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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

६२ = ❊ योगवाशिष्ठ ❊

परमशान्तपद को प्राप्त हुआ हूँ। हे मुनीश्वर ! तुम्हारे वचनों को स्मरण कर में आश्चर्य को प्राप्त होकर हर्षित होता हूँ। मेरे सब सन्देह नष्ट हो गये हैं। अब मुझको और कुछ नहीं दिखता, सब ब्रह्म ही दिखता है। लक्ष्मण बोले, हे भगवन् ! मैं सन्तों के वचन इकट्ठे करता रहा था, और सब जो मेरे पुण्य थे, वे अब इकट्ठे हुए थे, जिन सबका फल अब उदय हुआ है। तुम्हारी कृपा से अब मैं सब संशयों से रहित होकर परम पद को प्राप्त हुआ हूँ। तुम्हारे वचन चन्द्रमा की किरणों के समान शीतल हैं, किन्तु उनसे भी अधिक हैं। इनसे मैंने परम शान्ति पाई है और मेरे सब दुःख सन्ताप नष्ट हो गये हैं। शत्रुघ्न बोले, हे मुनीश्वर ! जगत् और मृत्यु का जो भय था, वह तुमने दूर कर दिया और अपने अमृत-रूपी वचनों का सुधापान कराया है। अब मेरे सब संशय नष्ट हो गये और मैं आत्मपद को प्राप्त हुआ हूँ। हमारे जो चिरकाल के पुण्य थे, उनका फल आज पाया।

विश्वामित्र बोले, हे मुनीश्वर ! सब तीर्थों के स्नान और दूसरे कर्मों में भी मनुष्य ऐसा पवित्र नहीं होता जैसे तुम्हारे वचनों से मैं पवित्र हुआ हूँ। आज मेरे कान पवित्र हुए। नारदजी बोले, हे मुनीश्वर ! ऐसा मोक्ष का उपाय मैंने देवताओं और सिद्धों के स्थान में भी नहीं सुना। ब्रह्मा के मुख से भी नहीं सुना, जैसा कि तुमने उपदेश किया है। इसके श्रवण करने से फिर संशय नहीं रहता। फिर दशरथ बोले, हे मुनीश्वर ! आत्मज्ञान जैसी सम्पदा कोई नहीं है। तुमने यह परम सम्पदा हमको दी है, जिसके पाने से फिर किसी पदार्थ की इच्छा नहीं रही। अब तो हम अपने स्वभाव में स्थित हुए हैं, और सम्पूर्ण कर्म हमको छोड़ गये हैं। हमारे बहुत जन्मों के पुण्य इकट्ठे हुए थे, उनके फल से ये तुम्हारे पावन वचन सुने हैं। रामजी बोले, हे मुनीश्वर ! बड़ा हर्ष हुआ कि यह सर्वसम्पदा का अधिष्ठान मुझे प्राप्त हुआ और सब आपदाओं का अन्त हुआ। ज्ञान से रहित जो अज्ञानी हैं, वे बड़े अभागे हैं। जो आत्मपद को त्यागकर अनात्मपदार्थ की ओर दौड़ते हैं, वे भी यत्न करके प्राप्त होते हैं, पर उनसे विमुख होने पर ही आत्मपद प्राप्त होता

❋ निर्वाण प्रकरण ❋

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है। उसी आत्मपद को पाकर मैं शान्तियुक्त और हर्षशोक से रहित हुआ हूँ। मैंने अचलपद पाया है। मैं अब अजित अविनाशी सदा अपने आपमें स्थित हूँ। तुम्हारी कृपा से आपको ऐसा जानता हूँ।

लक्ष्मण बोले, हे मुनीश्वर ! सहस्र सूर्य एकत्र उदय होकर भी हृदय के तम को दूर नहीं कर सकते, पर वह तम तुमने दूर किया है। सहस्र चन्द्रमा इकट्ठे उदय हों तो भी हृदय की तपन निवृत्त नहीं कर सकते, पर तुमने सम्पूर्ण तपन निवृत्त की है। हम निःसंताप पद को प्राप्त हुए हैं। वाल्मीकिजी बोले, हे साधु ! जब इस प्रकार सब कह चुके, तब वशिष्ठजी ने कहा—हे राम ! इस मोक्ष उपाय-कथा को सुनकर सब ब्राह्मणों का यथायोग्य पूजन और दान करो। जो इतर जीव हैं, वे भी यथायोग्य यथाशक्ति पूजन करते हैं, तुम तो राजा हो। जब इस प्रकार वशिष्ठजी ने कहा, तब राजा दशरथ ने उठकर सहस्र मथुरावासी विद्वान् ब्राह्मणों को भोजन कराया, दक्षिणा, वस्त्र, भूषण, घोड़े, गाँव आदि दिये, यथायोग्य पूजन किया। निदान बड़ा उत्साह हुआ। अङ्गना नृत्य करने लगीं और नगाड़े, शहनाई आदि बाजे बजने लगे चक्रवर्ती राजा दशरथ ने बड़ा उत्सव किया। इस प्रकार सात दिन तक ब्राह्मणों, अतिथियों और निर्धनों को द्रव्य देकर राजा ने पूजन किया और अन्न और वस्त्र आदि देकर सबको प्रसन्न किया।

