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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ
६५८योगवाशिष्ट ।

पुष्पों से प्रफुल्लित है और उदय होता है उसको मरना श्रेष्ठ है। जो पुरुष अपनी देह में आधि व्याधि दुःखों से जलता है और जिसके हृदय में कामक्रोधरूपी सर्प फुरते हैं और देहरूपी सूखा वृक्ष निष्फल है और चित्त चञ्चल है ऐसी देह के त्यागने को लोक में मरना कहते हैं; स्वरूप से नाश किसी का नहीं होता । क्या ज्ञानी का ही क्या अज्ञानी का हो । हे साधो ! जिसकी बुद्धि आत्मतत्त्व के अवलोकन से उपराम नहीं होती ऐसा जो यथार्थदर्शी ज्ञानवान् है और जिसका हृदय राग द्वेष से रहित शीतल हुआ है और दृश्यवर्ग को साक्षीभूत होकर देखता है उसका जीना श्रेष्ठ है । जो पुरुष सम्यक् ज्ञान द्वारा हेयोपादेय से रहित है और चेतनतत्त्व में तद्रूप चित्त हुआ है, जिसने संकल्प मल से रहित चित्त को आत्मपद में लगाया है और जिस पुरुष को जगत् के इष्ट-अनिष्ट पदार्थ समान भासते हैं और शान्तचित्त हुआ लीलावत् जगत् के कार्य करता है, जो इष्ट अनिष्ट की प्राप्ति में राग द्वेष नहीं करता, जिसे ग्रहण त्याग की बुद्धि उदय नहीं होती और जिसके श्रवण और दर्शन किये से औरों को आनन्द उपजता है उसका जीना शोभता है जिसके उदय हुए से जीवों के हृदयकमल प्रफुल्लित होते हैं उसका चिरजीना प्रकाश-वान् शोभता है और वही पूर्णमासी के चन्द्रमावत् सफल प्रकाशता है-नीच नहीं शोभते ।

इति श्रीयोगवाशिष्टे उपशमप्रकरणे प्रह्लादोपाख्याने नारायणवनो- पन्यासयोगोनामैकोनचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३६ ॥

श्रीभगवान् बोले, हे साधो ! यह जो देहसंग दृष्टि आती है उसका नाम जीना कहते हैं और इस देह को त्यागकर और देह में प्राप्त होने का नाम मरना है । हे बुद्धिमान् ! इन दोनों पक्षों से अब तू मुक्त है, तुझको मरना क्या है जीना क्या है-दोनों सममात्र हैं । इस अर्थ के दिखाने के निमित्त मैंने तुझसे मरना और जीना कहा है कि गुणवानों का जीना श्रेष्ठ है और मूढों का मरना श्रेष्ठ है पर तू न जीता है, न मरेगा । देह के होते भी तू विदेह है और तेरे आकाश की नाईं अङ्ग हैं । जैसे आकाश में वायु नित्य चलता है परन्तु उससे आकाश निर्लेप रहता है

उपशम प्रकरण । ५७३

तैसे ही तू देह में निर्लेप रहेगा। देह, इन्द्रियाँ, मन आदिक की क्रिया सब तुझसे होती हैं, सबका कर्त्ता और सत्ता देनेवाला तू ही है और स्वरूप से सदा अकर्त्ता है। जैसे वृक्ष की ऊँचाई का कारण आकाश है तैसे ही तेरे में कर्त्तव्य है। तू अब जाना है, सब वस्तु ज्यों की त्यों जानी है और तू अस्ति नास्ति मन का आत्मा है यह परिच्छिन्नरूप जो देह है सो अज्ञानी का निश्चय है और यह केवल दुःखों का कारण है। तू तो सर्व प्रकार सर्वात्मा चेतन प्रकाश है, तेरी बुद्धि आत्मपरायण है और तुझको देह अदेह क्या और ग्रहण और त्याग क्या। जो तत्त्वदर्शी पुरुष हैं उनका भावपदार्थ उदय हो अथवा लीन हो और प्रलयकाल का पवन चले तो भी उसको चला नहीं सकता और जिसका मन भाव अभाव से रहित है यह जो पर्वत के ऊपर पर्वत पड़े और चूर्ण हों और कल्प की अग्नि में जलने लगे तो भी अपने आपमें स्थित है--चलायमान नहीं होता। सब भूत स्थित होवें, इकट्ठे नष्ट हो जावें अथवा वृद्ध होवें वह सदा अपने आपमें स्थित है, इस देह के नष्ट हुए नाश नहीं होता और विक्षेप दुःख प्राप्त नहीं होता। इस देह में जो परमेश्वर आत्मा स्थित है वह मैं हूँ। मेरा अनात्मा भ्रम नष्ट हो गया है और ग्रहण त्याग मिथ्या कल्पना उदय नहीं होती। जो विवेकी तत्त्ववेत्ता हैं उनका संकल्पमन नष्ट हो जाता है और जो प्रबुद्ध पुरुष है वह सब क्रिया करता भी अकर्त्तापद को प्राप्त होता है। वह सर्व अर्थों में अकर्त्ता, अभोक्ता रहता है और जगत् के किसी पदार्थ की इच्छा नहीं करता। जब कर्तृत्व भोक्तृत्व शान्त होता है तब आत्मपद शेष रहता है। इस निश्चय की दृढ़ता को बुद्धिमान् और मुक्त कहते हैं। प्रबुद्ध पुरुष चिन्मात्रस्वरूप है और सबको अपने वश करके स्थित है, वह ग्रहण किसका करे और त्याग किसका करे। ग्राह्य और ग्राहक शब्द मात्र अविद्या है और देह इन्द्रियों से होता है सो ग्रहण करना क्या और त्याग करना क्या ? जब ग्राह्य ग्राहक भाव हृदय से दूर हुआ उसी का नाम मुक्त है। जिसकी ऐसी स्थिति उदय होती है वह परमार्थसत्ता में सदा स्थिति रहता है और वह पुरुषों में पुरुषोत्तम सुषुप्ति की नाईं स्थित है, उसके अङ्गों की चेष्टा बोध को प्राप्त हुई है।

