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योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary

आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

योगतारावली वन्दे गुरूणां चरणारविन्दे सन्दशितस्वात्मसुखावबोधे । जनस्य ये जाङ्गलिकायमाने' संसारहालाहलमोहशान्त्यै ॥१॥ [ १. निःश्रेयसे माङ्गलिकायमाने ( पाठा० ) ] अनुवाद—संसाररूपी विष ( के पान ) से उत्पन्न मोह की शान्ति के लिए गुरुदेव के जो दो चरणकमल ( लोगों में ) विषवैद्य की तरह आचरण करते हैं अर्थात् गुरु के चरण संसारमोह का नाश करते हैं), आत्मसुखबोध के दर्शक उन दो चरणों की वन्दना करता हूँ । व्याख्या—गुरु शब्द में जो बहुवचन है वह या तो स्वीय गुरु के प्रति गौरव-प्रदर्शन के लिए है अथवा वह परम्परागत सभी गुरुओं के लिए है । योगाभ्यास के लिए गुरु-उपदेश की अत्यन्त आवश्यकता होती है । यही कारण है कि योग के ग्रन्थों में 'गुरु-उपदिष्ट मार्ग' आदि शब्द प्रायः प्रयुक्त होते हैं । गुरु-महिमा के लिए ह० यो० प्र० १।१४ की ज्योत्स्ना टीका द्रष्टव्य है । सन्द...बोधे—'चरणारविन्दे' का विशेषण । सन्दर्शित हुआ है स्वात्म- सुख-अवबोध जिनके द्वारा वे ( दो चरण ) । जाङ्गलिक = विषवैद्य; अमरकोश १।८।१४ में जाङ्गुलिक शब्द है, पर जाङ्गलिक शब्द का भी अन्य कोशों में उल्लेख मिलता है । काशीखण्ड आदि में जाङ्गुलिक शब्द प्रयुक्त हुआ है । तृतीय चरण का पाठान्तर है—'निःश्रेयसे माङ्गलिकायमाने' । यह पाठ संगत

( २ ) हो सकता है । ये दो पद 'चरणारविन्दे' के विशेषण हैं । निःश्रेयस = निश्चित श्रेयोरूप । माङ्गलिकायमान = माङ्गलिक की तरह आचरण करने वाले । हालाहल = विष । पुराणों में कहा गया है कि हिमालय पर्वतस्य हलाहला- नदी के तीर में यह विष उत्पन्न होता है । सदाशिवोक्तानि सपादलक्ष- लयावधानानि च सन्ति¹लोके । नादानुसन्धानसमाधिमेकं मन्यामहे मान्यतमं² लयानाम्³ ॥२॥ [ १. वसन्ति लोके (पाठा० ) २. अन्यतमम् (पाठा० ); यह भ्रष्ट पाठ है । ३ इस श्लोक का अनुरूप श्लोक ह० यो० प्र० में है—श्री आदिनाथेन सपादकोटि-लयप्रकाराः कथिता जयन्ति । नादानुसन्धानकमेकमेव मन्यामहे मुख्यतमं लयानाम् ( ४।६६ ); 'नादानुसन्धानसमाधि' शब्द ४।१८ में प्रयुक्त हुआ है । ] अनुवाद - सदाशिव के द्वारा प्रोक्त एक लाख पच्चीस हजार लययोग इस लोक में हैं। इन सब लयों में एकमात्र नादानुसन्धान-समाधि (नादानु- सन्धान-पूर्वक या नादानुसन्धान से युक्त समाधि) को (हम) सर्वोच्च लय के रूप में समझते हैं (नादानुसन्धान के विषय में श्लोक ४ द्र०) । व्याख्या—शिव को सभी योगों के मूल वक्ता के रूप में मानने की भी एक प्रसिद्ध परम्परा है । लययोग के श्लोकोक्त भेदों की उपपत्ति गुरु-परम्परा से जाननी चाहिये—बहिरङ्ग आलोचना से यह ज्ञातव्य नहीं है । ज्योत्स्नाटीका में कहा गया है—श्री आदिनाथोक्तसपादकोटिसमाधिप्रकारेपु ( ४।२ ) । इस योग के अनन्तकोटि भेद हैं—यह भी कहीं कही कहा गया है । साधन-क्रिया के कौशल-भेद से ये भेद होते हैं—यह ज्ञातव्य है ।

( ३ ) लययोग योग का अवान्तर भेद है। प्राचीन परम्परा में योग के चार भेद माने गये हैं—मन्त्र, लय, हठ तथा राजा ( द्र० शिवपु० ७।२।३७।९, लिङ्गपु० २।५५।७ आदि ) । योगतत्त्वोपनिषद् २२-२३, दत्तात्रेय-संहिता ( प्राणतोषिणी तन्त्र, पृ० ४३९-४४० में उद्धृत ) आदि में इस योग का विशिष्ट विवरण द्रष्टव्य है¹। योगकर्णिका, पृ० १४३-१४४ भी द्रष्टव्य है । नादानुसन्धान का अर्थ है—अनाहतध्वनि का अनुचिन्तन । इस 'अनुसन्धान' शब्द का प्रयोग अमनस्कयोग २।१४ में भी मिलता है। नादानुसन्धान को श्रेष्ठ लय मानना हठयोग का एक प्रतिष्ठित मत है—न नादसदृशो लयः ( ह० यो० प्र० ४।४३ ) । 'लय' का तात्पर्य 'लयहेतु' से है—नाद चित्तलय का सर्वश्रेष्ठ हेतु है। ह० यो० प्र० ४।६६-१०२ में नादानुसंधान का सविशेष विवरण द्रष्टव्य है । लयावधान = लय के प्रति अवधान। इस लय के विषय में ह० यो० प्र० ४।३१- ३४ द्रष्टव्य है। लय का सर्वोच्च रूप मनोलय है, पर पहले प्राणलय करणीय है। मनोलय के कारण विषय-विस्मृति ( विषय ज्ञान का संस्कार न रहने के कारण ) होती है (४।३४)। यह लय उसको होता है, जिसके श्वास-प्रश्वास रुद्ध हो गये हैं ( योग-शास्त्रोक्त उपायविशेष के द्वारा—अन्य किसी अशास्त्रीय उपाय से नहीं ), शब्दादि का ग्रहण रुद्ध हो गया है और शारीरिक क्रियाये स्तम्भित हो गई हैं—'निर्जीवः काष्ठवत् तिष्ठेत्, लयस्थश्चाभिधीयते' । योगचिन्तामणि पृ० २५५-२५६ में लयस्थ योगी के लक्षण द्रष्टव्य हैं। लयस्थ योगी के विशद वर्णन के लिए तथा लयाभ्यास के फल आदि के लिए गोरक्षकृत अमनस्क-योग ( १।३७ से अध्यायान्त पर्यन्त ) द्रष्टव्य है । १. द्र० क्षेत्रज्ञः परमात्मा च तयोरैक्यं यदा भवेत् । तदैक्ये साधिते देवि चित्तं याति विलीनताम् ॥ पवनः स्थैर्यमायाति लययोगोदये सति । ( योगबीज ) । लययोगेऽपि, नवस्वेव चक्रेषु मरुन्मनसोर्लयो लययोग इत्युच्यते ( योग- चिन्तामणि, पृ० १३ ) ।