इति श्रीयो० नि० द्विशताधिकाष्टाशतितमस्सर्गः ॥ २८८ ॥

वाल्मीकिजी बोले कि हे भरद्वाज ! इस प्रकार वशिष्ठ मुनि के वचन सुनकर सब रघुवंशी कृतकृत्य हुए। जैसे रामजी सुनकर संशयरहित जीवन्मुक्त होकर विचरे हैं वैसे ही तुम भी विचरो। यह मोक्ष-उपाय ऐसा है कि जो अज्ञानी श्रवण करे तो वह भी परमपद को प्राप्त हो। तुम्हारी क्या बात है, तुम तो पहले से भी बुद्धिमान् हो। जिस प्रकार मुझसे ब्रह्माजी ने कहा था, वह मैंने तुमको सुना दिया। जैसे रामचन्द्र आदि कुमार और दशरथ आदि राजा जीवन्मुक्त होकर विचरे हैं, वैसे ही तुम भी विचरो। उनमें मोह भी दिखता था, पर वे स्वरूप से चलायमान नहीं हुए। ज्ञान जैसा सुख और कोई नहीं, और अज्ञान जैसा दुःख भी कोई

६३० ❁ योगवाशिष्ट ❁

नहीं। इससे अधिक क्या कहिये। यह जो मोक्ष-उपाय मैंने तुमसे कहा वह परमपावन है। यह संसारसमुद्र से पार करनेवाला है, दुःखरूपी अन्धकार का नाशक सूर्य है और सुखरूपी कमल की खानि का तालाब है। जो पुरुष इसका बारम्बार विचार करेगा, वह यदि महामूर्ख हो तो भी शान्तपद को प्राप्त होगा। जो कोई इस मोक्ष-उपाय को पढ़ेगा, कहेगा, सुनेगा, लिखेगा, अथवा लिखकर पुस्तक देगा, उसके हृदय में जो कामना होगी, वह पूर्ण होगी। वह ब्रह्मलोक को प्राप्त होगा और राजसूययज्ञ का फल पावेगा। फिर विचारकर ज्ञान पाकर मुक्त होगा।

हे अङ्ग! यह मोक्ष उपाय बड़ा शास्त्र है। इसमें बड़ी कथा है और नाना प्रकार की युक्तियाँ हैं। जिन कथाओं और युक्तियों से वशिष्ठजी ने राम को जगाया था, वे मैंने तुझको सुनाई हैं। अपने उपदेश से उन्होंने उनको जीवन्मुक्त किया था और कहा था कि तुम राजलक्ष्मी भोगो। वही मैंने भी तुमसे कहा है कि जीवन्मुक्त होकर अपने तपकर्म में सावधान हो रहो, और आत्मसत्ता में निश्चय रखना। जिस उपदेश से रघुवंशी कृतकृत्य हुए, वह मैंने तुमसे ज्यों का त्यों कहा है। इस निश्चय को रखकर कृतकृत्य हो जाय। इसमें जितने इतिहास और कथा हैं, उनके भिन्न-भिन्न नाम सुनो। वैराग्यप्रकरण में राम के सम्पूर्ण प्रश्न हैं। मुमुक्षुप्रकरण में शुकनिर्वाण ही कहा है। उत्पत्तिप्रकरण में ये आठ आख्यान कहे हैं—एक आकाशज का, दूसरा लीला का, तीसरा सूची का, चतुर्थ इन्द्र-ब्राह्मण के पुत्रों का, पञ्चम कृत्रिम इन्द्र और अहल्या का, छठा चित्तोपाख्यान, सप्तम वाल्मीकि की कथा और अष्टम साम्बर का आख्यान। स्थितिप्रकरण में चार आख्यान हैं—एक भृगु के पुत्र का, दूसरा दामव्याल और कट का, तीसरा भीम, भाम, दट का और चतुर्थ दासुर का। उपशमप्रकरण में एकादश आख्यान कहे हैं—एक जनक की सिद्धगीता, दूसरा पुण्यपावन, तीसरा बलि को विज्ञान की प्राप्ति का वृत्तान्त, चतुर्थ प्रह्लादविश्रान्ति, पञ्चम गाधि का वृत्तान्त, छठा उद्दालकनिर्वाण, सप्तम स्वर्गनिश्चय, अष्टम परिघनिश्चय, नवम भाम,

