योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
उपशम प्रकरण । ६१५
महासर्प और किन्नरों संयुक्त अति बली हैं तो भी सब ओर से यत्न करने से वश होते हैं । इससे उसको वश कर ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे बलिवृत्तान्तविरोचनगाथानाम त्रयोविंशतितमसर्गः ॥ २३ ॥
बलि ने पूछा, हे भगवन् ! किस उपाय से वह जीता जाता है और ऐसा महावीर्यवान् मन्त्री कौन है और राजा कौन है ? यह वृत्तान्त सब मुझको शीघ्र ही कहिये कि उपाय करूँ । विरोचन बोले, हे पुत्र ! स्थित हुआ भी त्यागने योग्य है । ऐसा मन्त्री जिस उपाय से जीतीये सो भली प्रकार कहता हूँ सुन । उस युक्ति के ग्रहण करने से शीघ्र ही वश होता है, युक्ति बिना नाश नहीं होता । जैसे बालक को युक्ति से वश करते हैं तैसे ही जो पुरुष युक्ति से उस मन्त्री को वश करता है उसको राजा का दर्शन होता है और उससे परमपद पाता है । जब राजा का दर्शन होता है तब मन्त्री वश हो जाता है और उस मन्त्री के वश करने से फिर राजा का दर्शन होता है जब तक राजा को न देखा तब तक मन्त्री वश नहीं होता और जब तक मन्त्री को वश नहीं किया तब तक राजा का दर्शन नहीं होता । राजा के देखे बिना मन्त्री का जीतना कठिन है और मन्त्री के जीते बिना राजा को देखना कठिन है । इस कारण दोनों का इकट्ठा अभ्यास कर । राजा का दर्शन और मन्त्री का जीतना अपने पुरुष प्रयत्न और शनैःशनैः अभ्यास से होता है और दोनों के सम्पादन से मनुष्य शुभता को प्राप्त होता है । जब तू अभ्यास करेगा तब उस देश को प्राप्त होगा, यह अभ्यास का फल है । हे दैत्यराज ! जब उसको पावेगा तब रञ्चक भी शोक तुमको न रहेगा और सब यत्नों से शान्त होकर नित्य प्रफुल्लित और प्रसन्न रहेगा । जो साधुजन हैं वे सब संशयों से रहित उस देश में स्थित होते हैं । हे पुत्र ! सुन, वह देश अब मैं तुझसे प्रकट करके कहता हूँ । देश नाम मोक्ष का है जहाँ सब दुःख नष्ट हो जाते हैं और राजा उस देश का आत्म भगवान् है जो सब पदों से अतीत है । उस महाराज ने मन्त्री मन को किया है सो मन परिणाम को पाकर सर्व ओर से विश्वरूप हुआ है । जैसे मृत्तिका का पिण्ड घट-
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भाव को प्राप्त होता है और जैसे धूम्र बादल को धरता है तैसे ही मन ने विश्वरूप धरा है । उस मन को जीतने से सब विश्व जीत जाता है । मन का जीतना कठिन परन्तु युक्ति से वश होता है । बलि ने पूछा हे भगवन् ! उस मन के वश करने की युक्ति मुझसे कहिये । विरोचन बोले, हे पुत्र ! शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध के रस की सर्वदा सब ओर से आस्था त्यागना अर्थात् नाशवन्त और भ्रमरूप जानना, यही मन के जीतने की परम युक्ति है । मनरूपी हाथी विषयरूपी मद से मस्त है वह इस युक्ति से शीघ्र ही दमन हो जाता है । यह युक्ति कठिन है और अति दुःख से प्राप्त होती है परन्तु अभ्यास से सुलभ ही प्राप्त हो जाती है । ब्रह्म के अभ्यास किये से और विरक्तता से यह युक्ति सब ओर से प्रकट होती है-जैसे रसवान् पृथ्वी में लता उपजती है तैसे ही जो जो शठ जीव हैं इसकी वाञ्छा करते हैं परन्तु अभ्यास बिना उन्हें नहीं प्राप्त होती और अभ्यासवान् को प्रकट होती है । इससे तुम भी अभ्यास सहित युक्ति का आश्रय करो । जब तक विषयों से विरक्तता नहीं उपजती तब तक संसाररूपी वन के दुःखों में भ्रमना है, पर विषयों से विरक्तता अभ्यास बिना किसी को नहीं प्राप्त होती । जैसे अभ्यास बिना नहीं पहुँचता तैसे ही जब आत्मा ध्येय को पुरुष निरन्तर धरता है तब अभ्यासवान् की वृत्ति विषयों में अमंत होती है । जैसे जल के अभ्यास से बेलि को सींचते हैं तब लता वृद्धि होती है, ऐसे ही पुरुषार्थ से सब कार्यों की प्राप्ति होती है, अन्यथा नहीं होती । यह निश्चय किया है कि जो क्रिया आपही करिये उसका फल अवश्य प्राप्त होता है । वही पुरुषार्थ कहाता है । जो अवश्य होना है उसकी जो नीति है वह दूर नहीं होती उसे ही दैवशब्द कहिये वा नीति कहिये पर अपने ही पुरुषार्थ का फल पाता है-जैसे मरुस्थल में भ्रम से जल भासता है और सम्यक्ज्ञान से भ्रम निवृत्त हो जाता है । इस दैव और नीति को अपने पुरुषार्थ से जीतो । जैसा पुरुषार्थ में सङ्कल्प दृढ़ करता है वैसा ही भासता है । जैसे आकाश को नीलता ग्रहण करती है पर वह नीलता कुछ है नहीं, तैसे ही सुख दुःख देनेवाला और कोई नहीं, जैसा सङ्कल्प करता
उपशम प्रकरण । ६१७
है वैसा ही सो मानता है और जैसी नीति होती है तैसा ही संकल्प करता है उसी नीति से मिलकर कदाचित् कर्म करता है तो उससे इस जगत्-कोश में जीव शरीर धारकर फिरता है--जैसे आकाश में पवन फिरता है पर वह कदाचित् नीति सहित और कदाचित् नीति से रहित फिरता है; तैसे ही दोनों नीतियाँ मन में होती हैं। आकाशरूपा मन में नीति अनीतिरूपा वायु फिरता है इस कारण, जब तक मन है तब तक नीति है और देव है ! मन से रहित न नीति है, न देव है, मन के अस्त हुए जो है वही रहता है, तैसे ही पुरुषार्थ करके जैसा सङ्कल्प इस लोक में दृढ़ होता है सो कदाचित् अन्यथा नहीं होता । हे पुत्र ! अपने पुरुषार्थ बिना यहाँ कुछ सिद्ध नहीं होता. इससे परम पुरुषार्थ करके विषय से विरक्त हो । जब तक विरक्तता नहीं उपजती तब तक परम सुख के देने-वाली मोक्षपदवी और (संसारभय का नाशकर्त्ता) ज्ञान नहीं प्राप्त होता । जब तक विषयों में प्रीति है तब तक सांसारिक दशा डोलायमान करती है, दुःखदायक होती है और सर्प की नाईं विष फैलाती है, अभ्यास किये बिना निवृत्त नहीं