( ४ ) सरेच-पूरैरनिलस्य कुम्भैः¹ सर्वासु नाडीसु विशोधितासु । अनाहतादम्बुरुहादुदेति स्वात्मावगम्यः स्वयमेव बोधः² ॥३॥ [ १. कुम्भे ( पाठ० )--यह अपपाठ है। २. अनाहताख्यो बहुभिः प्रकारैरन्तः प्रवर्तेत सदा निनादः ( पाठ० )—अनाहत नामक नाद अनेक प्रकारों से अन्तःकरण में सदा उदित रहता है । ] अनुवाद —वायु के पूरक, रेचक और कुम्भक के द्वारा जब नाडियाँ विशोधित मलहीन हो जाती हैं, तब अनाहत नामक पद्म (चक्र) से वह बोध स्वयं ही उदित होता है जो अपने द्वारा ही ज्ञेय है (अर्थात् दूसरे किसी के द्वारा ज्ञात नही हो सकता) । व्याख्या --यहाँ रेचक, पूरक और कुम्भक के द्वारा जिस नाडीशुद्धि की बात कही गई है उसका स्वरूप है —योगविरोधी मल का दूरीकरण जिसके कुछ बाह्य फल शरीर में भी दृष्ट होते हैं। नाडीशुद्धि होने पर सप्राण शरीर आत्मज्ञान के अभ्यास के लिए समर्थ होता है तथा सूक्ष्म मानस अनुभूतियों का उदय होने पर उसके वेग का धारण कर सकता है।¹ हठयोग के ग्रन्थों में प्राणायाम का विशेष विवरण द्रष्टव्य है। सामान्यतः कहा जा सकता है कि बाह्य वायु का प्रयत्नविशेष से ग्रहण करना पूरक है। पूरित वायु का बन्ध- पूर्वक निरोध करना कुम्भक ( कुम्भ शब्द भी प्रयुक्त होता है ) है । कुम्भक के १. द्र० यथेष्टं धारणं वायोरनलस्य प्रदीपनम् । नादाभिव्यक्तिरारोग्यं भवेन् नाडीविशोधनात् ।। ( काशीखण्ड ); यदा नाडीविशुद्धिः स्यात् तदा चिह्नानि योगिनः । जायन्ते यानि देहे वै तानि मे गदतः शृणु । शरीर- लघुता दीप्तिर्जठराग्निविवर्धनम् । कृशत्वं च शरीरस्य तदा जायेत निश्चितम् ॥ ( दत्तात्रेय ) ।

( ५ ) बाद प्रयत्न-विशेष से वायु का रेचन (=बहिर्निःसारण ) रेचक है। पूरणादि नाना प्रकार से किये जाते हैं। योग में नाडियों की संख्या ७२००० मानी गई है ( ह० यो० प्र० १-३९; ३।२३ ) तथा ज्ञानसंकलिनी-तन्त्र ७७। इस मत का मूल श्रुति में है ( प्रश्न० ३।६ ) । ये नाडियाँ हृदय से सर्वतोगामी होकर पूरे शरीर में व्याप्त रहती हैं। आहत (=अभिघात से उत्पन्न ) न होने के कारण यह ध्वनि 'अनाहतनाद' कहलाता है। यह प्रधानतः अनाहत चक्र में उदित होता है। पहले पहल यह दक्षिणकर्ण में सुना जाता है ( ऐसा ही प्रतीत होता है ); बाद में पूरे शरीर में ऊर्ध्वगतिमान् धारा की तरह ज्ञात होता है ! इस अनाहत के द्वारा ही कुण्डलिनी को ब्रह्मरन्ध्र में लाया जाता है। नाद यहाँ बिन्दुरूप से परिणत होता है—ऐसा योगियों का कहना है। ( द्र० घेरण्डसंहिता उप० ५ )। नादानुसन्धान नमोऽस्तु तुभ्यं त्वां मन्महे तत्त्वपदं लयानाम्¹। भवत्प्रसादात् पवनेन साकं विलीयते विष्णुपदे मनो मे ॥४॥ [ १. त्वां साधनं तत्त्वपदस्य जाने ( पाठा० )—अर्थात् तुम तत्त्वपद का साधन हो—ऐसा मैं जानता हूँ ] अनुवाद—हे नादानुसन्धान, तुम्हे नमस्कार है। लयों में तुम ही तत्त्व- पद हो—ऐसा हम समझते हैं। तुम्हारी प्रसन्नता ( =स्वच्छता, निर्मलता) होने पर वायु (=प्राणवायु) के साथ मेरा मन विष्णुपद में विलीन होता है। व्याख्या—नादानुसन्धान के लिए ह० यो० प्र० ४।६६-६८ तथा घेरण्ड- संहिता उप० ५ द्रष्टव्य है। इसका निकट सम्बन्ध राजयोग से है। चित्तलय में