६६० | योगवाशिष्ठ ।

विश्रान्तिमान् निरवासनिक पुरुषों की वासना भी जगत् में स्थित दृष्टि आती है और अर्द्ध सुषुप्त की नाईं चेष्टा करते हैं पर वे सब जगत् में आत्मा देखते हैं। वे आत्मविषयिणी बुद्धि में सुख में हर्षवान् नहीं होते और दुःख में भी शोकवान् नहीं होते एकरस आत्मपद में स्थित रहते हैं। नित्य प्रबुद्ध पुरुष कार्यभाव को ग्रहण करता है पर जैसे इच्छा से रहित दर्पण प्रतिबिम्ब को ग्रहण करता है तैसे ही भली बुरी भावना उसको स्पर्श नहीं करती। वह आत्मपद में जाग्रत् है और संसार की ओर से सोया है और सुषुप्तिरूप है। जैसे पालने में सोया हुआ बालक स्वाभाविक अङ्ग हिलाता है तैसे ही उसका हृदय सुषुप्तिरूप है और व्यवहार करता है। हे पुत्र ! तू अज्ञात परमपद को प्राप्त हुआ है। तू इस देह से ब्रह्मा का एक दिन भोगेगा और इस राजलक्ष्मी को भोगकर फिर अच्युत परमपद को प्राप्त होगा।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे प्रह्लादबोधो नाम चत्वारिंशच- मस्सर्गः ॥ ४० ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! अद्भुत जिसका दर्शन है ऐसे जगतरूपी रत्नों के डब्बे विष्णुदेव ने जब शीतलवाणी से इस प्रकार कहा तब प्रह्लाद ने नेत्रों को खोलकर धैर्य सहित कोमल वचन और मननभाव को ग्रहण करके देखा और नर्मदृष्टि से बाहर देखा कि बड़ा कल्याण हुआ है। परमेश्वर अपना आपस्वरूप अनन्त आत्मा है और सर्वसंकल्प से रहित आकाशवत् निर्मल है। अब मुझको शोक है, न मोह है और न वैराग से देहत्याग की चिन्ता है जो कुछ कार्य भयदायक होता है सो एक आत्मा के विद्यमान रहते शोक कहाँ, नाश कहाँ, देहरूपी संसार कहाँ, संसार की स्थिति कहाँ, भय कहाँ और अभयता कहाँ, मैं यथेच्छित अपने आपमें स्थित हूँ। इस प्रकार मैं निर्मल विस्तृतरूप केवल पावन में स्थित हूँ और संसारबन्धन को त्यागकर विरक्त हुआ हूँ। जो अप्रबुद्ध मूढ़ हैं उनकी बुद्धि में हर्ष शोक चिन्ता विकार सदा रहता है। वे देह के भाव में सुख मानते हैं और अभाव में दुःखी होते हैं। यह चिन्तारूपी विष की पंक्ति मूढ़ों को लिपायमान होती है। यह इष्ट है, यह अनिष्ट है, यह

उपशम प्रकरण । ६६१

ग्रहण करने योग्य है; यह त्यागने योग्य है; इस प्रकार मूर्खों के चित्त की अवस्था डोलायमान होती है पण्डितों की नहीं होती । में भिन्न हूँ और वह भिन्न है यह अज्ञान से अन्धवासना है, शुद्ध बुद्धि के विद्यमान नहीं रहती जैसे सूर्य की किरणों से रात्रि दूर रहती है तैसे ही यह वासना दूर रहती है । यह त्याग और यह ग्रहण कीजिये सो मिथ्या चित्त का भ्रम है और उन्मत्त अज्ञानी के हृदय में होता है, ज्ञानवान् के हृदय में यह भ्रम उदय नहीं होता । हे कमलनयन ! सर्व तू ही है और विस्तृत आत्मरूप है । हेयोपादेय और द्वैतभाव कल्पना कहाँ है ? यह सम्पूर्ण जगत् विज्ञानरूप सत्ता का आभास है । सत्य असत्यरूप जगत् में ग्रहण त्याग किसका कीजिये ! केवल अपने स्वभाव में द्रष्टा और दृश्य का विचार किया है उसमें में प्रथम क्षीण विश्रान्तवान् हुआ था अब भाव अभाव-जगत् के पदार्थों से मुक्त हुआ हूँ और हेयोपादेय से रहित आत्मतत्त्व मुझको भासता है और समभाव को प्राप्त हुआ हूँ । अब मुझको संशय कुछ नहीं रहा, जो कुछ करता हूँ वह आत्मा में करता हूँ । त्रिलोकी में तबतक तू पूजने योग्य है जबतक प्रलय नहीं हुआ इसमें में आदरसंयुक्त पूजन करता हूँ, तुम ग्रहण करो । वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार दैत्यराज ने कहकर क्षीरसमुद्र में शयन करनेवाले विष्णु को श्रेष्ठ सुमेरु की मणियों से पूजा और फिर शंख, चक्र, गदा, पद्म आदिक शस्त्रों का पूजन करके गरुड़ की पूजा की और फिर देवता और विद्याधरों की पूजा की । इस प्रकार भगवान् के आत्मस्वरूप का हृदय में ध्यान करके परिवार संयुक्त पूजन किया, तब लक्ष्मीपति बोले, हे दैत्येश्वर ! तू उठकर सिंहासन पर बैठ, में तुझको अपने हाथ से अभिषेक करता हूँ और पाञ्चजन्य शंख बजाता हूँ उसका शब्द सुनकर सब सिद्ध और देवता आकर तेरा मङ्गल करेंगे । इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार कहकर विष्णुजी ने दैत्य को इस भाँति सिंहासन पर बैठाया जैसे सुमेरु पर मेघ आ बैठे और फिर क्षीरसमुद्र और गङ्गादि तीर्थों का जल मँगाके पाञ्चजन्य शंख बजाया जिसके शब्द से सब सिद्धगण, ऋषि, ब्राह्मण, विद्याधर, देवता और मुनियों के समूह आये और सबने

६६२ योगवाशिष्ट ।

स्तुति की। इस प्रकार अभिषेक देकर मधुसूदन बोले, हे निष्पाप! जब तक सुमेरु के धरनेवाली पृथ्वी और सूर्य चन्द्रमा का मण्डल है तब तक तू इष्ट अनिष्ट में समबुद्धि, वीतराग और क्रोध से रहित होकर राज्यभोग और राज्य की पालना कर । तुमको पूर्ण भूमिका प्राप्त हुई है उसमें स्थित होकर जैसे प्राप्त हो तैसे ही, हर्ष, शोक और उद्वेग से रहित होकर विचर। ईर्ष्याद्वेष से रहित हो तू बन्धनवान न होगा । संसार की स्थिति तूने सब देखी है और सबको जानता है अब मैं तुझको क्या उपदेश करूँ । तू राग द्वेष से रहित होकर राज्य भोग, अब दैत्यों का रुधिर धरती पर न पड़ेगा अर्थात देवताओं के साथ विरोध न होगा । आज से देवता और दैत्यों का संग्राम गया। जैसे मन्दराचल से रहित क्षीरसमुद्र शान्तिमान हुआ था तैसे ही सब जगत् स्वस्थ रहेगा । मोहरूपी तम तेरे हृदय से दूर हुआ है और सदा प्रकाशस्वरूप लक्ष्मी हुई है और अनन्त विलासों को निष्कामी से भोगता आत्मपद में स्थित रह ।

इति श्रीयोगवाशिष्टे उपशमप्रकरणे प्रह्लादाभिषेकोनाम षट्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३६ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार कहकर पुण्डरीकाक्ष परिवार संयुक्त चले मानो दूसरी संसार की रचना दैत्य के मन्दिर से चला है । तिस पीछे प्रह्लाद ने पुष्पाञ्जलि दी और क्रम से क्षीरसमुद्र में पहुँचे और देवताओं को विदा करके आप शेषनाग के आसन पर जैसे श्वेतकमल पर भँवरा बैठे तैसे स्वस्थ होकर बैठे । हे रामजी ! यह दृष्टि अज्ञान के सम्पूर्ण मल के नाश करनेवाली है । प्रह्लाद को बोध की प्राप्ति की जो अवस्था मैंने तुमसे कही है वह चन्द्रमा के मण्डलवत् शीतल है । जो मनुष्य बड़ा पापी हो और इसको विचारे तो वह भी शीघ्र ही परमपद को प्राप्त हो और जो पाप से रहित है उसकी क्या वार्ता कहिये केवल सम्यक् विचार करके पाप नष्ट हो जाता है । वह कौन है जो इन वाक्यों को विचार के परमपद को न प्राप्त हो । हे रामजी ! अज्ञानरूप पाप इसके विचार से नष्ट हो जाते हैं और पापों का कारण जो अज्ञान है उसका नाश करनेवाला यह विचार है-इससे विचार का त्याग कदाचित न करे । यह तो प्रह्लाद

