भारतकोश
योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary

आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य) द्वारा

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( ३ ) लययोग योग का अवान्तर भेद है। प्राचीन परम्परा में योग के चार भेद माने गये हैं—मन्त्र, लय, हठ तथा राजा ( द्र० शिवपु० ७।२।३७।९, लिङ्गपु० २।५५।७ आदि ) । योगतत्त्वोपनिषद् २२-२३, दत्तात्रेय-संहिता ( प्राणतोषिणी तन्त्र, पृ० ४३९-४४० में उद्धृत ) आदि में इस योग का विशिष्ट विवरण द्रष्टव्य है¹। योगकर्णिका, पृ० १४३-१४४ भी द्रष्टव्य है । नादानुसन्धान का अर्थ है—अनाहतध्वनि का अनुचिन्तन । इस 'अनुसन्धान' शब्द का प्रयोग अमनस्कयोग २।१४ में भी मिलता है। नादानुसन्धान को श्रेष्ठ लय मानना हठयोग का एक प्रतिष्ठित मत है—न नादसदृशो लयः ( ह० यो० प्र० ४।४३ ) । 'लय' का तात्पर्य 'लयहेतु' से है—नाद चित्तलय का सर्वश्रेष्ठ हेतु है। ह० यो० प्र० ४।६६-१०२ में नादानुसंधान का सविशेष विवरण द्रष्टव्य है । लयावधान = लय के प्रति अवधान। इस लय के विषय में ह० यो० प्र० ४।३१- ३४ द्रष्टव्य है। लय का सर्वोच्च रूप मनोलय है, पर पहले प्राणलय करणीय है। मनोलय के कारण विषय-विस्मृति ( विषय ज्ञान का संस्कार न रहने के कारण ) होती है (४।३४)। यह लय उसको होता है, जिसके श्वास-प्रश्वास रुद्ध हो गये हैं ( योग-शास्त्रोक्त उपायविशेष के द्वारा—अन्य किसी अशास्त्रीय उपाय से नहीं ), शब्दादि का ग्रहण रुद्ध हो गया है और शारीरिक क्रियाये स्तम्भित हो गई हैं—'निर्जीवः काष्ठवत् तिष्ठेत्, लयस्थश्चाभिधीयते' । योगचिन्तामणि पृ० २५५-२५६ में लयस्थ योगी के लक्षण द्रष्टव्य हैं। लयस्थ योगी के विशद वर्णन के लिए तथा लयाभ्यास के फल आदि के लिए गोरक्षकृत अमनस्क-योग ( १।३७ से अध्यायान्त पर्यन्त ) द्रष्टव्य है । १. द्र० क्षेत्रज्ञः परमात्मा च तयोरैक्यं यदा भवेत् । तदैक्ये साधिते देवि चित्तं याति विलीनताम् ॥ पवनः स्थैर्यमायाति लययोगोदये सति । ( योगबीज ) । लययोगेऽपि, नवस्वेव चक्रेषु मरुन्मनसोर्लयो लययोग इत्युच्यते ( योग- चिन्तामणि, पृ० १३ ) ।