होती। फिर बलि ने पूछा कि हे सब असुरों के ईश्वर ! चित्त में भोगों से विरक्तता कैसे स्थिति होती है, जो जीवों की दीर्घ जीने का कारण है ? विरोचन बोले, हे पुत्र ! जैसे शरत्काल की महालता में फूल से फल परिपक्व होता है तैसे ही आत्मावलोकन करने वाले पुरुष को भोगों में विरक्तता प्रकट होती है। आत्मा के देखने से विषयों की प्रीति निवृत्त हो जाती है और हृदय में शान्ति प्राप्त होती है । जैसे कमलों में शोभा होती है तैसे ही श्रीलक्ष्मी स्थित होती है । इससे सूक्ष्मबुद्धि विचारवेत्ता जैसे आत्मदेव को देखकर विषयों की प्रीति त्यागते हैं ऐसे तुम भी त्यागो । प्रथम दिन के दो भाग देह के कार्य करो एक भाग शास्त्रों का श्रवण विचार करो और एक भाग गुरु की सेवा करो । जब कुछ विचार संयुक्त मन हो तब दो भाग वैराग्य संयुक्त शास्त्रों को विचारे और दो भाग ध्यान और गुरु के पूजन में रहो । इस क्रम से जीव ज्ञानकथा के योग्य होता है और क्रम से निर्मल भाव को ग्रहण करना है तब शनैः शनैः उत्तम
६१ = योगवाशिष्ठ ।
पद की भावना होती है । इस प्रकार शास्त्रों के अर्थ विचार में चित्तरूपी बालक को पर्चावौ । जब परमात्मा में ज्ञान प्राप्त होता है तब कर्म फाँसी से छूट जाता है । जैसे चन्द्रमा के उदय हुए चन्द्रकान्तिमणि द्रवीभूत होता है तैसे ही वह शीतल हो विराजता है । बुद्धि के विचार से सर्वदा सम और आत्मदृष्टि देखनी और तृष्णा का बन्धन त्यागना यह परस्पर कारण है । परमात्मा के देखने से तृष्णा दूर हो जाती है और तृष्णा के त्याग से आत्मा का दर्शन होता है । जैसे नौका को केवट ले जाता है और नौका केवट को ले जाती है तैसे ही परमात्मा का दर्शन होता है और भोगों का त्याग होता है । परब्रह्म में जो अत्यन्त विश्रान्ति नित्य उदय होती है सो मोक्षरूप आनन्द उदय होता है उसका अभाव कदाचित् नहीं होता । जीवों को आनन्द आत्मविश्रान्ति के सिवा न तपों से प्राप्त होता है न दानों से प्राप्त होता है और न तीर्थों में प्राप्त होता है। जब आत्मस्वभाव का दर्शन होता है तब भोगों से विरक्तता उपजती है, पर आत्मस्वभाव का दर्शन अपने प्रयत्न बिना और किसी युक्ति से नहीं प्राप्त होता है । हे पुत्र ! भोगों के त्याग करने और परमार्थ दर्शन के यत्न करने से ब्रह्मपद में विश्रान्त और परमानन्द मोक्ष को प्राप्त होता है । ब्रह्मा से आदि काष्ठपर्यन्त को इस जगत में ऐसा आनन्द कोई नहीं जैसा परमात्मा में स्थित हुए मे है । इससे तुम पुरुष प्रयत्न का आश्रय करो और दैव को दूर से त्यागो । इस मार्ग के रोकनेवाले भोग हैं, उनकी निन्दा बुद्धिमान करते हैं । जब भोगों की निन्दा दृढ़ होती है तब विचार उपजता है—जैसे वर्षाकाल गये से शरत्काल की सब दशा निर्मल हो जाती है तैसे ही भोगों की निन्दा से विचार और विचार से भोगों की निन्दा परस्पर होती है जैसे समुद्र की अग्नि से धूम्र उदय होता है और बादलरूप हो वर्षाकर फिर समुद्र को पूर्ण करता है और जैसे मित्र आप से परस्पर कार्य सिद्ध कर देते हैं । इसमें प्रथम तो दैव का अनादर करो और पुरुष प्रयत्न करके दाँतों में दाँतों को पीसकर भोगों की प्रीति त्यागो और फिर पुरुषार्थ से प्रथम अविरोध उपजाओ और उसको भगवान् के अर्पण करो और भोगों में असंग होकर उनकी निन्दा करो तब विचार
उपशम प्रकरण ।
६१६
उपजेगा । फिर शास्त्रज्ञान को संग्रह करो तब परमपद की प्राप्ति होगी । हे दैत्यराज ! समय पाकर जब तू विषयों से विरक्त चित्त होगा तब विचार के वश से परमपद पावेगा । अपने आपमें जो पावनपद है उसमें तब भली प्रकार अत्यन्त विश्राम पावेगा और फिर कल्पना दुःख में न गिरेगा । देशाचार के कर्म से अल्पधन उपजाना फिर उसे साधु के सङ्ग में लगाना । उनके सङ्ग में वैराग्य और विचार संयुक्त हुए तुझको आत्मलाभ होगा ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे उपशमप्रकरणे बल्युपाख्याने चित्तचिकित्सोपदेशो नाम चतुर्विंशतितमसर्गः ॥ २४ ॥
बलि ने विचार किया कि इस प्रकार मुझसे पूर्व पिता ने कहा था । अब में स्मृति दृष्टि से प्रसन्न हुआ हूँ और भोगों से विरक्तता उपजी है कि इसलिये शान्त और सम, निर्मल, अमृतरूपी, शीतल सुख में स्थित होऊँ । धन एकत्र होता है और नाश हो जाता है फिर आशा उपजती है और फिर धन से पूर्ण होता है, फिर स्त्रियों की वाञ्छा उपजती है और फिर उन्हें अङ्गीकार करता है। अब मैं विभूति की स्थिति से खेदवान् हुआ हूँ । अहो, आश्चर्य है कि इस रमणीय पृथ्वी से अब मैं सम शीललचित्त होता हूँ और दुःख सुख से रहित सर्व शान्ति को प्राप्त होता हूँ। जैसे चन्द्रमा के मण्डल में स्थित हुआ सम शीतल होता है तैसे भीतर से में हर्षवान् और शीतल होता हूँ । दुःखरूपी विभूति ऐश्वर्य से रहित हो अब में अक्षोभ हूँगा । यह सब मनरूपी बालक की दिन-दिन प्रति कला है । प्रथम में स्त्री से चिपटता था फिर मोह से मेरी प्रीति बढ़ गई थी, जो कुछ दृष्टि से देखने योग्य था वह मैंने देखा है, जो कुछ भोगने योग्य था वह चिरकालपर्यन्त अखण्ड भोगा है और सर्वभूतजातों को वश कर रहा हूँ पर उनसे क्या शोभनीय हुआ । फिर फिर उनमें वही चेष्टा मे और और देखे, इससे चित्त अपूर्व पदार्थ को नहीं देखता फिर फिर जगत् के वही पदार्थ हैं । इसमें अपनी बुद्धि से इनका निश्चय त्यागकर पूर्ण समुद्रवत् अपने आपसे आपमें स्वच्छ, स्वस्थ और स्थित हूँ । पाताल, पृथ्वी और स्वर्ग में, जो स्त्री और रत्न, पन्नगादिक सार हैं वे भी तुच्छ हैं, समय पाकर उन्हें काल ग्रस लेता
६२० | योगवासिष्ठ ।