उपशम प्रकरण ।

६६३

की सिद्धता कही है इसको जो मनुष्य विचारे उसके अनेक जन्मों के पाप नष्ट हो जावें इसमें कुछ संशय नहीं। रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! प्रह्लाद का मन तो परमपद में लग गया था पाञ्चजन्य शब्द से उसको विष्णुजी ने कैसे जगाया ? वशिष्ठजी बोले, हे निष्पाप, हे रामजी ! लोक में मुक्ति दो प्रकार की है एक सदेह और दूसरी विदेह, उनका भिन्न-भिन्न विभाग सुन। जिस पुरुष की बुद्धि देहादिकों से असंसक्त है और जिसको ग्रहण त्याग की इच्छा नहीं और निरहंकार हुआ चेष्टा करता है उसको तुम सदेह मुक्त जानो और देहादिक सब नष्ट हो जावें फिर न जन्म मरण करे उसको विदेह मुक्त जानो। वह उस पद को प्राप्त होता है जो अदृश्य-रूप है। अज्ञानी की वासना कच्चे बीज की नाईं है जो जन्मरूपी अंकुर को प्राप्त करती है और ज्ञानवान् मुक्त की वासना भुने बीज की नाईं जो जन्मरूपी अंकुर से रहित होती है। विदेह मुक्त की वासना का अंकुर दृष्टि नहीं आता जीवन्मुक्त पुरुष के हृदय में शुद्ध वासना होती है और पावनरूप परम उदारता सत्तामात्र नित्य आत्मध्यान में है और संसार की ओर से सुषुप्ति की नाईं शान्तरूप है। सहस्र वर्ष का अन्त हो जावे और शुद्ध वासना का बीज हृदय में हो तो वह पुरुष समाधि से जागेगा—वह जीवन्मुक्त है। इससे प्रह्लाद के हृदय में शुद्ध वासना थी उससे पाञ्च-जन्य शंख के शब्द से वह जागा। विष्णुजी सब भूतों के आत्मा हैं जैसे जिसकी इच्छा फुरती है तैसे ही तत्काल होता है और वे सर्वज्ञ और सबके कारण हैं। जब विष्णु ने चिन्तना की तब प्रह्लाद जागा। आप अकारण हैं कोई इसका कारण नहीं यही सब भूतों का कारण है सृष्टि की स्थिति निमित्त आत्मापुरुष ने विष्णुवपु धारा है और आत्मा के देखने ही से विष्णुजी का दर्शन होता है और विष्णु की आराधना से शीघ्र ही आत्मा का दर्शन होता है। आत्मा के देखने के निमित्त तुम भी इसी दृष्टि का आश्रय करो। तुम विराड्रूप हो, इसी दृष्टि से शीघ्र ही आत्मपद की प्राप्ति होगी। यह वर्षाकाल की नदीवत् संसार असार बादल है सो विचाररूपी सूर्य के देखे बिना जड़ता दिखाता है। विष्णुरूप जो आत्मा है उसकी प्रसन्नता से बुद्धिमान् की यह भावस्वरूप

६६४ योगवाशिष्ठ ।

माया नहीं बेधती। जैसे यन्त्रमाया यन्त्रमन्त्रवाले को नहीं बेध सकती तैसे ही आत्मा की इच्छा से यह संसार माया घनता को प्राप्त होती है और आत्मा की इच्छा से निवृत्त होती है। यह संसारमाया ईश्वर की इच्छा से वृद्ध होती है-जैसे अग्नि की ज्वाला वायु से वृद्ध होती है और वायु ही से नष्ट होती है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे प्रह्लादव्यवस्थानवर्णनंनाम द्विचत्वा- रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४२ ॥

इतना सुनकर रामजी ने पूछा, हे भगवन्, सब धर्मों के वेत्ता ! आपके वचन परम शुद्ध और कल्याणस्वरूप हैं जिनको सुनकर में आनन्दवान् हुआ हूँ-जैसे चन्द्रमा की किरणों से ओषध पुष्ट होती है-और आपके वचनों को सुनने को, जो पावन और कोमल हैं, जिसकी वाञ्छा है वह पुरुष जैसे पुष्पों की माला से सुन्दर छाती शोभती है तैसे ही शोभता है। हे गुरुजी ! आप कहते हैं कि सब कार्य अपने पुरुष प्रयत्न से सिद्ध होते हैं, जो ऐसा है तो प्रह्लाद माधव के वर बिना क्यों न जागा-जब विष्णु ने वर दिया तब उसको ज्ञान प्राप्त हुआ ? वशिष्ठजी बोले, हे राघव ! प्रह्लाद को जो कुछ प्राप्त हुआ वह पुरुषार्थ से प्राप्त हुआ, पुरुषार्थ बिना कुछ प्राप्त नहीं होता। जैसे तिलों और तेल में कुछ भेद नहीं तैसे ही विष्णु भगवान् और आत्मा में कुछ भेद नहीं। जो विष्णु है वह आत्मा है और जो आत्मा है वह विष्णु है, विष्णु और आत्मा दोनों एक वस्तु के नाम हैं, जैसे विटप और पादप दोनों एक वृक्ष के नाम हैं प्रह्लाद ने जो प्रथम अपने आपमे अपनी प्रेमशक्ति विष्णुभक्ति में लगाई सो आत्मशक्ति से लगाई, आत्मा से आप ही वर पाया और आप ही विचारकर अपने मन को जीता। कदाचित् आत्मा में आप ही अपनी शक्ति से जागता है अथवा विष्णुशक्ति से जागता है। हे रामजी ! प्रह्लाद चिरपर्यन्त आराधना करता प्रतापवान् हुआ। विचार से रहित को विष्णु भी ज्ञान नहीं दे सकता। आत्मा के साक्षात्कार में मुख्य कारण अपने पुरुषार्थ से उपजा विचार है और गौण कारण वर आदिक है, इससे तू मुख्य कारण का आश्रय कर। प्रथम पाँचों इन्द्रियों को वश कर