( ६ ) नाद की हेतुता योगशास्त्र में स्पष्टतया कथित हुई है । ( द्र० ह० यो० प्र० ४।८१, ४।९८ ) । तत्त्वपदं लयानाम्—तत्त्वरूप जो पद वह तत्त्वपद । तत्त्व=वस्तु का अना- रोपित रूप¹ । पद = योगियों द्वारा गम्य ( पद्यते गम्यते योगिभिः ) । 'प्राणवायु के साथ मन का विष्णुपद में लीन होना' हठयोग का प्रसिद्ध मत है—यन्मनो विलयं याति तद् विष्णोः परमं पदम् (घेरण्ड० ५।८२); ह० यो० प्र० ४।२९ में प्राण और मन के लय के विषय से सम्बन्धित कार्यकारणपरम्परा कही गई है । 'जालन्धरौड्ड्यानकमूलबन्धान् जल्पन्ति कण्ठोदरपायुमूले² । बन्धत्रयेऽस्मिन् परिचीयमाने बन्धः कुतो दारुणकालपाशैः ॥५॥ [ १. जालन्धरोड्डयन ( पाठा० ) इस पाठ में छन्दोभङ्ग होता है । [L1

( ७ ) अनुवाद—(योगीगण) कहते हैं कि कण्ठ, उदर और पायुमूल में (यथाक्रम जालन्धरबन्ध, ओड्ड्यानबन्ध एवं मूलबन्ध का अभ्यास करना चाहिये । ये तीन बन्ध यदि भलीभाँति ज्ञात (अर्थात् अनुष्ठित हो तो दुःखदायी कालपाश के द्वारा बन्धन कैसे हो सकता है ? (अर्थात् बन्धन नहीं हो सकता) ? व्याख्या—श्लोकगत ओड्ड्यानक ( जालन्धर + ओड्ड्यानक ) शब्द जिस बन्ध को कहता है उसके नाम में एकरूपता नहीं मिलती । ह० यो० प्र० २।४५ में उड्डियानक शब्द है ('क' स्वार्थ में तद्धित प्रत्यय है ) । प्रस्तुत ग्रन्थ के श्लोक ६ में उड्डीन या ओड्ड्यान शब्द है। कहीं कहीं उड्डीयन और उड्डीयान' शब्द प्रयुक्त हुये हैं । यह निश्चित है कि यह शब्द 'उद् + डी (ङ्)' से निष्पन्न है; इसका 'उड्डियान' रूप ही संगत प्रतीत होता है । उड्डियान का नामान्तर 'आकर्षणबन्ध' है । उड्डीयान--तस्मादुड्डीनाख्योऽयम्-ह० यो० प्र० ३।५५—ज्योत्स्ना-- 'उत्पूर्वात् डीङ् विहायसा गतौ इत्यस्मात् करणे ल्युट्' । पर इस नियम से उद् + डी + अन ( ल्युट् ) = उड्डयन' होगा, उड्डीयन' ( ३।५५ में प्रयुक्त ) नहीं होगा । अतः उड्डीयन शब्द के लिए पृथक् प्रयत्न करना होगा । ह० यो० प्र० ३।५६-उड्डीनं कुरुते यस्मात्...उड्डीयानं तदेव स्यात् । उड्डीन शब्द कर्णपर्व ४१।२६ में प्रयुक्त है तथा व्याकरणग्रन्थ में भी है ( द्र० काश० धातु० १।५५९ ) । उड्डियान—इसके बहुत प्रयोग हैं । (ह० यो० प्र० ३।७४; २।४५ (उड्डियानक); २।४७ टीका ( उड्डियान ) । योगशास्त्र में नाना प्रकार के बन्ध कहे गये हैं, जिनमें जालन्धर ( नामान्तर कण्ठमुद्रा, ) उड्डियान तथा मूल प्रसिद्धतम हैं । इनके विवरण के लिए ह० यो० प्र०, घेरण्डसंहिता आदि द्रष्टव्य हैं । कालपाश--कालरूपी पाश; पाश वह जिससे किसको बाँधा जा सके । द्र० ह० यो० प्र० ३।२४ ( कालपाशमहाबन्ध.... ) ।

( ८ ) ओड्ड्यान¹-जालन्धर-मूलवन्धै रुन्निद्रितायामुरगाङ्गनायाम् । प्रत्यङ्मुखत्वात् प्रविशन् सुषुम्नां गमागमां मुञ्चति गन्धवाहः२ ॥६॥ [ १. उड्डीन० ( पाठ० ) । २. योगचिन्तामणि में यह श्लोक ( उड्डीन- जाल••••प्रत्यग् विमुञ्चन•••• ) नन्दिकेश्वरकृत-तारावली ग्रन्थ के नाम से उद्धृत किया गया है (पृ० १५) । ] अनुवाद—ओड्ड्यान (= उड़्डियान), जालन्धर तथा मूल नामक बन्धों के द्वारा भुजगी ( = सर्पाकृति कुलकुण्डली ) के जागरित होने पर गन्धवाहक अर्थात् वायु प्रत्यङ्मुख (= अधोमुख) होकर सुषुम्ना में प्रविष्ट होता है और गमन-आगमन-क्रिया को छोड़ देता दे (अर्थात् निश्चल हो जाता है) । व्याख्या—वायु की प्रत्यङ्मुखगति को कभी-कभी पराङ्मुख गति भी कहा जाता है ( ज्योत्स्नाटीका ३।३७ ) । मूलाधार को सुषुम्नामुख माना जाता है—सुषुम्नामुखं मूलाधार एवोक्तम ( योगचिन्ता०, पृ० १११ ) । चूंकि कुण्डली, कुण्डलिनी या कुलकुण्डलिनी सर्पाकृतिवाली मानी गई है अतः 'उरग-अङ्गना' ( सर्पस्त्री, सर्पकन्या ) शब्द प्रयुक्त हुआ है । प्राणवायु का अधोमुख गमन ह० यो० प्र० १।४८ में कथित हुआ है । ( पूरितं न्यञ्चन् प्राणम; द्र० टीका ) । इस ग्रन्थ में श्लोकोक्त मत का समर्थन मिलता है । ( ३।७४—प्राण का पश्चिमपथ = सुषुम्ना मार्ग में ले जाना ) । 'वायु का सुषुम्ना में प्रवेश' योगियों का अन्यतम महत्त्वपूर्ण अभ्यास है ( ह० यो० प्र० ४।१९ ) । प्राणवायु उपायविशेष से निश्चल होकर रह सकता है । शारीरकभाष्य में इस विषय में एक मार्मिक वाक्य मिलता है—यथा च लोके प्राणापानादिषु

