भारतकोश
योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary

आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य) द्वारा

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योगतारावली वन्दे गुरूणां चरणारविन्दे सन्दशितस्वात्मसुखावबोधे । जनस्य ये जाङ्गलिकायमाने' संसारहालाहलमोहशान्त्यै ॥१॥ [ १. निःश्रेयसे माङ्गलिकायमाने ( पाठा० ) ] अनुवाद—संसाररूपी विष ( के पान ) से उत्पन्न मोह की शान्ति के लिए गुरुदेव के जो दो चरणकमल ( लोगों में ) विषवैद्य की तरह आचरण करते हैं अर्थात् गुरु के चरण संसारमोह का नाश करते हैं), आत्मसुखबोध के दर्शक उन दो चरणों की वन्दना करता हूँ । व्याख्या—गुरु शब्द में जो बहुवचन है वह या तो स्वीय गुरु के प्रति गौरव-प्रदर्शन के लिए है अथवा वह परम्परागत सभी गुरुओं के लिए है । योगाभ्यास के लिए गुरु-उपदेश की अत्यन्त आवश्यकता होती है । यही कारण है कि योग के ग्रन्थों में 'गुरु-उपदिष्ट मार्ग' आदि शब्द प्रायः प्रयुक्त होते हैं । गुरु-महिमा के लिए ह० यो० प्र० १।१४ की ज्योत्स्ना टीका द्रष्टव्य है । सन्द...बोधे—'चरणारविन्दे' का विशेषण । सन्दर्शित हुआ है स्वात्म- सुख-अवबोध जिनके द्वारा वे ( दो चरण ) । जाङ्गलिक = विषवैद्य; अमरकोश १।८।१४ में जाङ्गुलिक शब्द है, पर जाङ्गलिक शब्द का भी अन्य कोशों में उल्लेख मिलता है । काशीखण्ड आदि में जाङ्गुलिक शब्द प्रयुक्त हुआ है । तृतीय चरण का पाठान्तर है—'निःश्रेयसे माङ्गलिकायमाने' । यह पाठ संगत