उपशम प्रकरण । ६६५

और चित्त को आत्मविचार में लगा जो कुछ किसी को प्राप्त होता है वह अपने पुरुषार्थ से होता है, पुरुषार्थ बिना नहीं होता । अपने पुरुषार्थ प्रयत्न से इन्द्रियरूपी पर्वत को लाँघे तो फिर संसारसमुद्र से तर जावे और तब परमपद की प्राप्ति हो । जो पुरुष के प्रयत्न बिना जनार्दन मुक्ति दें तो मृगपक्षियों को क्यों दर्शन देकर उद्धार नहीं करते। जो गुरु अपने पुरुषार्थ बिना उद्धार करते तो अज्ञानी अविचारी ऊँट, बैल आदिक पशुओं को क्यों नहीं कर जाते । इससे विष्णु, गुरु इत्यादि और किसी के पाने की इच्छा बुद्धिमान् नहीं करते हैं । अपने मन के स्वस्थ किये बिना परम सिद्धता की प्राप्ति महात्मा पुरुष नहीं जानते । जिन्होंने वैराग्य और अभ्यास से इन्द्रियरूपी शत्रु वश किये हैं वे अपने आपसे उसको पाते हैं और किसी से नहीं पाते । हे रामजी ! आपसे अपनी आराधना और अर्चना करो, आपसे आपको देखो और आपसे आपमें स्थित रहो । शास्त्र विचार से रहित मूढ़ों की प्रकृति के स्थिति के निमित्त वैष्णव भक्ति कल्पी है प्रथम जो अभ्यास यत्न का सुख कहा है उसमें जो रहित पुरुष है उसको गौणपूजा का क्रम कहा है, क्योंकि उसने इन्द्रियों को वश नहीं किया और जिसने इन्द्रियों को वश किया उसको भेदपूजा से क्या प्रयोजन है । विचार और उपशम बिना भी विष्णुभक्ति सिद्ध नहीं होती और जब विचार और उपशम संयुक्त हुआ तब कमल और पाषाण में क्या प्रयोजन है । इससे विचार संयुक्त होकर आत्मा का आराधना करो, उसकी सिद्धता से तुम सिद्ध होगे जिसने उसको सिद्ध नहीं किया वह बन गर्दभ है जो प्राणी विष्णु के आगे प्रार्थना करते हैं वे अपने चित्त के आगे क्यों नहीं करते ? सब जीवों के भीतर विष्णुजी स्थित हैं उनको त्यागकर जो बाहर के विष्णुपरायण हो जाते हैं वे बुद्धिमान् नहीं । हृदयगुफा में जो चेतनतत्त्व स्थित है वह ईश्वर का मुख्य मना-तन वपु है और शंख, चक्र, गदा, पद्म जिसके हाथ में है वह आत्मा का गौणवपु है । जो मुख्य को त्यागकर गौण की ओर धावते हैं वे विद्यमान अमृत को त्यागकर जो साधन से सिद्ध हो उसकी प्राप्ति निमित्त यत्न करते हैं । हे रामजी ! मनरूपी हाथी को जिस पुरुष ने आत्मविवेक

६६६ योगवाशिष्ठ ।

से वश नहीं किया उस अविवेकी चित्त को राग द्वेष ठहरने नहीं देते । जिसके हाथों में शंख, चक्र, गदा, पद्म है उस ईश्वर की जो अर्चना करते हैं व कष्ट तपस्या से पूजन करते हैं, उनका चित्त समय पाकर निर्मलभाव, अभ्यास और वैराग्य को प्राप्त होता है। नित्य अभ्यास से भी चित्त निर्मल होता है तो आत्मफल को प्राप्त होता है, चित्त निर्मल बिना आत्मफल को प्राप्त नहीं होता और जब चित्त निर्मल हुआ तब वैराग्य और अभ्यासवान् होकर आत्मफल का भोगी होता है—जैसे बोया बीज समय पाकर फल देता है तैसे ही क्रम करके फल होता है । हे रामजी ! विष्णुपूजा का क्रम भी निमित्तमात्र है । आत्मतत्त्व के अभ्यासरूपी शाखा से फल प्राप्त होता है और जो सबमे उत्तम परम संपदा का अर्थ है वह अपने मन के निग्रह से सिद्ध होता है । अपने मन का निग्रह करना ही बीज है जो चेतनरूपी क्षेत्र में प्रफुल्लित होकर फलदायक होता है । संपूर्ण पृथ्वी की निधि और शिलामात्र बड़ी-बड़ी मणि की होवें तो भी मन के निग्रह के समान नहीं । जैसा दुःख का नाशकर्ता और बड़ा पदार्थ मन का निग्रह है वैसा और कोई नहीं । तब तक जीव अनेक जन्म पाता है तब तक अनउपशम मनरूपी मत्स्य संसारसमुद्र में भ्रमाता है । हे रामजी ! ब्रह्मा, विष्णु और महेश को चिरकालपर्यन्त पूजता रहे पर यदि मन उपशम और विचार संयुक्त न हुआ तो देवता कृपालु हों तो भी उसको संसारसमुद्र से नहीं तार सकते । यह जो भास्वर आकार जगत् के पदार्थ भासते हैं उनको इन्द्रियों से त्याग कीजिये तब जन्म के अभाव का कारण जानिये । विषयों की चिन्तना से रहित होकर, निरामय और सब दुःखों से रहित आत्मसुख में स्थित हो और जो सन्मात्र तत्त्व और सबका साररूप है उसका स्वाद लेकर मनरूपी के पार हो ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे प्रह्लादविश्रान्तिवर्णन- नाम त्रिचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४३ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह संसारनाम्नी माया अनन्त है और किसी प्रकार इसका अन्त नहीं आता । जब चित्त वश हो तब यह निवृत्त हो जाती है, अन्यथा नहीं निवृत्त होती । जितना जगत् देखने और

उपशम प्रकरण । ६६७

सुनने में आता है वह सब मायामात्र है और मायारूप जगत् भ्रम से भासता है । इस पर एक पूर्व इतिहास हुआ है सो तुम सुनो । हे रामजी ! इस पृथ्वी पर कोशल नाम एक देश है जो सुमेरु पर्वतवत् रत्नों से पूर्ण है और जो जो उत्तम पदार्थ हैं वे सब उस देश में हैं । वहाँ गाधि नाम एक ब्राह्मण जो वेदों में प्रवीण-मानो वेद की मूर्ति था-रहता था । बाल्या-वस्था से वह वैराग्यादिक गुणों से प्रकाशित भुवनवत् शोभता था । एक समय से वह कुछ कार्य मन में धरके तप करने के निमित्त वन में गया और उस वन में एक कमलों से पूर्णताल देख कण्ठपर्यन्त जल में खड़ा होकर तप करने लगा । आठ मास पर्यन्त दिन रात्रि जब जल में खड़ा रहा तो उसके दृढ़ तप को देखकर विष्णु प्रसन्न हुए और जहाँ वह ब्राह्मण तप करता था वहाँ, ज्येष्ठ आषाढ़ की तपी पृथ्वी पर मेघवत् आकर कहा, हे ब्राह्मण ! जल से बाहर निकल और जो कुछ वाञ्छित फल है वह माँग । तब गाधि ने कहा कि हे भगवन् ! असंख्य जीवों के हृदयरूपी कमल के छिद्र में आप भँवरे हैं और त्रिलोकीरूपी कमलों के आप तड़ाग हैं आप ऐसे ईश्वर को मेरा नमस्कार है । हे भगवान् ! यही इच्छा मुझको है कि आपकी आश्चर्यरूप माया को, जिससे यह जगत् रचा है, किसी प्रकार देखूँ । तब विष्णुजी ने कहा, हे ब्राह्मण ! तुम माया देखोगे और देखकर फिर त्याग भी दोगे । ऐसे कहकर जब विष्णु अन्तर्धान हो गए तब ब्राह्मण वर पाकर आनन्दवान् हुआ और जल से निकला जैसे निर्धन पुरुष धन पाकर आनन्दवान् होता है तैसे ही वह ब्राह्मण वर पाकर आनन्दवान् हुआ । चलते बैठते उसकी सुरति विष्णु के वर की ओर लगी रहे और यही विचारे कि मैं माया कब देखूँगा । एक काल में उसी तालाब पर वह स्नान करने लगा और डुबकी मार मन में अघमर्षणमन्त्र कहने लगा (अघमर्षण पापों के नाश करनेवाले मंत्र को कहते हैं) उस मन्त्र को जपते जपते जब उसका चित्त विपर्यय होकर निकल गया तब वह गायत्री मन्त्र भूल गया और आपको फिर अपने गृह में स्थित देखा । फिर उसने आपको मृतक हुआ देखा और देखा कि सब कुटुम्ब के लोग रुदन करते हैं और शरीर की कान्ति ऐसी जाती रही जैसे टूटे कमलों की शोभा जाती

