योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)
Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary
आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २ ) हो सकता है । ये दो पद 'चरणारविन्दे' के विशेषण हैं । निःश्रेयस = निश्चित श्रेयोरूप । माङ्गलिकायमान = माङ्गलिक की तरह आचरण करने वाले । हालाहल = विष । पुराणों में कहा गया है कि हिमालय पर्वतस्य हलाहला- नदी के तीर में यह विष उत्पन्न होता है । सदाशिवोक्तानि सपादलक्ष- लयावधानानि च सन्ति¹लोके । नादानुसन्धानसमाधिमेकं मन्यामहे मान्यतमं² लयानाम्³ ॥२॥ [ १. वसन्ति लोके (पाठा० ) २. अन्यतमम् (पाठा० ); यह भ्रष्ट पाठ है । ३ इस श्लोक का अनुरूप श्लोक ह० यो० प्र० में है—श्री आदिनाथेन सपादकोटि-लयप्रकाराः कथिता जयन्ति । नादानुसन्धानकमेकमेव मन्यामहे मुख्यतमं लयानाम् ( ४।६६ ); 'नादानुसन्धानसमाधि' शब्द ४।१८ में प्रयुक्त हुआ है । ] अनुवाद - सदाशिव के द्वारा प्रोक्त एक लाख पच्चीस हजार लययोग इस लोक में हैं। इन सब लयों में एकमात्र नादानुसन्धान-समाधि (नादानु- सन्धान-पूर्वक या नादानुसन्धान से युक्त समाधि) को (हम) सर्वोच्च लय के रूप में समझते हैं (नादानुसन्धान के विषय में श्लोक ४ द्र०) । व्याख्या—शिव को सभी योगों के मूल वक्ता के रूप में मानने की भी एक प्रसिद्ध परम्परा है । लययोग के श्लोकोक्त भेदों की उपपत्ति गुरु-परम्परा से जाननी चाहिये—बहिरङ्ग आलोचना से यह ज्ञातव्य नहीं है । ज्योत्स्नाटीका में कहा गया है—श्री आदिनाथोक्तसपादकोटिसमाधिप्रकारेपु ( ४।२ ) । इस योग के अनन्तकोटि भेद हैं—यह भी कहीं कही कहा गया है । साधन-क्रिया के कौशल-भेद से ये भेद होते हैं—यह ज्ञातव्य है ।