६३० ❊ योगवाशिष्ठ ❊

नहीं । इससे अधिक क्या कहिये । यह जो मोक्ष-उपाय मैंने तुमसे कहा वह परमपावन है । यह संसारसमुद्र से पार करनेवाला है, दुःखरूपी अन्धकार का नाशक सूर्य है और सुखरूपी कमल की खानि का तालाब है । जो पुरुष इसका बारम्बार विचार करेगा, वह यदि महामूर्ख हो तो भी शान्तपद को प्राप्त होगा । जो कोई इस मोक्ष-उपाय को पढ़ेगा, कहेगा, सुनेगा, लिखेगा, अथवा लिखकर पुस्तक देगा, उसके हृदय में जो कामना होगी, वह पूर्ण होगी । वह ब्रह्मलोक को प्राप्त होगा और राजसूययज्ञ का फल पावेगा । फिर विचारकर ज्ञान पाकर मुक्त होगा ।

हे अङ्ग ! यह मोक्ष उपाय बड़ा शास्त्र है । इसमें बड़ी कथा है और नाना प्रकार की युक्तियाँ हैं । जिन कथाओं और युक्तियों से वशिष्ठजी ने राम को जगाया था, वे मैंने तुझको सुनाई हैं । अपने उपदेश से उन्होंने उनको जीवन्मुक्त किया था और कहा था कि तुम राजलक्ष्मी भोगो । वही मैंने भी तुमसे कहा है कि जीवन्मुक्त होकर अपने तपकर्म में सावधान हो रहो, और आत्मसत्ता में निश्चय रखना । जिस उपदेश से रघुवंशी कृतकृत्य हुए, वह मैंने तुमसे ज्यों का त्यों कहा है । इस निश्चय को रखकर कृतकृत्य हो जाय । इसमें जितने इतिहास और कथा हैं, उनके भिन्न-भिन्न नाम सुनो । वैराग्यप्रकरण में राम के सम्पूर्ण प्रश्न हैं । मुमुक्षुप्रकरण में शुक्रनिर्वाण ही कहा है । उत्पत्तिप्रकरण में ये आठ आख्यान कहे हैं—एक आकाशज का, दूसरा लीला का, तीसरा सूची का, चतुर्थ इन्द्र-ब्राह्मण के पुत्रों का, पञ्चम कृत्रिम इन्द्र और अहल्या का, छठा चित्तोपाख्यान, सप्तम वाल्मीकि की कथा और अष्टम साम्बर का आख्यान । स्थितिप्रकरण में चार आख्यान हैं—एक भृगु के पुत्र का, दूसरा दामब्याल और कट का, तीसरा भीम, भास, दृढ का और चतुर्थ दासुर का । उपशमप्रकरण में एकादश आख्यान कहे हैं—एक जनक की सिद्धगीता, दूसरा पुण्यपावन, तीसरा बलि को विज्ञान की प्राप्ति का वृत्तान्त, चतुर्थ प्रह्लादविश्रान्ति, पञ्चम गाधि का वृत्तान्त, छठा उद्दालकनिर्वाण, सप्तम स्वर्गनिश्चय, अष्टम परिघनिश्चय, नवम भास,

✽ निर्वाण प्रकरण ✽ ६३१

दशम विलाससंवाद और एकादश वीतव । निर्वाणप्रकरण में २७ आख्यान कहे हैं—भुशुण्डि और वशिष्ठ का, महेश और वशिष्ठ का, शिलाकोश का, उपदेश अर्जुनगीता, स्वप्नसत्यरुद्र, वेताल का, भगीरथ का, गङ्गा अवतरण, शिखध्वज का, वृहस्पतिकचप्रबोध, मिथ्यापुरुष का, शृङ्गी गण का, इक्ष्वाकुनिर्वाण, मृगव्याध-दृष्टान्त, वलबृहस्पति, मङ्गीनिर्वाण, विद्याधर का, हरिणोपाख्यान, आख्यानोपाख्यान, विपश्चित् की कथा, शिवि का, शिला का, इन्द्र ब्राह्मण के पुत्रों का, कुन्ददन्त का, महा-प्रश्न उत्तरवाक्य, शिष्य-गुरु-महोत्सव और ग्रंथप्रशंसाफल, चतुष्टय-प्रकरणों में सब पचास आख्यान वर्णन किये गये हैं ।

इति श्रीयोगवासिष्ठे महारामायणे वशिष्ठरामचन्द्रसंवादे निर्वाणप्रकरणे मोक्षोपायवर्णनं नाम द्विशताधिकैकोननवतितमस्सर्गः ॥ २८६ ॥

श्रीयोगवासिष्ठ के निर्वाणप्रकरण का उत्तरार्द्ध समाप्त ।

इति


श्रीमती कमला भार्गव द्वारा—तेजकुमार प्रेस (प्रा०) लिमिटेड, लखनऊ में मुद्रित ।