६६ = योगवाशिष्ट ।

रहती है। जैसे पवन के ठहरने मे वृक्ष अचल हो जाते हैं तैसे ही अङ्ग अचल हो गया और होठ फटकर विरस्म हो गये मानो अपने जीने को हँसते हैं। माता गाधि को पकड़े बैठी रही और सब परिवारवाले ऐसे इकट्ठे हुए जैसे वृक्ष पर पक्षी आन इकट्ठे होते हैं और जैसे पुल के टूटे जल चलता है तैसे ही रुदन करते हैं। फिर बान्धव लोग कहने लगे कि अब यह अमङ्गलरूप है, इसको जलाना चाहिये। ऐसे कहकर उसे सब जलाने ले चले और चिता में डालके जला दिया और फिर अपने गृह में आकर क्रियाकर्म किया। हे रामजी! उसके उपरान्त वह ब्राह्मण एक देश में चाण्डाल हुआ। उस देश में एक चाण्डालों का ग्राम था वहाँ उसने एक चाण्डाली के गर्भ में, श्वान की विष्ठा में कृमिवत् प्रवेश हुए देखा और समय पाकर भग से बाहर निकला—जैसे पक्का फल वृक्ष से गिरता है, तो वहाँ वह बहुत सुन्दर बालक जन्मा और चाण्डाली उसमें प्रीति करने लगी। इस प्रकार दिन दिन बढ़ने लगा जैसे छोटा वृक्ष बढ़ जाता है। निदान वह बारह वर्ष का होके फिर सोलह वर्ष का हुआ तब श्वानों को साथ लेकर वन में जावे और मृगों को मारे और इसी प्रकार बहुत स्थानों में विचरे। फिर उसका विवाह हुआ तब उसने यौवन अवस्था को यौवन में व्यतीत किया और बहुत बड़ा कुटुम्बी हुआ। फिर जब वृद्ध होकर शरीर जर्जरीभूत हो गया तो तृणों की कुटी बनाकर जा रहा—जैसे मुनीश्वर रहते हैं। दैवशात् वहाँ दुर्भिक्ष पड़ा और इसके बान्धव क्षुधा से मरने लगे तब वहाँ से अकेला निकला और बहुतेरे स्थान लाँघता हुआ कान्त देश में पहुँचा। उस सुन्दर देश का राजा मर गया था और उसके मन्त्रियों ने एक बड़े हाथी को इस निमित्त छोड़ा था कि जो कोई पुरुष इसके मुख से लगे उसको राजा कीजिये यह राज-मार्ग में चला जाता था उस हाथी को देखा कि बहुत सुन्दर चरणों से सुमेरु पर्वतवत् चला आता है। जब निकट आया तब उसने इसको शीश पर ऐसे चढ़ा लिया जैसे सूर्य को सुमेरु शीश पर बैठा ले। इसके हाथी पर आरूढ़ होते ही नगारे और तुरियाँ बजने लगे और बड़े शब्द होने लगे—मानो प्रलयकाल के मेघ गरजते हैं, भाट आदिक आनकर

उपशम प्रकरण । ६६६

स्तुति करने लगे और हाथी पर बैठे से इसके मुख की शोभा और ही हो गई । निदान सेना सहित राजा ऐसा शोभायमान हुआ जैसे तारों में चन्द्रमा शोभता है और अन्तःपुर में जाकर रानियों में बैठा और सब रानियाँ और सहेलियाँ इसके निकट आईं और इससे मिलने लगीं । सहेलियों ने स्नान कराके नाना प्रकार के हीरे, मोती, भूषण और सुन्दर वस्त्र पहिराये । निदान सब प्रकार सुशोभित होकर राज्य करने लगा और सब स्थान और सब देशों में इसकी आज्ञा चलने लगी । और सब लोग इससे भय पावें । वहाँ वह बड़े तेज और लक्ष्मी से सम्पन्न हुआ और तेजवान होकर विचरने लगा जैसे वन में सिंह विचरता है और हाथी पर चढ़कर शिकार खेलने जाता था । वहाँ उसका नाम गालव हुआ ।

इति श्रीयोगवासिष्ठे उपशमप्रकरणे गालवोपाख्यानेचाण्डालनाम चतुश्चत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४४ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार लक्ष्मी पाकर वह आनन्दवान् हुआ और जैसे पूर्णमासी का चन्द्रमा शोभता है तैसे ही शोभित हुआ । जब आठ वर्ष पर्यन्त इस प्रकार राज्य किया तब एक दिन उसके मन में सङ्कल्प फुरा कि मुझको वस्त्र और भूषणों के पहिरने में क्या है और इनकी सुन्दरता क्या है, मैं तो राजाधिराज हूँ और अपने तेज से तेजस्वी शोभायमान हूँ । हे रामजी ! ऐसे विचारकर उसने भूषण उतार डाले, शुद्ध श्याम मूर्ति होकर स्थित हुआ और जैसे प्रातःकाल में तारागणों से रहित श्याम आकाश होता है तैसे ही होकर फिर अपनी चाण्डाल अवस्था के वस्त्र पहिन अकेला निकल कर बाहर देहड़ी पर जा खड़ा हुआ । निदान उस देश के बड़े चाण्डाल जिसको यह दुर्भिक्ष से छोड़ आया था उस मार्ग में आ निकले, उनमें एक चाण्डाल तन्द्री हाथ में लिये आता था, उसने राजा को देखकर पहिचाना और श्याम पर्वतवत् राजा के सम्मुख आकर कहा, हे भाई ! इतने काल तू कहाँ था ? हमको छोड़कर यहाँ आकर सुख भोगने लगा है ? हे भाई ! यहाँ के राजा ने तुझको सुखी किया होगा, क्योंकि तू गाता भला है ? राजा को राग प्यारा होता है और तू कोकिला की नाईं गाता है । इस कारण प्रसन्न

६७० | योगवाशिष्ठ ।

होकर उसने तुमको बहुत धन दिया होगा । अथवा किसी और धनी ने तुमसे प्रसन्न होकर मन्दिर और धन दिया होगा । हे रामजी ! इस प्रकार वह चाण्डाल मुख से कहता और भुजा फैलाता इसके सम्मुख चला और यह नेत्रों और हाथों से उसको संकेत करे कि चुप रह, पर वह चाण्डाल कुछ न समझे सम्मुख होकर चला ही आवे । ज्यों-ज्यों वह पास आता था त्यों-त्यों राजा की कान्ति घटती जाती थी कि इतने में झरोखों में सहेलियों ने देखा और देखकर विचार किया कि यह राजा चाण्डाल है । ऐसे विचारकर वे महाशोक को प्राप्त हुई और कहने लगीं कि हमको बड़ा पाप हुआ कि इसके साथ हमने स्पर्श और भोजन किया । इस शोक से सबकी कान्ति नष्ट हो गई जैसे बरफ पड़ने से कमलपंक्ति की कान्ति जाती रहती है और जैसे वन में अग्नि लगने से वृक्षों की कान्ति जाती रहती है तैसे ही उनकी कान्ति जाती रही । सब नगरवासी भी यह सुनकर शोकवान् हुए और हाय-हाय शब्द करने लगे । जब वह चाण्डाल राजा अपने अन्तःपुर में आया तो उसको देख करके सब भागे और निकट कोई न आता था । जैसे पर्वत में अग्नि लगे तो वहाँ से पशु पक्षी भाग जाते हैं तैसे ही चाण्डाल राजा के निकट कोई न आवे । उस देश में जो बुद्धिमान पण्डित थे उन्होंने विचार किया कि बड़ा अनर्थ हुआ जो इतने काल तक चाण्डाल राजा से जिये । हमको बड़ा पाप लगा है इसलिए इस पाप का और पुरश्चरण कोई नहीं, हम सब ही चिता बनाके अग्नि में प्रवेश कर जल मरेंगे तब यह पाप निवृत्त होगा । हे रामजी ! ब्राह्मण और क्षत्रियों ने यह विचार करके चिता बना पुत्र, कलत्र और बान्धवों को छोड़कर चिता में प्रवेश करने लगे और जैसे दीपक में पतङ्ग प्रवेश करें तैसे ही जलने लगे । जैसे आकाश में तारे दृष्ट आवें तैसे चिता का अनेक चमत्कार दृष्ट आता था और धुवें से अन्धकार हो गया । कोई धर्मात्मा मनुष्य अपनी इच्छा से जलें और जो अपनी इच्छा से न जलें उनको और ले जलायें । चाण्डाल राजा ने विचारा कि मुझ एक के निमित्त इतने नगरवासी व्यर्थ जलते हैं, इस संसार में उसका जीना श्रेष्ठ है जिसमें