( ९ ) प्राणभेदेषु प्राणायामेन निरुद्धेषु कारणमात्रेण रूपेण वर्तमानेषु जीवनमात्रं कार्यं निर्वर्त्यंते नाकुञ्चन-प्रसारणादिकं कार्यान्तरम् ( २।१।२० ) । उत्थापिताधारहुताशनोल्कैर् आकुञ्चनैः शश्वदपानवायोः¹ । सन्तापिताच्² चन्द्रमसः स्रवन्तीं पीयूषधारां पिबतीह धन्यः॥७॥ [ १. अपानवायौ ( पाठा० )--यह भ्रष्ट पाठ है। सन्तापिते; संप्रापिते ( पाठा० ) ] अनुवाद—अपान वायु का निरन्तर ( बारबार ) आकुञ्चन होने के कारण आधार ( मूलाधार चक्र ) से जो अग्नि की शिखा निर्गत होती है, उससे चन्द्र सन्तापित होता है । इस सन्तापित चन्द्र से क्षरित सुधा का पान जो साधक करता है, वह इस लोक में धन्य है । व्याख्या—मूलाधार-स्थित अग्नि--ह० यो० प्र० ३।६६ से इस अग्नि की सत्ता ज्ञात होती है । यह अग्नि जाठरअग्नि का ही विकसित रूप है (द्र० ज्योत्स्ना- टीका ) । जठराग्नि के इस विकास में समान वायु का पर्याप्त सहयोग रहता है । यही कारण है कि योगी का शरीर जलता हुआ-सा प्रतीत होता है; द्र० समानजयाज् ज्वलनम् ( योगसू० ३।४० ); प्रज्वलन्निव लक्ष्यते योगी ( भास्वती ) । मूलाधारस्थित अग्नि की उल्का ( = शिखा ) का स्पष्ट उल्लेख योगियाज्ञ० १२।१ में मिलता है ( शिखां समालोक्य पावकस्य ) । अपानवायु का जो आकुञ्चन है, वह वस्तुतः मूलाधार का आकुञ्चन है; द्र० अधस्तात् कुञ्चनेनाशु... ( ह० यो० प्र० २।४६ ) । अपानवायु का आकुञ्चन ह० यो० प्र० ३।६२-६३ में उक्त हुआ है ।

( १० ) 'सन्तापित चन्द्र' क्या है—यह श्लोक में नहीं कहा गया। चन्द्र या सोम ( शरीरस्थ ) का उल्लेख हठयोग-ग्रन्थों में स्पष्ट रूप से मिलता है। मुख्य चन्द्र सहस्रारपद्म में स्थित है। इसके अतिरिक्त अन्यत्र भी चन्द्रस्थिति का उल्लेख मिलता है—तालुमूलस्थ चन्द्र ( ह० यो० प्र० ३।७७; योगबीज ५७-५८ ); नासाग्रस्थ चन्द्र ( घेरण्ड० ५।४३ ), भ्रूमध्यस्थ चन्द्र ( ज्योत्स्नाटीका ४।६४ ); हृदयकमलस्थ चन्द्र ( योगियाज्ञ० ९।३५-३६ )। इन चन्द्रों से भी अमृत का क्षरण होता है ( ये सब गौण चन्द्र हैं )। सुधा अमृत या पीयूष के लिए कहीं कहीं 'सार' शब्द भी प्रयुक्त हुआ है ( ह० यो० प्र० ३।४६ )। यह सुधा अग्नि में गिर कर नष्ट हो जाती है। अभ्यास-विशेष से सुधा का पतन बन्द किया जा सकता है। यह सुधापान वस्तुतः पीना रूप क्रिया ( जो लोक में प्रसिद्ध है ) नहीं है--यह धारणा शेष-साध्य है। यही कारण है कि कहीं कहीं 'ध्यायन् चन्द्रमसम्' कहा गया है। इस अमृत का पान करने से कुछ अद्भुत शक्तियाँ प्राप्त होती हैं; इसी दृष्टि में 'धन्य' शब्द का प्रयोग किया गया है। उदाहरणार्थ लम्बिकोर्ध्वस्थितचन्द्ररस का पान करने वालों के प्रति तक्षकनाग का विष भी व्यर्थ हो जाता है ( ह० यो० प्र० ३।४५ )। बन्धत्रयाभ्यासविपाकजातां विवर्जितां रेचक-पूरकाभ्याम् । विशोषयन्तीं¹ विषयप्रवाहं विद्यां भजे केवलकुम्भरूपाम् ॥८॥ [ १. विशोधयन्तीं ( पाठ० ) = विषयप्रवाह की शुद्धिकारिणी ] अनुवाद--उपर्युक्त तीन बन्धों के अभ्यास से उत्पन्न होने वाली केवल कुम्भक रूप विद्या का भजन (=ऐकान्तिक अभ्यास ) मैं करता हूँ। यह केवल कुम्भक रूप विद्या रेचक-पूरक से वर्जित है तथा विषय-प्रवाह की शोषणकारिणी है।