है । इतने काल पर्यन्त मैं बालक था और तुच्छ पदार्थ मन के रचे हुए हैं उनमें आसक्त होकर देहियों के साथ द्वेष करता था । उन दुःखों के त्यागने में क्या अनर्थ होगा ? बड़ा कष्ट है कि मैंने निरकाल अनर्थ में अर्थबुद्धि की थी, अज्ञानरूपी मद से मतवाला था और चञ्चल तृष्णा से इस जगत् में क्या नहीं किया । जो कार्य पीछे ताप बढ़ाते हैं वही मैंने किये हैं पर अब पूर्व तुच्छ चिन्ता से मुझको क्या है । वर्तमान चिकित्सा पुरुषार्थ से सफल होगी । जैसे समुद्र मथने से अमृत प्रकट भया है तैसे ही अपरिमित आत्मा की भावना से अब सब ओर से सुख होगा । मैं कौन हूँ, और आत्मा के दर्शन की युक्ति गुरु से पूछूँगा । इसलिये अब मैं अज्ञान के नाशनिमित्त शुक्र भगवान् का चिन्तन करूँ, वह जो प्रसन्न होकर उपदेश करेंगे उससे अनन्त वैभव अपने आपमें आपसे स्थित होगा और निष्काम पुरुषों का उपदेश मेरे हृदय में फैलेगा ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे उपशमप्रकरणे बलिचिन्तासिद्धान्तोपदेशं नाम पञ्चविंशःसर्गः ॥ २५ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार चिन्तन करके बलि ने नेत्रों को मूँदा और शुक्रजी जिनका आकाश में मन्दिर है और जो सर्वत्र पूर्ण चिन्मात्र तत्त्व के ध्यान में स्थित हैं आवाहनरूप ध्यान किया, और शुक्रजी ने जाना कि हमारे शिष्य बलि ने हमारा ध्यान किया है । तब चिदात्मस्वरूप भार्गव अपनी देह वहाँ ले आये जहाँ गृह के भगोख में बलि बैठा था और बलि उज्ज्वल प्रभाववाले गुरु को देखकर उठा और जैसे सूर्यमुखी कमल सूर्य को देखकर प्रफुल्लित होते हैं तैसे ही उसका चित्त प्रफुल्लित हो गया । तब उसने रत्न अर्घ्य पुष्पों से चरण वन्दना की और रत्नों में अर्घ दिया और बड़े सिंहासन पर बैठाकर कहा, हे भगवन् ! तुम्हारी कृपा से मेरे हृदय में जो प्रतिभा उठती है वह स्थिर होकर मुझको प्रश्न में लगाती है अब में उन भोगों से जो मोह के देनेवाले हैं विरक्त हुआ हूँ और तत्त्वज्ञान की इच्छा करता हूँ जिसमें महामोह निवृत्त हो । इस ब्रह्माण्ड में स्थिर वस्तु कौन है और इसका कितना प्रमाण है ? इदं क्या है और अहं क्या है ? मैं कौन हूँ, तुम
उपशम प्रकरण । ६२१
कौन हो और यह लोक क्या है ? इन प्रश्नों का उत्तर कृपा करके कहिये । शुक्र बोले, हे दैत्यराज ! बहुत कहने में क्या है, मैं आकाश में जाना चाहता हूँ उसमें सबका सार संक्षेप से में तुमसे कहता हूँ सो सुनो । जो चेतन तत्त्व विस्तृतरूप है वही चिन्मात्र है और चेतन ही व्यापक है । तू भी चेतनस्वरूप है, मैं भी चेतन हूँ और यह लोक भी चेतनरूप है । यही सबका सार है । इस निश्चय को हृदय में दृढ़कर धारोगे तब निर्मल निश्चयात्मकबुद्धि में अपने को आपसे देखोगे और उसमें विश्रान्तिमान् होगे । हे राजन् ! यदि तुम कल्याणमूर्ति हो तो इतने कहने में सब सिद्धान्त को प्राप्त होगे और सबका सार जो चिदात्मा है उसको पाओगे और यदि कल्याणमूर्ति नहीं हो तो फिर कहना भी निरर्थक होता है । चेतन को जो चेत्यकला का सम्बन्ध है वही बन्धन है । इससे जो मुक्त है वही मुक्त है । आत्मतत्त्व चेतन रूप चेत्यकल्पना से रहित है । यह सब सिद्धान्तों का संग्रह है । हे राजन् ! इस निश्चय को धारो और निर्मलबुद्धि से अपने आपसे आपको देखो, यही आत्म-पद की प्राप्ति है । सप्तऋषियों से देवताओं का कोई कार्य है उस निमित्त में अब आकाश जाता हूँ । जब तक यह देह है तब तक मुक्तबुद्धि को यथाप्राप्त कार्य त्यागने योग्य नहीं । इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! ऐसे कहकर शुक्र बड़े वेग से आकाश में चले और जैसे समुद्र में तरङ्ग उठकर लीन हो जावे तैसे ही शुक्रजी अन्तर्धान हो गये ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे उपशमप्रकरणे बल्युपदेशो नाम षट्त्रिंशत्सर्गः ॥ ३६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! देवता और दैत्यों के पूजने योग्य शुक्र के गये से बलवानों में श्रेष्ठ मन में विचारने लगा कि भगवान् शुक्रजी यह क्या कह गये कि त्रिलोकी चिन्मात्ररूप है, मैं भी चेतन हूँ, दिशा भी चेतनरूप है, परमार्थ में आदि जो सत्यस्वरूप है वह भी चेतन है उसमें भिन्न नहीं, यह जो सूर्य है उसमें चेतन होने से ही सूर्यत्वभाव भासता है और यह जो भूमि है उसको चेतन न चेते तो इसमें भूमित्व भाव नहीं । वह जो दशों दिशा हैं यदि इनको चेतन न चेते तो दिशा में दिशान्वभाव न रहे, पर्वत में पर्वतता भी चेतन बिना नहीं ।
६२२ योगवाशिष्ठ।
इस जगत् में जगत्भाव आकाश में आकाशता, शरीर में लक्षण भी चेतन बिना न पाइयेगा, इन्द्रियाँ भी चेतन हैं, मन भी चेतन है, भीतर बाहर सब चेतन है और चिदात्मा ही अहं त्वं भावरूप होकर स्थित है। चेतन में हूँ, सब इन्द्रियों संयुक्त विषयों का स्पर्श में करता हूँ और कदा- चित् कुछ नहीं किया। काष्ठ लोष्टतुल्य शरीर में मेरा क्या है? में तो सम्पूर्ण जगत् में आत्मा चेतन हूँ, आकाश में भी एक में आत्मा हूँ। सूर्य और भूत, पिञ्जर, देवता, दैत्य और स्थावरजङ्गम सबका चेतन आत्मा एक अद्वैत चेतन है और द्वैतकल्पना नहीं। सब, यदि इस लोक में द्वैत का असम्भव है तो शत्रु कौन है और मित्र किसको कहिये? जिस शरीर का नाम बलि है उसका शिर काटा तो आत्मा का क्या काटा? सब लोगों में आत्मा पूर्ण है पर जब चित्त दुःख चेतता है तब दुखी होता है चेतने बिना दुःख नहीं पाता। इस कारण जो दुःख- दायक भाव-अभाव पदार्थ भासते हैं वे सर्व आत्मरूप हैं चेतन तत्त्व से भिन्न कुछ नहीं। सब ओर से आत्मा पूर्ण है, आत्मा से भिन्न