उपशम प्रकरण । ६७१

शोभा की उत्पत्ति हो और जिसके जीने से पाप की उत्पत्ति हो उसको मरना श्रेष्ठ है। हे रामजी ! ऐसे विचार कर उस राजा ने भी चिता बनाई और जैसे दीपक में पतङ्ग प्रवेश करता है तैसे ही प्रवेश कर गया। जब अग्नि का तेज शरीर में लगा तब गाधि का शरीर जो तालाब में डुबकी लगाये था काँपा और जल से बाहर शीश निकाला परन्तु सावधान न हुआ। इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले कि जब इस प्रकार वशिष्ठजी ने कहा तब सूर्य अस्त हुआ और सब सभा परस्पर नमस्कार करके स्थान को गई।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे राजप्रध्वंसवर्णनन्नाम पञ्चचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४५ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इतना भ्रम उसने दो मुहूर्त्त में देखा और अर्धघटी पर्यन्त उसे कुछ बोध न हुआ। पर उसके उपरान्त बोधवान् हुआ और वह संसारभ्रम से रहित हुआ। जैसे मद्यपी नशे के क्षीण हुए बोधवान् हो तैसे ही वह बोधवान् हुआ। बाहर निकलकर विचारने लगा कि मुझको कुछ भ्रमसा हुआ है। कहाँ वह मेरा गृह में मरना, फिर चाण्डाल के गृह में जन्म लेना, फिर कुटुम्ब में रहना और फिर राज्य करना। बड़ा भ्रम मुझको हुआ है। हे रामजी ! ऐसे विचारकर फिर उसने सन्ध्यादिक कर्म किये और इस भ्रम को फिर फिर स्मरण करके आश्चर्यवान् हो पर यह न जान सके कि भगवान् का वर पाकर मैंने यह माया देखी है। जब कुछ काल व्यतीत हुआ तब एक क्षुधार्थी दुर्बल ब्राह्मण थका हुआ इसके आश्रम पर आया—मानों ब्रह्मा के आश्रमपर दुर्वासा ऋषि आये—तब गाधि ने उस ब्राह्मण को आदर संयुक्त बैठाया और फल फूल इकट्ठे करके जैसे वसन्त ऋतु में फल फूल से वृक्ष पूर्ण होता है तैसे ही उसको पूर्ण किया। वह ब्राह्मण कई दिन वहाँ रहा। सन्ध्यादिक कर्म और मन्त्रजाप दोनों इकट्ठे करें और रात्रि को पत्तों की शय्या बनाकर शयन करें। एक रात्रि के समय शय्या पर बैठे दोनों चर्चा वार्त्ता करते थे कि प्रसंग पाकर गाधि ने पूछा, हे ब्राह्मण ! तेरा शरीर जो ऐसा कृश और थका हुआ है इसका क्या कारण है ? उसने कहा, हे साधो ! जो कुछ तूने पूछा है सो मैं कहता हूँ, हम सत्यवादी हैं—जैसे वृत्तान्त हुआ है सो तू सुन। एक काल में मैं

६७२योगवाशिष्ट ।

देशान्तर फिरता फिरता उत्तर दिशा की ओर गया और कान्तदेश में जो पहुँचा और वहाँ रहने लगा । वहाँ के गृहस्थ भली प्रकार मेरी टहल करें और उनके भले भोजन और वस्त्रों से में प्रसन्न हो रमास्वाद में मेरा चित्त मोह गया । एक दिन मेरे मुख से यह शब्द निकला कि यहाँ के लोग बहुत श्रद्धावान् और दयावान् हैं तब जो लोग पास बैठे थे कहने लगे, हे साधो ! आगे यहाँ दया धर्म बहुत था अब कुछ कम हो गया है । तब मैंने पूछा कि क्यों ? तब उन्होंने कहा कि इस देश का राजा मृतक हुआ तब एक चाण्डाल राजा हुआ था । प्रथम किसी ने न जाना और वह आठ वर्ष पर्यन्त राज्य करता रहा । जब उसकी वार्ता प्रकट हुई कि यह चाण्डाल है तब देश के रहनेवाले ब्राह्मण क्षत्रिय चिता बना करके जल मरे और फिर राजा भी जल मरा । ऐसा पाप इस देश में हुआ है इस कारण दया धर्म कुछ कम हो गया है । हे ब्राह्मण ! जब मैंने इस प्रकार नगरवासियों से सुना तब में बहुत शोकवान् हुआ और वहाँ से यह विचारता चला कि हाय हाय में बड़े पापी देश में रहा हूँ । ऐसे विचारकर मैं प्रयागादि तीर्थों पर चला और तीर्थ करके कृच्छ्र और चान्द्रायण व्रत करे अर्थात् कृष्णपक्ष में एक एक ग्रास घटाना जाऊँ और जब अमावस्या आवे तब निराहार रहूँ और जब शुक्लपक्ष आवे तब एक-एक ग्रास बढ़ाता जाऊँ और पूर्णमासी के चन्द्रमा के कला से बढ़ाना और कला के घटने से घटाना इस प्रकार मैंने तीन कृच्छ्र चान्द्रायण किये हैं। वहाँ से चलते चलते आश्रम पर आकर व्रत खोला है । हे साधो ! इस निमित्त मेरा शरीर कृश और निर्बल हुआ । हे रामजी ! जब इस प्रकार ब्राह्मण ने कहा तब गाधि विस्मय को प्राप्त हुआ कि में जानता था कि मुझको भ्रम ऐसा हो गया है सो इसने प्रत्यक्ष वार्ता कह सुनाई । ऐसे विचारकर फिर गाधि ने पूछा और फिर उसने ऐसे ही कहा तब सुनकर आश्चर्यवान् हुआ । जब रात्रि व्यतीत हुई और सूर्य उदय हुआ तब सन्ध्या आदिक कर्म किये और फिर एकान्त में विचारने लगा कि मैंने कैसा भ्रम देखा है और ब्राह्मण ने सत्य कैसे देखा, इससे अब उस देश को चलकर देखूँ जहाँ मुझको चाण्डाल का शरीर हुआ था । हे रामजी ! इस प्रकार विचारकर