( ११ ) व्याख्या - 'केवल' एक विशेष प्रकार के कुम्भक का नाम है। इस कुम्भक के विषय में यहाँ जो कहा गया है, वह सहेतुक है। वह हेतु है-मनोन्मनी अवस्था के साथ इस कुम्भक का निकटतम सम्बन्ध (द्र० घेरण्ड० ५।६१)। 'केवल' कुम्भक की महत्ता 'केवले कुम्भके सिद्धे किं न सिद्ध्यति भूतले' (घेरण्ड० ५।९६) वाक्य जानी जाती है। हठयोग में 'बन्धत्रय' से मूल-उड्डोयान-जालन्धर नामक तीन बन्ध गृहीत होते हैं (द्र० ह० यो० प्र० १।४२ टीका। यहाँ 'केवल' कुम्भक के विषय में विशिष्ट सूचना दी गई है। पहली बात यह है कि दीर्घकाल पर्यन्त बन्धत्रय का अभ्यास करने के बाद ही इस कुम्भक का अभ्यास करना चाहिये। दूसरी बात यह है कि प्रयत्नपूर्वक रेचक करने के बाद अथवा पूरक करने के बाद यह अनुष्ठेय नहीं-रेचक-पूरक पर ध्यान न देकर इस कुम्भक का अभ्यास किया जाता है - 'रेचकं पूरकं त्यक्त्वा सुखं यद् वायु- धारणम्' यह हठयोगीय वाक्य इस कुम्भक का परिचायक है। यह कुम्भक विषय- प्रवाह का शोषक है अर्थात् विषय-सम्पर्क से इन्द्रिय में जो चाञ्चल्य होता है, वह चाञ्चल्य इस कुम्भक की अवस्था में नहीं होता। 'केवल' कुम्भक के लिए द्र० ह० यो० प्र० २।७२-७४; १।४३। अनाहत चेतसि सावधानेर् अभ्यासशूरै¹रनुभूयमाना । संस्तम्भितश्वासमनःप्रचारा सा जृम्भते केवलकुम्भकश्रीः । ९॥ [१. सूरैः (पाठा०)--यह अपपाठ है] अनुवाद--जब चित्त अनाहत चक्र में स्थिर हो जाता है तब श्वास और मन की क्रियायें स्तम्भित हो जाती हैं। इस अवस्था में 'केवल कुम्भक' का उत्कर्ष प्रकटित होता है। इस उत्कर्ष का अनुभव सावधान अभ्यासदक्ष साधक कर सकते हैं।

२. श्लोक ११-२०: अनहद नाद की चतुर्विध अवस्थाएँ एवं मनोनाश

( १२ ) व्याख्या--'सावधान' और 'अभ्यासशूर'--ये दो साभिप्राय विशेषण हैं । 'अव + धा' का अर्थ होता है--अन्तर्गमन; अतः अवधान का अर्थ होगा--एक- आलम्बन परायणता । 'स्तम्भित अवस्था' नाश की अवस्था नहीं है--यह अच्छी तरह से ज्ञातव्य है । 'प्रचार' का अर्थ है--भ्रमण, गमनागमन, प्रवृत्ति । यहाँ 'क्रिया' अर्थ करना उचित है । केवल कुम्भक में श्वासरोध के साथ-साथ मन का भी रोध होता है--यह ग्रन्थकार का कहना है । प्रकृत बात यह है कि श्वासरोध मनोरोध का अवश्य सहायक होता है--यदि वह रोध वैराग्यादिपूर्वक हो; अन्यथा केवल श्वासरोध पूर्वक मनोरोध योग की दृष्टि में विशेष लाभप्रद नहीं होता । सहस्रशः सन्तु हठेषु कुम्भाः संभाव्यते केवलकुम्भ एव । कुम्भोत्तमे यत्र तु रेचपूरौ प्राणस्य न प्राकृतवैकृताख्यौ ॥१०॥ अनुवाद-हठयोग के ग्रन्थों में यद्यपि सहस्र प्रकार के कुम्भकों का उल्लेख है, तथापि 'केवल' कुम्भक की श्रेष्ठता मानी गई है । कारण यह है कि इस श्रेष्ठ कुम्भक में प्राण ( बाह्य वायु ) के रेचक ( अपर नाम 'प्राकृत' तथा पूरक ( अपर नाम 'वैकृत' ) का अस्तित्व नहीं रहता । व्याख्या--'हठ' शब्द हठयोग को भी कहता है ( हठात् हठयोगात्, ज्योत्स्ना ३।५१ । हठयोग शब्द से हठयोग-ग्रन्थ या हठयोगसंप्रदाय रूप अर्थ लेना असंगत नहीं है । 'हठेषु' में जो बहुवचन है उसकी संगति इस दृष्टि से हो जाती है । 'संभाव्यते' में जो 'सम् + भू' धातु है उससे गौरव या समादर का अतिशय होना ज्ञापित होता है ।