जगत् का कुछ व्यवहार नहीं। न कोई दुःख है, न कोई रोग है, न मन है, न मन की वृत्ति है, एक शुद्ध चेतनमात्र आत्मतत्त्व है और विकल्प कल्पना कोई नहीं। सब ओर से चेतन स्वरूप, व्यापक, नित्य, आनन्द, अद्वैत सबसे अतीत और अंशाशाभाव से रहित चेतनसत्ता व्यापक है। चेतन आदिक नाम से भी में रहित हूँ, वे चेतन आदिक नाम भी व्यवहार के निमित्त कल्पे हैं। चेतन जो आत्मा की स्फुरणशक्ति है वही विस्तार में जगद्रूप होकर भासती है, द्रष्टा, दर्शन मुक्त केवल अद्वैत- रूप है और प्रकाश प्रकाशभाव से रहित निगभास द्रष्ट परमेश्वर रूप हूँ। न में कर्त्ता हूँ और न भोक्ता हूँ, में केवल द्रष्टा निगमयरूप कल्पना कलङ्क से रहित हूँ। इनसे परे हूँ और यह स्वरूप भी में हूँ। यह मेरे में आभासमात्र है और में उदित नित्य और आभास में भी रहित एक प्रकाशरूप हूँ। स्वरूप होने से मेरा चित्त दृश्य के राग से रहित मुक्तरूप है। प्रत्यक्ष चेतन जो मेरा स्वरूप है उसको नमस्कार है। चित्त दृश्य से रहित हूँ और युक्ति अयुक्ति सबका प्रकाशस्वरूप में हूँ, मुझको नम-
उपशम प्रकरण। ६२३
स्कार है। मैं चित्त से रहित चेतन हूँ, सब ओर से शान्तरूप हूँ, फुरने से रहित हूँ और आकाश की नाईं अनन्त सूक्ष्म से सूक्ष्म, दुःख सुख से मुक्त और संवेदन से रहित असंवेदनरूप हूँ। मैं चेत्य से रहित चेतन हूँ। जगत के भाव अभाव पदार्थ मुझको नहीं छेद सकते। अथवा यह जगत् के पदार्थ छेदते हैं वह भी मुझसे भिन्न नहीं, क्योंकि छेद में हूँ और छेदनेवाला में हूँ। स्वभाव भूत वस्तु से वस्तु ग्रहण होती है अथवा नहीं होती तो भी किसमे किसका नाश हो, सर्वदा, सर्व प्रकार, सर्व शक्तिरूप हूँ, सङ्कल्प विकल्प से अब क्या है। मैं एक ही चेतन अजड़-रूप होकर प्रकाशता हूँ, जो कुछ जगत्जाल है वह सब में ही हूँ, मुझसे भिन्न कुछ नहीं। इतना कह वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जब इस प्रकार तत्त्व के वेत्ता राजा बलि ने विचारा तब ओंकार की अर्धमात्रा तुरीयापद की भावना मे ध्यान में स्थित हुआ और उसके सङ्कल्प भली प्रकार शांत हो गये। वह सब कल्पना और चित्त चेत्य निःसङ्ग होकर स्थित हुआ और ध्याता जो है अहंकार, ध्यान जो है मन की वृत्ति और ध्येय जिसको ध्याता था तीनों से रहित हुआ और मन से सब वासनाएँ नष्ट हो गईं। जैसे वायु से रहित अचलरूप दीपक प्रकाशता है तैसे ही बलि शान्तरूप पद को प्राप्त हुआ और रत्नों के झरोखे में बैठे दीर्घ काल बीत गया। जैसे स्तम्भ में पुतली हों तैसे ही सर्व एषणा से रहित वह समाधि में स्थित रहा और सब क्षोभ, दुःख, विघ्न से रहित निर्मल चित्त शरत्काल के आकाशवत् हो रहा।
इति श्रीयोगवाशिष्टे उपशमप्रकरणे बलिविश्रान्तिवर्णन-नाम सप्तविंशत्सर्गः ॥ २७ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जब इस प्रकार दैत्यराज बहुत काल पर्यन्त समाधि में बैठा रहा तब बान्धव, मित्र, टहलुये, मन्त्री रत्नों के झरोखे में देखने चले कि राजा को क्या हुआ। ऐसा विचारकर उन्होंने किवाड़ों को खोला और ऊपर चढ़े। यक्ष, विद्याधर और नाग एक ओर खड़े रहे और रम्भा और तिलोत्तमादिक अप्सरागण हाथों में चमर ले खड़ी हुईं और नदियाँ, समुद्र, पर्वत आदिक मूर्ति धारकर और सब
६२४ | योगवाशिष्ठ ।
आदिक भेंट लेकर सा प्रणाम के निमित्त खड़े हुए और त्रिलोकी के उद्वर्ती जो कुछ थे वे सब आये, पर राजा बलि ध्यान में ऐसा स्थित था मानो चित्र की मूर्ति लिखी है और पर्वतवत् स्थित है। उसको देखकर सब दैत्यों ने प्रणाम किया, कोई उसे देखकर शोकवान् हुआ। कोई आश्चर्यवान्, कोई आनन्दवान् हुए और कोई भय को प्राप्त हुए। तब मन्त्री विचारने लगे कि राजा की क्या दशा हुई। इसलिए उसने शुक्रजी का ध्यान किया और भार्गवमुनि मनोमय में आये। उनको देख कर दैत्यगणों ने पूजन किया और बड़े सिंहासन पर गुरु को बैठाया। बलि को ध्यानस्थित देखकर शुक्रजी अति प्रसन्न हुए कि जो पद मैंने उप-देश किया था, उसमें इसने विश्राम पाया है इसका भ्रम अब नष्ट हुआ है और क्षीरसमुद्रवत् प्रकाश है। ऐसे देखकर शुक्रजी ने कहा बड़ा आश्चर्य है कि दैत्यराज ने विचार करके निर्मल आत्मप्रकाश पाया है। अब भगवान् सिद्ध हुआ है और अपने स्वरूप में जो सब दुःखों से रहित पद है उसमें यह स्थित हुआ है और चिन्ताश्रम इसका क्षीण हुआ है। अब इसको मत जगाओ। यह आत्मज्ञान को प्राप्त हुआ है और यत्न और क्लेश इसका दूर हो गया है जैसे सूर्य के उदय होने से अन्धकार नष्ट हो जाता है। अब मैं इसको नहीं जगाता यह आपही दिव्य वर्षों में जागेगा, क्योंकि प्रारब्ध अंकुर इसके रहता है और उठकर अपना राजकार्य करेगा। अब तुम इसको मत जगाओ, अपने राजकार्य में जा लगो। वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब इस प्रकार शुक्रजी ने कहा तब सब सुनकर सूखे वृक्ष की मञ्जरी ऐसे हो गये और शुक्रजी अन्तर्धान हो गये। दैत्य भी अपने राजा विरोचन की सभा में जाकर अपने अपने व्यवहार में लगे और खेचर, भूचर और पातालवासी अपने अपने स्थान में गये और देवता, दिशा, पर्वत, समुद्र, नाग, किन्नर, गन्धर्व सब अपने अपने व्यवहार में जा लगे।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे बलिविज्ञान प्राप्ति र्नामाष्टाविंशतितमस्सर्गः ॥ २८ ॥
उपशम प्रकरण । ६२५
