् चार भुजा धारण किये जगत् की रक्षा करने के लिए शुद्ध चेष्टा में अवतार लेकर धर्म की रक्षा करते हैं और पापियों को मारते हैं। यह आदि स्फुरण हुआ है।
✽ निर्वाण प्रकरण ✽ १७५
जो क्रिया स्वाभाविक ही आकर प्राप्त हो, उस क्रिया का रागद्वेष करके उनको हेय या उपादेय कुछ नहीं है। उनको क्रिया का अभिमान भी नहीं होता, इसी से क्रिया का बंधन उनको नहीं होता। इससे यह सिद्ध है कि संसार स्फुरण मात्र है। जब तुम फुरने से रहित होगे, तब तुमको त्रिपुटी न भासेगी अर्थात् आत्मा से भिन्न कुछ नहीं भासित होगा। इससे अज्ञानरूप फुरने से रहित होकर जब तुमको आत्मपद का साक्षात्कार होगा, तब तुम जानोगे कि मुझमें स्फुरण, दृश्य, अदृश्य कुछ नहीं, केवल आत्मपद है, जिसमें एक कहना भी नहीं, तो द्वैत कहाँ से हो ?
हे राम ! दृश्य, अदृश्य, फुरना न फुरना और विद्या, अविद्या, ये सब उपदेश के निमित्त कहते हैं, आत्मा में कुछ नहीं कहा जाता। आत्मा एक है, जिसमें द्वैत का अभाव है। जब चित्त परिणाम बहिर्मुख होता है, तब विश्व का भान होता है और जब चित्त अन्तर्मुख परिणाम पाता है, तब अहंता और ममता का नाश होता है और चैतन्य शेष रहता है। जब अतिशय अन्तर्मुख परिणाम होता है, तब चैतन्य भी नहीं कहा जाता, और जब इससे भी अतिशय परिणाम पाता है, तब 'है' या 'नहीं' भी नहीं कहा जाता। हे राम ! ऐसा तुम्हारा आत्मा अपना आप स्वरूप और शान्तपद है। उसमें वाणी की गति नहीं कि वह ऐसा है या वैसा है, यह कहा जाय। ऐसा कहिये तो इन्द्रियों का विषय है और वैसा कहिये तो इन्द्रियों से परे है। जब तुम अपने में स्थित होगे, तब जानोगे कि मुझमें अहं का फुरना कुछ नहीं है। आत्मरूपी सूर्य का साक्षात्कार होने से दृश्यरूपी अन्धकार का अभाव हो जायगा क्योंकि आत्मा तुम्हारा अपना रूप है जो केवल शान्तरूप और निर्मल है। जैसे गम्भीर समुद्र वायु से रहित होता है, वैसे ही आत्मरूपी समुद्र संकल्परूपी वायु से रहित गम्भीर और शुद्ध है। यह संसार चित्त का चमत्कार है। यह निरंश है, इसमें अंशांशी भाव नहीं-यह अद्वैत है। हे राम ! जब ऐसे बोध में स्थित होगे, तब इस विश्व को भी आत्मरूप देखोगे। यदि बोध बिना