( १३ ) चूंकि हठ का लक्षण है—प्राणापांनयोरैक्यलक्षणः प्राणायामो हठयोगः ( ह० यो० प्र० १।१ की टीका ), इसलिये हठशास्त्र में कुम्भक की नियत सत्ता स्वाभाविक रुप से स्वीकार्य होता है । प्राणायाम के भेद से कुम्भक के भेद होते हैं ( हठयोग में प्राणायाम के सूर्यभेद आदि आठ भेद इसी दृष्टि से होते हैं ); अतः आठ प्रकार के कुम्भक हुये (द्र० घेरण्ड० ५।१६ 'अष्ट कुम्भकाः' ) । प्रसंगतः यह ज्ञातव्य है कि देवल ने सात प्रकार का कुम्भक माना है ( द्र० योगचिन्ता० पृ० १८ ) । त्रिकूटनाम्नि स्तिमितेऽन्तरङ्गे खे स्तम्भिते केवलकुम्भकेन¹ । प्राणानिलो भानु-शशाङ्क नाड्यो विहाय सद्यो वलयं प्रयाति ॥११॥ [ १. त्रिकूटनाम्नि तिमिरेऽन्तरे खे स्तम्भं गते केवलकुम्भ एव (पाठा०) । इसका अर्थ है—आन्तर शून्य में स्थित त्रिकूट नामक तिमिर में वायु के स्तम्भित ( कुम्भक के द्वारा ) होने पर 'केवल' कुम्भक वर्तमान रहता है । यह अर्थ कुछ अस्पष्ट है । ] अनुवाद--त्रिकूट नामक अन्तःस्थित शून्य देश जब केवल कुम्भक के द्वारा स्तम्भित हो जाता है, तब प्राणवायु सूर्यनाडी ( पिङ्गला ) और चन्द्रनाडी (इडा) को छोड़कर तत्काल ही लीन हो जाता है । व्याख्या--त्रिकूट नामक आन्तर शून्य देश चक्रविशेष है, लयोपयोगी नौ चक्रों के विवरण में इसका उल्लेख मिलता है—ब्रह्मचक्र ( मूलाधार में ), स्वाधिष्ठानचक्र, नाभिचक्र, हृच्चक्र, कण्ठ-चक्र, तालुचक्र ( घण्टिकामूल ), भ्रूचक्र, निर्वाणचक्र ( ब्रह्मरन्ध्र में ), त्रिकूटचक्र ( यह ब्रह्मचक्र के ऊपर है; पूर्णगिरि के पृष्ठ में ) ( द्र० योगचिन्ता० पृ० १२०-१२१; सौभाग्यलक्ष्मी-

( १४ ) उप० ३।१-९) । नाथयोग में इन नौ चक्रों की विशेष चर्चा है ( सिद्ध- सिद्धान्त-पद्धति, द्वितीय उपदेश; शान्तिपर्व ३१६।११ टीका । १ ब्रह्मबिन्दु- उपनिषद् में भी त्रिकूट का उल्लेख है ( ७० ) । यह तीन नाडियों का संयोगस्थल भ्रूमध्य है । उपर्युक्त त्रिकूट इससे भिन्न है । प्राणालय = प्राणका स्थैर्य अर्थात् गति का अभाव । प्राण जब तक ब्रह्मरन्ध्र में नहीं पहुँचता है तब तक यह लय संभव नहीं होता ( द्र० ज्योत्स्नाटीका ३।७५ ) । प्रत्याहतः केवलकुम्भकेन प्रबुद्ध१कुण्डल्युपभुक्तशेषः । प्राणः प्रतीचीनपथेन मन्दं विलीयते विष्णुपदान्तराले २ ॥१२॥ [ १. प्रभुक्तकुण्डल्यु.... ( पाठा० ); कुण्डली के प्रभुक्त विशेषण का कोई सार्थक्य प्रतीत नहीं होता । २. विष्णुपदे मनो मे ( पाठा० ) — इस पाठ को मानने पर 'विलीयते' क्रिया के दो कर्ता ( प्राण तथा मन ) मानने होंगे, जो अनुचित है । ] अनुवाद—प्रबुद्ध ( = जागरित ) कुलकुण्डलिनी के द्वारा उपभोग के बाद प्राण का जो अंश अवशिष्ट रहता है, वह कुम्भक के द्वारा प्रत्याहृत १. यहाँ 'तदुक्तं शिवयोगे' कहकर नौ चक्रों के प्रतिपादक कुछ श्लोक उद्धृत किये गये हैं । शान्तिपर्व के श्लोक में 'द्वादशैव तु चोदनाः' कहा गया है । इन १२ चोदनाओं की व्याख्या नीलकण्ठ इस प्रकार करते हैं— ( नवचक्र विवरण के बाद ) "एता नव चोदना वायुनिग्रहगर्भाताः । ततः शून्यात् परं समष्टिकार्ये मनो धारयेत् ततः कारणे ततो निष्कले इति तिस्र इति द्वादश चोदनाः" ।

( १५ ) ( = संयत ) होकर प्रतीचीन मार्ग ( = अधोमार्ग ) से धीरे-धीरे विष्णु के दो पदों के अन्तराल में ( = विष्णुपद में ) लीन हो जाता है । व्याख्या--हठयोग के ग्रन्थों में 'प्राण का विष्णुपद में लय होना' कहा गया है--समीरणे विष्णुपदे निविष्टे (योगियाज्ञ० १२।२९ । इसी प्रकार मन का ( सप्राण मन का ) विष्णुपद में लय भी कहा गया है--मनस्तत्र लयं याति तद्विष्णोः परमं पदम् ( ह० यो० प्र० ४।१०० । परवैराग्य के द्वारा मन का वृत्तिशून्य होकर संस्कारशेष अवस्था में रहना ही मन का यह लय है । अनाहतध्वनि, ज्योतिर्धारणा मनोलय एवं विष्णु के परमपद के विषय में घेरण्डसंहिता का यह कथन साधकों के लिए परम उपादेय है--ध्वनेरन्तर्गत ज्योतिर् ज्योतिरन्तर्गतं मनः । तन्मनो विलयं याति तद् विष्णोः परमं पदम् ।। ( ५।८२ ) । निरङ्कुशानां श्वसनोद्गमानां निरोधनैः केवलकुम्भकाख्यैः । उदेति सर्वेन्द्रियवृत्तिशून्यो मरुल्लयः कोऽपि महामतीनाम् ॥१३॥ [ स्वप्नोद ( पाठ० )--यह भ्रष्ट पाठ है । ] अनुवाद- केवल कुम्भक के द्वारा श्वासवायु की अबाध ऊर्ध्वगति के जो बहुविध निरोध होते हैं, उनसे महामतियों ( = प्रज्ञावान् योगियों ) में जो अनिर्वचनीय वायुलय उद्भूत होता है, वह सभी इन्द्रियवृत्तियों से शून्य है । व्याख्या--'निरोधन' शब्द में जो बहुवचन है उससे ज्ञात होता है कि निरोध के अवान्तर भेद हैं ( ये भेद कुम्भक द्वारा कृत होते हैं ) । बाह्य दृष्टि से ( अर्थात् शारीरिक लक्षणों से ) ये भेद जाने नहीं जा सकते ।