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब सहस्र दिव्य वर्ष व्यतीत हुए तब दैत्यराज समाधि से उतरे, नौबत नगारे बजने लगे, देवता और दैत्य बड़े जय जय शब्द करने लगे नगरवासी देखकर बड़े प्रसन्न हुए और जैसे सूर्य उदय हुए कमल खिल आते हैं तैसे ही खिल आये । जब तक दैत्य न आये थे तब तक राजा ने विचार कि बड़ा आश्चर्य है कि परमपद जो ऐसा रमणीय, शान्तरूप और शीतल पद है उसमें स्थित होकर मैंने परम विश्राम पाया है । इसमें फिर उमी पद का आश्रय करूँ और उमी में स्थित होऊँ, राज्य विभूति से मेरा क्या प्रयोजन है । ऐसा आनन्द शीतल चन्द्रमा के मण्डल में भी नहीं होता जैसे अनुभव में स्थित होने से पाया जाता है । हे रामजी ! इस प्रकार चिन्तना कर वह फिर समाधि करने लगा कि जिससे गलित मन हो । तब दैत्यों की सेना, मन्त्री, भृत्य, बान्धवों ने आनकर उनको घेर लिया और जैसे चन्द्रमा को मेघ घेर लेता है तैसे ही घेर करके प्रणाम करने लगे । बलिराज ने मन में विचार कि मुझको त्यागने और ग्रहण करने योग्य क्या है, त्याग उसका करना चाहिये जो अनिष्ट और दुःखदायक हो और ग्रहण उसका कीजिये जो आगे न हो पर आत्मा से व्यतिरेक कुछ नहीं उसमें ग्रहण और त्याग किसका करूँ । मोक्ष की इच्छा भी मैं किस कारण करूँ क्योंकि जो बन्ध होता है तो मोक्ष की इच्छा करता है सो जब बन्ध ही नहीं तो मोक्ष की इच्छा कैसे हो ? यह बन्ध और मोक्ष बालकों की क्रीड़ा कही है वास्तव में न बन्ध है न मोक्ष है । यह कल्पना भी मूढ़ता में है सो मूढ़ता तो मेरी नष्ट हुई है अब मुझको ध्यान विलाम से क्या प्रयोजन है और ध्यान से क्या है । अब मुझको न परमतत्त्व की इच्छा है, और न कुछ ध्यान से प्रयोजन है अर्थात न विदेहमुक्त की इच्छा है, न जगत् में स्थित रहने की इच्छा है, न मैं मरता हूँ, न जीता हूँ, न सत्य हूँ, न असत्य हूँ, न सम हूँ, न विषम हूँ, न कोई मेरा है और न कोई और है अद्वैतरूप में एक आत्मा हूँ सो मुझको नमस्कार है इस राजक्रिया में मैं स्थित हूँ तो भी आत्मपद कार्य में स्थित हूँ, और सदा शीतल हूँ । ध्यान दिशा से मुझको सिद्धता नहीं और न राज-
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कार्य विभूति से कुछ सिद्ध होना है । इससे राजकार्य से मेरा कुछ प्रयो- जन नहीं, मैं आकाशवत् ही रहता हूँ । मैं न कुछ इच्छा करूँगा न राज्य करूँगा तो भी मेरा सिद्ध नहीं होता इससे जो कुछ प्रकृत आचार है उसी को मैं करूँ । बन्धन का कारण अज्ञान है सो तो नष्ट हुआ है अब कोई क्रिया मुझको बन्धनरूप नहीं । हे रामजी ! इसी प्रकार निर्णय करके बलि ने दैत्यों की ओर देखा तब देवता और दैत्यों ने शीश से प्रणाम किया और राजा ने दृष्टि करके उनकी प्रणाम वन्दना अङ्गीकार की । तब राजा बलि ने ध्येयवासना को मन से त्याग किया और राज्य के कार्य करने लगा । ब्राह्मण, देवता और गुरु का पूर्ववत् पूजन किया, जो कोई अर्थी और मित्र, बान्धव, टहलुये थे उनका अर्थ पूर्ण किया, स्त्रियों को नाना प्रकार के वस्त्र आभूषण दिये और जो दण्ड देने योग्य थे उनको दण्ड दिया । फिर उसने यज्ञ का आरम्भ करके सुरगणों का पूजन किया और शुक्रजी से आदि ले मुख्य-मुख्य देवता यज्ञ कराने के निमित्त बैठे । फिर विष्णु भगवान् ने इन्द्र के अर्थ सिद्ध करने के निमित्त छल करके बलिराज को वञ्चित कर लिया और बाँधकर पाताल में स्थित किया । वह आगे इन्द्र होगा अब जीवन्मुक्त, स्वस्थवपु, सदा ध्यानस्थित और एषणा से रहित पुरुष पाताल में है । हे रामजी ! जीवन्मुक्त पुरुष राजा बलि सम्पदा और आपदा में समचित्त विचरता है, वह सम्पदा में हर्ष नहीं करता और आपदा में शोक नहीं करता । अनेक जीवों का उपजना और लय होना बलि ने देखा है, दश करोड़ वर्ष पर्यन्त तीनों लोकों का कार्य किया और बड़े विषयभोग भोगे हैं । अन्त में भोगों को विरस जानकर उसका मन विरम हुआ विचार करने से तृष्णा नष्ट हो गई और मन उपशम हुआ । हेयोपादेय की नाना प्रकार चेष्टा बलि ने देखीं पर पदार्थों के भाव अभाव में मन शान्ति को ही प्राप्त हुआ । अब भोगों की अभिलाषा त्याग आत्मारामी हो नित्य स्वरूप में स्थित पाताल में विराजता है । हे रामजी ! इस बलि को फिर इस जगत् का इन्द्र होना और सम्पूर्ण जगत का कार्य करना है वह अनेक वर्ष आज्ञा चलावेगा परन्तु इन्द्रपद को पाकर भी तुष्टवान न होगा और अपने
उपशम प्रकरण । ६२७
ऐश्वर्य पद के गिरने मे खेदवान् भी न होगा और सब पदार्थों और विभू- तियों के उदय और अस्त में अमर होगा। यह बलि की विज्ञान प्राप्ति का क्रम वृत्तान्त कहा है। इसी दृष्टि का आश्रय करके तुम भी स्थित हो और बलि की नाईं अपने विवेक से नित्य तृप्ति आत्मनिश्चय को धारो कि सब में ही हूँ। इस निश्चय से निद्वन्द और परमपद प्राप्त होगा। हे रामजी ! दस करोड़ वर्ष तीनों लोकों का राज्य बलि ने भोगा और अन्त में विरक्त हुआ तैसे ही तुम भी भोगों से विरक्त हो जाओ। ये भोग तुच्छ हैं, इनको त्यागकर परमपद में प्राप्त हो जाओ। यह जो दृश्य प्रपञ्च नाना प्रकार के विकार संयुक्त भासता है वह न कोई तेरा है और न तू किसी का है। जैसे पर्वत और शिला में बड़ा भेद है तैसे ही जिस पुरुष का मन संसार की ओर धावता है वह मन की वृत्ति में डूबता है। जब तुम मन को हृदय में धरोगे तब सब जगत् में तुम प्रकाशवान् होगे। तुम आत्मस्वरूप हो तो अपना क्या और पराया क्या—यह सब मिथ्या कल्पना है। तुम सबके आदि पुरुषोत्तम हो तुम ही साकाररूप पदार्थ और तुमही सब ओर पूर्ण और जगत् में चेतनरूप हो और स्थावर-जङ्गम जगत् सब तुम में पिरोया है—जैसे सूत में माला के दाने पिरोये हैं। तुम नित्य शुद्ध, उदित, बोधस्वरूप और भ्रान्ति से रहित हो। जन्म आदिक सब रोग के नाश निमित्त आत्मविचार करके बलात्कार से भोगों का त्यागकर सबके भोक्ता हो जाओ। तुम केवल स्वरूप जगत् के नाथ हो और चैतन्य सूर्य प्रकाशरूप सर्वदा स्थित हो। सब जगत् तुम्हारे प्रकाश से प्रकाशता है और सुख दुःख की कल्पना तुम्हारे में कोई नहीं। तुम तो शुद्ध, सर्वात्मा और सर्व प्रकाशक हो, इष्ट अनिष्ट को त्याग करके केवल अपने स्वरूप में स्थित हो। इष्ट अनिष्ट के त्याग से निरन्तर सत्यता उदय होती है उस सत्यता को हृदय में धार फिर जन्म मरण भी नहीं आता। जिस जिस पदार्थ में मन लगे उससे निकालकर आत्मतत्त्व में लगाओ ! जब इस प्रकार तुम दृढ़ अभ्यास करोगे तब मन जो उन्मत्त हाथी है वह बाँधा जावेगा और तभी सब सिद्धान्तों के परमसार को प्राप्त होगे। हे रामजी ! तुम मूढ़ों