उपशम प्रकरण ।

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मनोराज के भ्रम को देखने को गाधि ब्राह्मण चला और चलता चलता उस देश में जा पहुँचा जैसे ऊँट काँटों को ढूँढ़ता कण्टकों के वन में जाता है तैसे ही यह जब चाण्डालों के स्थानों को प्राप्त हुआ तब चाण्डालों के स्थान देखे और जहाँ अपना स्थान था उसको देखा और अपनी खेती लगाने का स्थान देखा कि कुछ बेल खड़ी है और कुछ गिर गई है और पशु के हाड़ चर्म जो अपने हाथ से डाले थे प्रत्यक्ष देखे और आश्चर्यवान हुआ कि हे देव ! क्या आश्चर्य है कि चित्त का भ्रम मैंने प्रत्यक्ष देखा। जो बालक अवस्था में क्रीड़ा करने के और भोजन और मद्य पीने के और पात्र इत्यादिक जो खान पान भाग के स्थान थे वह प्रत्यक्ष देखे और महावैराग्य को प्राप्त हुआ। ग्रामवासी मनुष्यों से भी पूछा कि हे माधो ! यहाँ एक चाण्डाल बड़े श्याम शरीरवाला हुआ था तुमको भी कुछ स्मरण है ? हे रामजी ! जब इस प्रकार ब्राह्मण ने पूछा तब ग्रामवासियों ने कहा, हे ब्राह्मण ! यहाँ एक कटजल नाम चाण्डाल कम करके बड़ा हुआ, फिर उसका विवाह हुआ और बेटे बेटी परिवार सहित बड़ा कुटुम्बी हुआ। फिर जब वृद्ध हुआ तो दैव संयोग से अकेला कहीं चला गया और जाता जाता कान्नदेश में वहाँ के राजा के मरने के कारण वहाँ का गज इसको मिला और आठ वर्ष पर्यन्त राज करता रहा। जब नगरवासियों ने सुना कि यह चाण्डाल है तब वह बहुत शोकवान हुए और चिता बनाकर जल मरे। इस प्रकार सुनकर गाधि बहुत आश्चर्यवान हुआ और एकसे सुनकर और से पूछा उसने भी इसी प्रकार कहा। ऐसे बारम्बार लोगों से पूछता रहा और एक मास वहाँ रह फिर आगे चला और नदियाँ, पहाड़, देश, हिमालय पर्वतों की उत्तर दिशा कान्त देश में पहुँचा। जिन स्थानों का वृत्तान्त सुना था सो सबही देखे। जहाँ सुन्दर स्त्रियाँ थीं और जहाँ चमर झूलते थे उनको प्रत्यक्ष देखा। फिर नगरवासियों से पूछा कि यहाँ कोई चाण्डाल राजा भी हुआ है, तुमको कुछ स्मरण है तो मुझसे कहो। नगरवासियों ने कहा, हे माधो ! यहाँ का राजा मर गया था और मन्त्रियों ने एक हाथी छोड़ा था कि जो कोई मनुष्य इस हाथी के सम्मुख आवे उसको राजा करें। जब वह हाथी चला तब उसके सम्मुख

६७४ योगवाशिष्ठ।

एक चाण्डाल आया और हाथी ने तब उस चाण्डाल को शीश पर चढ़ा लिया तब और विचार किसी ने न किया और उसको राजतिलक दिया। आठ वर्ष पर्यन्त वह राज करता रहा पीछे जब उसके बान्धव आये और उससे चर्चा करने लगे तब सहेलियों ने ऊपर से देखा कि यह चाण्डाल है। ऐसे देख उन्होंने उसका त्याग किया और विचारवान् लोग जो उसके साथ चेष्टा करते थे वे उसे चाण्डाल जानकर जल मरे और वह राजा भी आपको धिक्कार कर जल मरा। अब उसको बारह वर्ष मृत्यु पाये व्यतीत हुए हैं। हे रामजी! इस प्रकार सुनके गाधि ब्राह्मण आश्चर्य को प्राप्त हुआ कि कहाँ में जल में स्थित था और कहाँ इतनी अवस्था देखी। ऐसे विचार करता था कि इतने में पूर्व का वृत्तान्त स्मरण आया कि यह आश्चर्य भगवान् की माया है। मैंने वर माँगा था इस माया से इतना भ्रम देखा है। यह आश्चर्य है कि यहाँ दो मुहूर्त बीते हैं और वहाँ स्वप्नभ्रम की नाईं इतना काल मुझको भासित हुआ और सत्यसा स्थित हुआ है सो बड़ा आश्चर्य है। इसमें संशय निवृत्त करने के निमित्त विष्णु भगवान् का ध्यान करूँ जिनकी माया से मैंने इतना भ्रम देखा है, और कोई इस संशय को दूर नहीं कर सकता। हे रामजी! इस प्रकार विचारकर गाधि ब्राह्मण फिर पहाड़ की कन्दरा में जाकर तप करने लगा और केवल एक अञ्जली जल पान करे और कुछ भोजन न करे। इस प्रकार डेढ़ वर्ष पर्यन्त उसने तप किया तब त्रिलोकी के नाथ विष्णु भगवान् प्रसन्न होकर उसके निकट आये और कहा, हे ब्राह्मण! मेरी माया को देख जो जगत्जाल की रचनेवाली है। अब और क्या इच्छा करता है? हे रामजी! जब विष्णु भगवान् ने ऐसे कहा तब ब्राह्मण इस प्रकार बोला जैसे मेघ को देखकर पपीहा बोलता है। हे भगवन्! तेरी माया तो मैंने देखी परन्तु एक संशय मुझको है कि यह जो स्वप्नभ्रम की नाईं मैंने देखा इसमें काल की विषमता कैसे हुई कि यहाँ दो मुहूर्त व्यतीत हुए हैं और वहाँ चिरकालपर्यन्त भ्रमता रहा और उन झूठे पदार्थों को जाग्रत में प्रत्यक्ष कैसे देखा? श्रीभगवान् बोले, हे ब्राह्मण! और कुछ नहीं तेरे चित्त ही का भ्रम है। जिसके चित्त में तत्त्व की