( १६ ) श्वसन = वायु = श्वासक्रिया-संबद्ध वायु । साधारण लोगों में इस वायु पर कोई वशीकार देखा नहीं जाता; यही वायु की निरङ्कुशता है । इन्द्रियवृत्ति-शून्य मरुत् ( = प्राणवायु ) का लय अर्थात् पञ्च प्राणों की सर्वविध क्रियाओं का न होना । इस अवस्था में शरीर जीवित ही रहता है, यद्यपि बाह्यदृष्टि से ( अर्थात् चिकित्साशास्त्र की दृष्टि से ) मृत प्रतीत होता है । निरोध चूँकि सात्त्विकता, निरायास तथा सुखपूर्वक होता है, अतः रोधकाल में शरीर धातुयें विकृत नहीं हो जातीं; वे स्तम्भित अवस्था (suspended animation) की स्थिति में रहती हैं । न दृष्टिलक्ष्याणि न चित्तबन्धो न देशकालौ न च वातुरोधः । न धारणाध्यानपरिश्रमो वा समेधमाने सति राजयोगे ।। १४।। अनुवाद--राजयोग जब सम्यक् रूप से विकसित हो जाता है तब न लक्ष्यों पर दृष्टियों को स्थिर रखना पड़ता है ( अर्थात् स्थिर रखने की चेष्टा नहीं करनी पड़ती ), न चित्तबन्ध की आवश्यकता रहती है, न वायुरोध की आवश्यकता रहती है और न धारणा एवं ध्यान के लिए श्रम करना पड़ता है । व्याख्या--'दृष्टियों' का विवरण हठशास्त्र में मिलता है । न देशकालौ—देश और काल से इसका तात्पर्य नहीं है । योगसूत्र (२।५०) में जो देशकालपरिदृष्टि कही गई है, वही इसका लक्ष्य है । राजयोग—योगसूत्र (१।१८) का जो असंज्ञात योग है ( जिसमें वृत्तियां पूर्णतः नहीं रहतीं; केवल संस्कार रहता है ) वही राजयोग है—यह कई आचार्यों का कहना है—असंप्रज्ञातो निरालम्बो निर्बीजो राजयोगो निरोधश्चेते असंप्रज्ञातस्य प्रसिद्धाः पर्यायाः ( ज्योत्स्नाटीका ४।७) । 'निर्विकल्प' शब्द भी

२ ( १७ ) इस प्रसंग में प्रयुक्त होता है—वृत्त्यन्तर-निरोधपूर्वक--आत्मगोचरधारावाहिक- निर्विकल्पकवृत्ती राजयोगः (ज्योत्स्ना ३।१२६); अयं निर्बीज इति, निर्विकल्प इति, निरालम्ब इति, राजयोग इति चोच्यते (योगचिन्ता०, पृ० ६) । चूँकि इस अवस्था में आत्मगोचर धारावाहिक निर्विकल्पक वृत्ति रहती है, अतः 'चित्तस्य एकाग्रतैव राजयोगः' कहा गया है (ज्योत्स्नाटीका ४।७७) । यह तुर्यावस्था- नामक है (ज्योत्स्ना ४।८०) । राजयोग की सिद्धि के लिए हठ-लय-मन्त्र रूप तीन योग हैं—यह योगियों का कहना है (ह० यो० प्र० ४।१०३) । अशेष¹दृश्योज्झितदृङ्मयानाम् अवस्थितानामिह राजयोगे । न जागरो नापि सुषुप्तिभावो न जीवितं नो मरणं विचित्रम्² ॥१५॥ [ १. अशेषदृश्योर्जितदृग्जयानां ( पाठ० )--'अशेषदृश्योर्जितदृग्जय = अशेषदृश्य के द्वारा ऊर्जित जो दृक् (= आत्मा, द्रष्टा), उसकी जय'--इस अर्थ की कोई भी संगति नहीं है। ऊर्जित = शक्तिशाली, प्रबल, प्रशस्यतर, विशिष्ट । 'अशेषदृश्योर्जित दृग्जय है जिनकी वे—यह अर्थ भी संगत प्रतीत नहीं होता । २. मरणं न चित्तम् (पाठ०)--न मरण और न चित्त ही रहता है । ] अनुवाद--जो राजयोग में अवस्थित होते हैं वे अशेष दृश्य के परिहार होने के कारण ब्रह्ममय हो जाते हैं। इनमें न जाग्रत अवस्था और न सुषुप्ति अवस्था होती है; न जीवन होता है और न मरण । यह एक विचित्र स्थिति है । अहं-ममत्वादि विधाय सर्वं श्रीराजयोगे स्थिरमानसानाम् ।

( १८ ) न द्रष्टा¹नास्ति च दृश्यभावः सा जृम्भते केवलसंविदेव ॥१६॥ [ १. दृश्यता (पाठा०)--यह पाठ असंगत है क्योंकि दृश्यता और दृश्य-भाव ( जो शब्द यहाँ प्रयुक्त हुआ है ) एक ही पदार्थ है । ] अनुवाद--जो अहंकार और ममत्व की बुद्धि का त्याग करके महान् राजयोग में स्थिरचित्त हो चुके हैं, ऐसे लोगों में दर्शक-भाव तथा दृश्य- भाव नहीं रहते; ( उस अवस्था में ) केवल संविद् ( ज्ञानमात्र ) प्रकाशित होती है । व्याख्या--श्रीयुक्तराजयोग = श्रीराजयोग । 'श्री' का प्रयोग करके राज- योग की गौरवित-महिमान्वित स्थिति दिखाई गई है । 'श्री' का ऐसा प्रयोग शाम्भवी मुद्रा के साथ भी देखा जाता है ( श्री शाम्भव्या, ह० यो० प्र० ४।३८ ) । ममत्व--'ममता' शब्द पर भास्कर कहते हैं--ममशब्दो विभक्ति- प्रतिरूपकमव्ययं ममेदमित्याकारकबुद्धिपरम् । सा च भेदघटितसंबन्धं स्वःसतो विषयी करोति ( ललितासहस्रनामभाष्य, पृ० ६४ ) । नेत्रे ययो¹न्मेषनिमेषशून्ये वायुर्यया²वर्जितरेच-पूरः । मनश्च संकल्पविकल्पशून्यं मनोन्मनी सा मयि सन्निधत्ताम्³ ॥१७॥ [ १. यथोन्मेष (पाठा०)--यह पाठ असंगत है क्योंकि 'तया' शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है । २. यथा (पाठा०) पूर्ववत् असंगत । श्लोक में उपमा देने का कोई आग्रह नहीं है--यह द्रष्टव्य है ।