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की नाईं मत हो। क्योंकि मूढ़जीव सब चेष्टा मिथ्या ही करता है। मिथ्या चेष्टा से जिनकी बुद्धि नष्ट हुई है और अविद्यारूपीधूर्त से बिके हैं उनके तुल्य न होना। यह जगत् अणुमात्र भी कुछ नहीं है। पर बड़ा विस्तार रूपी जो दृष्ट आता है सो निर्णय में देखा है कि मूढ़ता से भासित हुआ है। मूढ़ता परम दुःखरूप है, इससे अधिक दुःख कोई नहीं। आत्मा-रूपी सूर्य के आगे आवरणकर्त्ता जो अज्ञानरूपी मेघ है उसको विवेक-रूपी पवन से नाश करोगे तब आत्मा का साक्षात्कार होगा। आत्म-विचार के अभ्यास और विषयों में वैराग्य बिना आत्मा का साक्षात्कार नहीं होता। वेदरूप वेदान्तशास्त्र जो दृष्टान्त और तर्कयुक्त हैं उनसे भी अपने विचार बिना साक्षात्कार नहीं होता। आत्मविचार और पुरुषार्थ से आत्मा की प्रसन्नता होती है और बुद्धि की निर्मलता बोध से प्राप्त होती है। इससे संकल्प विकल्प से रहित होकर चैतन्यतत्त्व में स्थित हो जाओ। विस्तृत और व्यापकरूप आत्मतत्त्व की स्थिति मेरे वचनों के ग्रहण करने से सब सङ्कल्प तुम्हारे लीन हो गये हैं संवेदनरूपी भ्रम शान्त हुआ है और संसाररूपी कुहिरा तुम्हारा नष्ट हुआ है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे बल्युपाख्यानसमाप्तिवर्णन-नामैकोनत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ २९ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! अब तुम विज्ञान प्राप्ति के निमित्त और क्रम सुनो जैसे दैत्य असुर प्रह्लाद को आत्मा की सिद्धता हुई तैसे तुम भी हो जाओ। पाताल में एक हिरण्यकशिपु दैत्य महाबलिष्ठ हुआ है जिसने इन्द्र आदि भगाये थे और विष्णुजी के सम उसका पराक्रम था। सम्पूर्ण भुवन उसने वशकर छोड़े थे और सब देवता और दैत्यों को वश करके जगत् का कार्य करता था। वह दैत्यों और तीनों भुवनों का ईश्वर हुआ और समय पाकर कई पुत्र उत्पन्न किये—जैसे वसन्त ऋतु अंकुर उत्पन्न करती है। उसके पुत्रों में बड़ा पुत्र प्रह्लाद सबसे अधिक प्रकाश-वान् हुआ और निज पुत्र से हिरण्यकशिपु ऐसा शोभित हुआ जैसे सब सुन्दर लताओं से वसन्तऋतु शोभता है। जैसे प्रलयकाल में सूर्य सब लोकों को तपाता है तैसे ही वह सबको तपाने लगा। जब दुष्ट कीड़ा
उपशम प्रकरण । ६२६
से देवताओं को दैत्य दुःख देने लगे तब सब देवता मिलकर विष्णु की शरण गये और विनती की कि यह हिरण्यकशिपु महादुष्ट है इसका नाश करो और हमारी रक्षा करो। बारम्बार दुःखवाने से महापुरुष भी क्रोधवान् हो जाते हैं । हे रामजी ! जब इस प्रकार देवताओं ने प्रार्थना की तब विष्णुदेव ने कहा अब तुम जाओ में इसके पुत्र के हेतु से मारूँगा । ऐसे कहकर विष्णु भगवान् अन्तर्धान हो गये और हिरण्यकशिपु अपने ऐश्वर्य की शिक्षा प्रह्लाद को देने लगा परन्तु वह ग्रहण न करे और बहुत प्रकार ताड़ना भी दे तो भी उसकी शिक्षा को प्रह्लाद अङ्गीकार न करे । वह ईश्वर विष्णुजी की आराधना में रहता था इस कारण ताड़ना का दुःख प्रह्लाद को कुछ न हो । तब दैत्य अपने हाथ में खङ्ग लेकर कहने लगा कि हे दुष्ट ! तेरा ईश्वर कहाँ है, जिसका तू आराधन करता है । मेरे सिवा ईश्वर और कौन है ? प्रह्लाद ने कहा मेरा ईश्वर सर्वव्यापक है । तब हिरण्यकशिपु ने कहा इस खम्भे में कहाँ है ? जो है तो दिखा दे और यदि न दिखावेगा तो तुझको मारूँगा । तब सर्वव्या-पक विष्णु खम्भे से भासने लगे और बड़े शब्द होने लगे। फिर उस खम्भे को फोड़कर बड़ी भुजा और तीक्ष्ण नखों से संयुक्त महाभयानक-रूप से विष्णु भगवान् ने नरसिंहरूप प्रकट करके हिरण्यकशिपु को नखों से विदारण किया और ऐसा कोपवान् रूप धरा जिसमें दैत्यों के स्थान जलने लगे और दृष्टि से मानों पर्वत चूर्ण होते थे। दैत्यों के कई समूह मारे गये, कई भागे और बहुत से दिशाविदिशा को दौड़ गये-जैसे वायु के मारे मच्छर उड़ जाते हैं और कुछ पाताल छिद्र में नाश हो गये । निदान प्रलयकालवत् स्थान शून्य हो गये मानों अकाल प्रलय आया है और दैत्यों को नाश करके फिर विष्णुदेव अन्तर्धान हो गये । कुछ दैत्य बान्धव और टहलुये जो रहे थे वे प्रह्लाद के निकट मुख कुम्हि-लाये हुए आये-जैसे जल से रहित कमल होता है और भाई, बान्धव मिलकर प्रह्लाद को समझाने लगे । प्रह्लाद ने सबसे मिलकर पिता का शोच किया और फिर उठकर सब कर्म किये । निदान संशयसंयुक्त सब दैत्य बैठे और विचार करके शोकवान् हुए और मद्य सूखकर चित्र की