उपशम प्रकरण । ६७५

अद्दृष्टता है उसको यह चित्तभ्रम होता है । और वह क्या भ्रम था, जितना कुछ जगत् प्रत्यक्ष देखता है वह तेरे मन में स्थित है । पृथ्वी आदिक तत्त्व कोई नहीं, जैसे बीज के भीतर फूल, फल, पत्र होते हैं तैसे ही पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश जो पाँच भौतिक हैं वह सब विस्तार चित्त में स्थित है । जैसे वृक्ष का विस्तार बीज में दृष्टि नहीं आता पर जब बोया हुआ उगता है तब विस्तार से दृष्टि आता है, तैसे ही जब चित्त ज्ञान में लीन होता है तब जगत् नहीं भासता और जब स्पन्दरूप होता है तब बड़े विस्तारसंयुक्त भासता है । हे ब्राह्मण ! जो कुछ जगत् देखता है वह सब चित्त का भ्रम है । जैसे एक कुलाल घटादिक वासना उत्पन्न करता है तैसे ही एक चित्त ही अनेक भ्रमरूप पदार्थों को उत्पन्न करता है और जो चित्त वासना से रहित है उससे भ्रमरूप पदार्थ कोई नहीं उपजता । इससे चित्त को स्थित कर । हे ब्राह्मण ! इस चित्त में कोटि ब्रह्माण्ड स्थित हैं । जो तुझको चाण्डाल अवस्था का अनुभव हुआ तो इसमें क्या आश्चर्य हुआ और तू कहता है कि मैंने बड़ी आश्चर्यरूप माया देखा है सो उसको ही माया कहता है । अब जो तुझको विद्यमान भासता है वह सब ही माया है । जो तुझको अपने गृह में अनुभव हुआ था और चाण्डाल के गृह में जन्म लिया, कुटुम्बी हुआ और राज किया, फिर चिता में जला, फिर अतिथि ब्राह्मण से मिला, फिर जाकर सब स्थान देखे सो भी माया थी । जैसे इतना भ्रम तूने माया से देखा तैसे ही यह फैलाव भी सब माया है । हे साधो ! जैसे स्वप्न में नाना प्रकार के पदार्थ भासते हैं और जैसे मदिरापान करनेवाले को सब पदार्थ भ्रमते दिखते हैं तैसे ही जगत् भी भ्रम से भासता है । जैसे नौका पर बैठे को तटवृक्ष भ्रमते भासते हैं तैसे ही यह जगत् भी भ्रममात्र भासता है और चित्त के स्थित करने से जगद्भ्रम नष्ट हो जावेगा-अन्यथा निवृत्त न होवेगा । जैसे पत्र, फूल, फल, टाल, काटने से वृक्ष नष्ट नहीं होता जब मूल से काटिये तब नष्ट हो जाता है तैसे ही जब जगद्भ्रम का मूल चित्त ही नष्ट हो जावेगा तब सम्पूर्ण भ्रम निवृत्त हो जावेगा । यह चित्त का नाश होना क्या है ? चित्त की चैतन्यता जो दृश्य की ओर धावती है

६७६ | योगवाशिष्ठ ।

वही जगत् का बीज है, जब यही चैतनता दृश्य की ओर फुरने से रहित हो तब जगद्भ्रम भी मिट जावेगा और जगत् की ओर फुरना तब मिटे जब जगत् को मायामात्र जानोगे। हे साधो! यह सब जगत् मायामात्र है, कोई पदार्थ सत्य नहीं। जैसे वह भ्रम मायामात्र भासित है तैसे ही यह भी सब मायामात्र जानो। इससे इस भ्रम को त्यागकर अपने ब्राह्मण के कर्म करो। हे रामजी! इस प्रकार कहकर जब विष्णु देव उठ खड़े हुए तब गाधि और और ऋषीश्वर जो वहाँ थे उन्होंने विष्णु की पूजा की और विष्णु क्षीरसमुद्र को गये। तब वह ब्राह्मण फिर उसी भ्रम को देखने चला। निदान वह फिर कान्तदेश में गया और उसको देख-कर आश्चर्यवान् हुआ। विष्णु मायामय कहते थे जो कुछ मैंने भ्रम में देखा था सोई प्रत्यक्ष देखता हूँ। ऐसे विचारकर फिर कहा कि जो इस संशय को और कोई दूर नहीं कर सकता इससे फिर मैं विष्णु की आराधना करूँगा। हे रामजी! इस प्रकार विचारकर गाधि फिर पहाड़ की कन्दरा में जाकर तप करने लगा। तब थोड़े काल में विष्णु भगवान् प्रसन्न होकर आये और जैसे मेघ मोर से कहे तैसे ही ब्राह्मण से बोले, हे ब्राह्मण! अब क्या चाहता है? तब गाधि ने कहा, हे भगवन्! तुम कहते हो सब भ्रम मात्र है और यह तो प्रत्यक्ष भासता है। जो भ्रम होता है सो प्रत्यक्ष अनुभव नहीं होता और मैंने फिर वह स्थान देखा और थोड़े काल में बहुत काल देखने का मुझको संशय है सो दूर करो। हे रामजी! जब इस प्रकार गाधि ने कहा तब भगवान् ने कहा, हे ब्राह्मण! जो कुछ तुझको यह भासता है वह सब मायामात्र है। और जिस प्रकार तुझको यह भासता है वह सब मायामात्र है। जिस प्रकार तुझको यह अनुभव हुआ है वह सुन। हे ब्राह्मण! कण्टकजल नाम चाण्डाल एक चाण्डाल के गृह में उत्पन्न हुआ था क्रम से बड़ा होकर बड़ा कुटुम्बी हुआ। फिर वहाँ दुर्भिक्ष पड़ा तब उस देश को त्यागकर कान्त देश का राजा हुआ। फिर लोगों ने सुना तब सबही अग्नि में जले और वह चाण्डाल आप भी अग्नि में जला। वह कण्टकजल चाण्डाल और था, वह अवस्था उसकी हुई थी और वही प्रतिभा तुमको आन फुरी है। जैसी अवस्था उसकी हुई थी

उपशम प्रकरण । ६७७


सो तेरे चित्त में आन फुरी, इस कारण तूने जाना कि यह अवस्था मैंने देखी है। हे साधो ! अकस्मात् ऐसे भी होता है कि और की प्रतिभा और को फुर आती है। कहीं अन्यथा भी होती है, कहीं एक जैसी भी होती है, इस भ्रम का अन्त लेना नहीं बनता, क्योंकि यह चित्त के फुरने से होती है। जब चित्त आत्मपद में स्थित होता है तब जगत्भ्रम निवृत्त हो जाता है। काल की विषमता भी होती है—जैसे जाग्रत की दो घड़ी में अनेक वर्षों का स्वप्न देखता है तैसे ही यह सब चित्त का भ्रम जाना। तू इस भ्रम को न देख, चित्त को स्थित करके अपने ब्राह्मण का आचार कर। हे रामजी ! ऐसे कहकर विष्णु गुप्त हो गये परन्तु ब्राह्मण का संशय दूर न हुआ। वह मन में विचारे कि और की प्रतिभा मुझको कैसे हुई यह तो मैंने प्रत्यक्ष भोगी है और जाकर देखी है यह और की वार्ता कैसे हो आँखों से नहीं देखी होती उसका अनुभव भी नहीं होता और मैंने तो प्रत्यक्ष अनुभव किया है। हंस ऐसे विचारकर फिर वही स्थान देखे और आश्चर्यवान हुआ फिर विचार किया कि यह मुझको बड़ा संशय है इसके दूर करने का उपाय भगवान् से पूछूँ। हे रामजी ! ऐसे चिन्तन कर फिर तप करने लगा और जब कुछ काल पहाड़ की कन्दरा में तप करते बीता तब फिर विष्णु ने आकर कहा, हे ब्राह्मण अब तेरी क्या इच्छा है? ऐसे जब विष्णु ने कहा तब गाधि ब्राह्मण बोला, हे भगवन् ! तुम कहते हो कि यह और की प्रतिभा तुझको फुर आई है और अपनी होकर भासती है और काल की विषमता भी भासती है। यह संशय जिस प्रकार मेरे चित्त से दूर हो सो उपाय कहो। और मेरा प्रयोजन कुछ नहीं है केवल यह भ्रम निवृत्त करो। श्रीभगवान बोले, हे ब्राह्मण ! यह जगत सब मेरी माया से रचा है इसमें में तुझमें सत्य क्या कहूँ और असत्य क्या कहूँ। जो कुछ तुझको भासता है वह सब माया मात्र है और चित्त के भ्रम से भासता है। उस चाण्डाल की अवस्था तेरे चित्त में भासि आई थी। जैसे किसी को भ्रम से रज्जू में सर्प भासे इसी प्रकार औरों को भी रज्जू में सर्प भासता है तैसे ही प्रतिभा तुझको भासि आई है। काल का रूप आकर कुछ नहीं था काल भी तुझको