( १९ ) ३. शाक्त भास्कर ने इस श्लोक को ‘योगशास्त्रे मुद्राविशेषस्य संज्ञा’ कहकर उद्धृत किया है ( निमेषमुक्ते-पाठ है; पृ० ६८ ) । ] अनुवाद--जिस मनोन्मनी अवस्था ( मन का उन्मनीभाव ) के द्वारा ( अर्थात् जिसका अधिगम होने के कारण ) दोनो नेत्र उन्मेष-निमेष-हीन हो जाते हैं, रेचक और पूरक रूप वायु ( वायुक्रिया ) स्तब्ध हो जाता है तथा मन भी संकल्प एवं विकल्प से रहित हो जाता है वह ( उन्मनी भाव ) मुझमें आविर्भूत हो । व्याख्या-‘यया’ का संबन्ध ‘मनोन्मन्या’ से है ( चतुर्थ चरण में मनोन्मनी शब्द है । ) मनोन्मनी की स्थिति का आविर्भाव होने पर योगी के नेत्र, प्राणवायु और मन किस स्थिति में रहते हैं - यह यहाँ दिखाया गया है । उन्मेष = पक्ष्मसंयोग का विश्लेष--आँख का खोलना । निमेष = अक्षि- पक्ष्म का संयोग ( आँख का मूँदना ) ( ज्योत्स्नाटीका ४।३६ ) । ‘रेचक-पूरकहीन वायु’ का तात्पर्य उस अवस्था से है जिसमें श्वासक्रिया पूर्णतः अवरुद्ध हो जाती है, पर प्राणी जीवित रहता है क्योंकि निरोधबल का क्षय होने पर प्राणी व्युत्थित होता है । विकल्प को प्रायः संशय कहा जाता है ( प्रश्नोप० ६।६ भा० ) । मनोन्मनी--प्राणवायु का सुषुम्नामध्य में संचार होने पर मन का सम्यक् स्थैर्य ( = अभीष्ट ध्येयाकारवृत्तिमात्र का प्रवाह ) होता है । मन का यह स्थिरीभवन ही ‘मनोन्मनी’ कहलाता है ( ह० यो० प्र० २।४२; ४।२०) । मन का उन्मन होना = मन के द्वारा विषयमनन न होना । मनोन्मनी के लिए कभी कभी उन्मनी शब्द भी प्रयुक्त होता है । इसको ‘तुर्यावस्था’ भी कहा जाता है ( ज्योत्स्नाटीका ४।६४ ) । समल शरीर में यह अवस्था होती नहीं है । उन्मनी के लिए ह० यो० प्र० ४।८०, १०४, १०६; ब्रह्मबिन्दु ४; उत्तरगीता २।४९ द्र० । चित्तेन्द्रियाणां चिरनिग्रहेण श्वासप्रचारे शमिते यमीन्द्राः’ :

( २० ) निवात²दीपा इव निश्चलाङ्गा³ मनोन्मनी-मग्नधियो भवन्ति⁴॥१७॥ [ १. समस्ते (पाठ०) अर्थात् समस्ते श्वासप्रचारे। इस पाठ में 'भवन्ति' क्रिया का कोई विशेष्य-कर्ता-नहीं रह जाता तथा 'निश्चलाङ्गाः' विशेषण के साथ 'योगिनः' का अध्याहार करना पड़ता है। २. निर्वाति (पाठ०)। ३. निवातदीपैरिव निश्चलाङ्गैः (पाठ०)—निवात दीपों की तरह निश्चलअङ्गों के द्वारा। यह अर्थ हो सकता है, पर बहुत संगत नहीं जंचता। ४. मनोन्मनी सा मयि सन्निधत्ताम् (पाठ०)। इस पाठ में अर्थ संगत नहीं होता। यह वाक्य १७ वें श्लोक का चतुर्थ चरण है। लिपिकर के अनवधान से यह अंश यहाँ पुनः लिखित हो गया है—ऐसा प्रतीत होता है।] अनुवाद -चित्त और इन्द्रिय के दीर्घकालीन निग्रह के कारण श्वास- क्रिया निरुद्ध हो जाती है। ऐसी स्थिति में श्रेष्ठ योगी निवातस्थ दीपों की तरह निश्चलाङ्ग हो जाते हैं तथा उनकी बुद्धि मनोन्मनी-नामक अवस्था में मग्न हो जाती है। व्याख्या—'चिरनिग्रह' अर्थात् दीर्घकालव्यापी निरोध। निरोध में क्रम- विकास देखा जाता है (तुल० योगो हि प्रभवाप्ययौ, कठ० २।३।११)। निरोध संस्कार की वृद्धि (जो निरोधजनक क्रिया बार-बार करने से होता है) से निरोध-अवस्था की वृद्धि होती है। चित्त का निरोध होने पर श्वास-प्रश्वास स्वतः अवरुद्ध हो जाते हैं—यह जानना चाहिये। यहाँ 'श्वास-प्रचार' से वायु का नासिका द्वारा ग्रहण-त्याग (अर्थात् श्वास-निश्वास) विवक्षित है। श्वास = नासा में बाह्य वायु का प्रवेश; निश्वास = अन्तःस्थित वायु का बहिः निःसारण (ज्योत्स्ना ४।३१; निश्वास