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पुतलीवत् हो गये । जैसे दग्धवृक्ष सूखकर रस से रहित हो जाता है तैसे ही हिरण्यकशिपु बिना दैत्य शोकवान् और महादुःखी हुए ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे हिरण्यकशिपुवधोनाम त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३० ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब हिरण्यकशिपु के मारने से दैत्य बहुत दुःखी हुए तब प्रह्लाद ने मौन होकर विचारा कि पाताल में सब दैत्य मिलकर चिन्तासंयुक्त बैठे हैं । उनसे जाकर प्रह्लाद ने कहा कि अब अपनी रक्षा के निमित्त कौन उपाय कीजियेगा, हमारे दैत्यों के नाश करनेवाले विष्णु बड़े बली हैं, जिनके नख तीक्ष्ण खङ्ग की धारवत् हैं जैसे सिंह मृगों को मारता है तैसे वे हमको मारते हैं और पाताल में दैत्य शान्तिमान् कदाचित् नहीं होने पाते । जब दैत्य बढ़ते हैं तब विष्णु आ उन्हें नाश करते हैं और जैसे कमलों पर पर्वत आ पड़े तैसे उन्हें चूर्ण करते हैं । बड़े आकाश गौरव शब्द करनेवाले दैत्य उपज उपजकर नष्ट हो जाते हैं—जैसे जल में तरङ्ग उपजकर नष्ट हो जाते हैं । भीतर बाहर वह हमको बड़ा कष्ट देता है । हमारा शत्रु बड़ा दृढ़ और बड़ा अपूर्वतम् आ बढ़ा है, हमारा हृदय तम से पूर्ण हो गया है और सम्पदा नष्ट हो गई है । जो देवता हमारे पिता से चूर्ण हुए थे उनका बल अब हमसे अधिक हो गया है और वे हमारी स्त्रियों को वश कर ले गये हैं—जैसे मृग को व्याध ले जाता है वे हमारा सब धन भी ले गये हैं और हम दीन हो रहे हैं जैसे जल बिना कमल कुम्हिला जाता है तैसे ही हम भी बान्धव बिना हुए हैं । हमारे घरों में धूल उड़ती है, जो बड़े स्थान मणियों से खचित थे वे शून्य हो गये और हमारे स्थानों में जो बड़े कल्पवृक्ष लगे थे वे उखाड़कर नन्दन वन में लगाये हैं । नरसिंह की सहायता से देवताओं ने ऐसा बल पाया है । हमारे वृक्ष और स्थान नरसिंहजी ने जला दिये हैं जिन देवताओं की स्त्रियों के मुख दैत्य देखते थे, उन सब दैत्यों की स्त्रियों के मुख अब देवता देखते हैं । जिस सुमेरु पर्वत पर कल्प और मन्दारवृक्ष विराजते थे वे स्थान अब शून्य हो गये वहाँ धूल उड़ती है और शोभा से रहित हो गया है । जो दैत्यों की स्त्रियाँ अपने
उपशम प्रकरण । ६३१
स्थानों में बैठी थीं वे अब देवाङ्गनाओं के शिर पर चमर करती हैं और वे हास विलास करती हैं. यह बड़ा कष्ट है । हमको आपदा ने दीन किया है । हे दैत्यों ! हमको और उपाय कोई दृष्टि नहीं आता जब उस ही विष्णु की शरण में जावें तब सुखी होंगे वह कैसा पुरुष है, जिसके दो भुजारूपी वृक्षों की छाया में देवता विश्राम करते हैं और जैसे हिमालय पर्वत कदाचित् तपायमान नहीं होता तैसे ही जो पुरुष विष्णु की शरण जाता है वह तपायमान नहीं होता । तुम देखते हो कि जो देवाङ्गना असुरों की स्त्रियों का पूजन करती थीं वे अब अपने को पुजाने लगीं हैं और हम दैत्यों की स्त्रियों के मुख कुम्हिला गये हैं । जैसे बर्फ की वर्षा से कमल सूख जाता है तैसे ही हमारे मण्डप टूट गये हैं और नीलमणि के खम्भे गिर पड़े हैं । दैत्य सेना जो आपदा के समुद्र में डूबती थी उसके रक्षा करने को हमारे पितादि बड़े समर्थ थे और डूबने न देते थे । जैसे क्षीरसमुद्र में मन्दराचल को कच्छपरूप ने डूबने न दिया था हमारे पितादि जो बड़े बड़े बली रक्षा करनेवाले थे उनको विष्णुजी ने मारके चूर्ण किया-प्रलयकाल का पवन पर्वतों को चूर्ण करता है । ऐसे मधुसूदन की गति अति विषम है वे दैत्यों की भुजारूपी दण्ड के काटनेवाले कुठार हैं, उनकी सहायता से इन्द्रादिक देवता दैत्य सेना को जीतने और मारने लगे हैं-जैसे बालक को, वानर मारें । इस पुण्डरीकाक्ष विष्णु को जीतना कठिन है । जो वे शस्त्रों बिना हों तो भी हमारे शस्त्र इनको छेद नहीं सकते और वज्र भी छेद नहीं सकता । वे महापराक्रमी हैं उन्होंने युद्ध का बड़ा अभ्यास किया है और पर्वतों के साथ युद्ध करते रहे हैं । हमारा पिता जो बड़ा बली था और जिसने त्रिलोकी के राजा और सब देवता वश किये थे उसको भी इसने मार डाला तो हमारा मारना कौन कठिन है । यह महाबली है इसको हम नहीं जीत सकते, इसलिये एक उपाय में तुमसे कहता हूँ उससे विष्णु वश होंगे । उपाय यह है कि विष्णु जो सर्वात्मा, सबका प्रकाश और सबका कारण है उसकी हम शरण हों, और हमारी कोई गति आश्रय नहीं । हे दैत्यों ! उसमे अधिक इस त्रिलोकी में कोई नहीं, जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और
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प्रत्ययकर्ता वही देवता है। उसके ध्यान में लगो और एक निमेष भी उसके ध्यान से न उतरो। मैं भी उसके ध्यान में लगता हूँ। वह नारायण अजन्मा पुरुष है और में सदा उसके परायण हूँ और सब प्रकार नारायण में हूँ। 'ओंनमोनारायणाय' यह मन्त्र सब अर्थों को सिद्ध करता है इस मंत्र के ध्यान जाप करते हुए हमारे हृदय में स्फुरणरूप होगा। वह हरि सबका आत्मा है, पृथ्वी हरि है, यह सब जगत् भी हरि है, में भी हरि हूँ, आकाश भी हरि है और सबका आत्मा भी हरि है। अविष्णु होकर जो विष्णु का पूजन करते हैं वे पूजने का फल नहीं पाते और जो विष्णु होकर विष्णु का पूजन करते हैं वे परम उत्तम फल पाते हैं। इससे में विष्णुरूप होकर स्थित होता हूँ। में अनन्त आत्मा आकाश गरुड़ पर आरूढ़ हूँ और सुवर्ण के भूषण पहिरे हूँ मेरे हाथरूप वृक्ष पर जीवरूप सब पक्षी विश्राम पाते हैं। यह मेरी चतुर्भुजा है। जब मैंने क्षीरसमुद्र मथन किया था तब यह परस्पर घिसे हैं और यह मेरे पार्षद हैं, सुन्दर चमर जिनके हाथों में हैं इनको मैंने क्षीरसमुद्र में उपजाया है। त्रिलोकीरूप वृक्ष की यह सुन्दर मञ्जरी जो महाधवल मन के हरनेवाली है। यह मेरे पार्षदों में माया है, जिसने अनन्त जगत्जाल निरन्तर उत्पत्ति, प्रलय किया है और इन्द्रजाल की विलासिनी है। यह मेरे पार्षदों में जो शक्ति है इन्होंने लीला करके त्रिलोकीखण्ड वश किया है। जैसे कल्पवृक्ष लता फूलती है तैसे ही मेरे पार्षदों में यह फूलती है शीत उष्ण मेरे दो नेत्र हैं जो सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशते हैं और चन्द्रमा और सूर्य उनके नाम हैं। यह मेरा नीलकमल और महासुन्दर श्याम मेघवत देह महाप्रकाशरूप है। यह मेरे हाथ में पाञ्चजन्य शंख जिसकी स्फुरण-रूप ध्वनि है क्षीरसमुद्र में निकला है। यह नाभिकमल है जिसमें ब्रह्मा उत्पन्न हुए और इसमें निवास करते हैं-जैसे भ्रमर कमल में निवास करता है। यह मेरे हाथ में कौमोदकी गदा है जो सुमेरु के शिखरवत रत्नों की बनी हुई है और दैत्यदानवों के नाश करनेवाली है। यह मेरे हाथों में महाप्रकाशरूप सुदर्शनचक्र है। जिसका तेज ज्वाला के पुञ्जवत है और साधु को सुख देनेवाला है। यह मेरे हाथों में अग्नि के समूह
उपशम प्रकरण । ६३३
वाला कुठार है सो दैत्यरूपी वृक्षों को काटनेवाला है और साधुओं को आनन्ददायक है । यह मेरे हाथ में शार्ङ्गधनुष है, इसकी महाप्रकाशवत् ध्वनि है । यह मेरे पीतवर्ण वस्त्र हैं यह वैजयन्तीमाला है और कौस्तुभमणि मेरे कण्ठ में है । ऐसा मैं विष्णुदेव हूँ । अनन्त जगत् जो उत्पत्ति और लय हो गये हैं सबों का धारनेवाला हूँ । यह पृथ्वी मेरे चरण हैं, आकाश मेरा शीश है तीनों लोक मेरा वपु है, दशोदिशा मेरे वक्षःस्थल हैं और मैं साक्षात् विष्णु हूँ । नीलमेघवत् मेरी कान्ति है, गरुड़ पर आरूढ़, शंख, चक्र, गदा, पद्म का धारनेवाला हूँ । जिसका चित्त दुष्ट है वह हमको देखकर भाग जाता है । यह सुन्दर, शीतल चन्द्रमावत् मेरी कान्ति है और पीतवस्त्र श्यामवदन गदाधारी हूँ । लक्ष्मी मेरे वक्षस्थल में है और अच्युतरूपी विष्णु में हूँ । वह कौन है जो मेरे साथ विरोध कर सके ? मैं त्रिलोकी जला सकता हूँ, जो मेरे साथ युद्ध करने को सम्मुख आवे उसको मैं नाश का कारण हूँ । जैसे अग्नि में पतङ्ग जल मरते हैं तैसे ही मेरा तेज है । मेरी दृष्टि कोई सह नहीं सकता । मैं विष्णु ईश्वर हूँ, ब्रह्मा, इन्द्र और यमादिक नित्य मेरी स्तुति करते हैं और तृणकाष्ठ स्थावर जङ्गम जो कुछ जाल है सबके भीतर व्यापकरूप हूँ । त्रिलोकी में मैं प्रकाशरूप अजन्मा और भयनाशकर्त्ता हूँ । ऐसा मेरे स्वरूप को मेरा नमस्कार है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे प्रह्णादविज्ञानन्नाम एकत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३१ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार प्रह्णाद ने अपना नारायण-स्वरूप करके ध्यान किया । फिर पूजन के निमित्त विष्णु का चिन्तन किया और मन में विष्णुजी की दूसरी मूर्ति जो गरुड़ पर आरूढ़ और चार शक्ति—अर्थात् धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष से सम्पन्न चारों हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये श्याम रङ्ग है, चन्द्रमा और सूर्य की नाईं सुन्दर नेत्र हैं और हाथ में शार्ङ्गधनुष है, धारण करके परिवारसंयुक्त भली प्रकार धूप दीप और नाना प्रकार के विचित्र वस्त्र और भूषणों सहित पूजन किया और अर्घ दिया । चन्दन का लेपन, धूप, दीप, नाना प्रकार के भूषणों सहित पिस्ता, खजूर, बादाम आदिक मेवों से भक्ष्य, भोज्य, चोष्य, और
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लेह्य चार प्रकार के भोजन कराये । फिर अपना आप विष्णु को अर्पण किया और परम भक्ति को प्राप्त हुआ । जिस प्रकार मन से पूजन किया उसी प्रकार अन्तःपुर में विष्णु की मूर्ति देखकर पूजा । इसी प्रकार दिन प्रति दिन विष्णु का पूजन किया और जिस प्रकार प्रह्लाद मन की चिन्तन से पूजा करे उसी प्रकार और दैत्य भी मानसी पूजा करें । उनको प्रह्लाद ने सिखाया और उस पुर में सब दैत्य कल्याण मूर्ति विष्णुभक्त हो गये । जैसा राजा होता है तैसी ही उसकी प्रजा होती है । इसमें कुछ आश्चर्य नहीं । यह वार्ता देवलोक में प्रकट हुई कि दैत्यों ने विष्णु का द्वेष त्याग किया है और भक्त हुए हैं तब देवता आश्चर्य को प्राप्त हुए और इन्द्रादिक अमर गण विचारने लगे कि यह क्या हुआ जो दैत्यों ने विष्णु की भक्ति ग्रहण की और उनको यह प्राप्त कैसे हुई । ऐसे आश्चर्यवान होकर क्षीरसमुद्र में दैत्यों की वार्ता करने के निमित्त वे विष्णु के निकट गये और कहा, हे भगवन् ! यह आपने क्या माया फैलाई कि जो दैत्य सर्वदा विरोध करते थे वे अब तुम्हारे साथ तन्मयरूप हो रहे हैं, कहाँ वह दुर्वृत्ति पर्वत को चूर्ण करनेवाले दैत्य और कहाँ तुम्हारी भक्ति, जो अनेक जन्मों में भी दुर्लभ है । हे जनार्दन ! तुम्हारी भक्ति कहाँ और उनकी वृत्ति कहाँ । यह तो अपूर्व वार्ता हुई है । जैसे समय बिना पुष्पों की माला नहीं शोभती तैसे ही पात्र बिना तुम्हारी भक्ति नहीं शोभती और यह हमको सुखदायक नहीं भासता । जैसा जैसा कोई होता है तैसे ही तैसे स्थान में शोभता है । जैसे काँच में महामणि नहीं शोभती तैसे ही दैत्यों में तुम्हारी भक्ति नहीं शोभती । जैसा गुण किसी में होता है तैसी ही पंक्ति में वह शोभता है और में स्थित हुआ नहीं शोभता है । जो सुदेश नहीं होता सो दुःखदायक होता है । जैसे अङ्गों में वज्र दुःखदायक होता है । जैसा गुणवान हो तैसा पदार्थ जब प्राप्त होता है सो इह शोभा पाता है विपर्यय हो तब शोभा नहीं पाता । जैसे कमलिनी जल में शोभती है मरुस्थल में नहीं शोभती तैसे ही कहाँ वह अधर्म नीचजन भयानक कर्म करनेवाले और कहाँ तुम्हारी आश्चर्य भक्ति । जैसे कमलिनी पृथ्वी पर नहीं शोभती तैसे ही तुम्हारी भक्ति दैत्यों में नहीं