योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)
Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary
आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५ ) बाद प्रयत्न-विशेष से वायु का रेचन (=बहिर्निःसारण ) रेचक है। पूरणादि नाना प्रकार से किये जाते हैं। योग में नाडियों की संख्या ७२००० मानी गई है ( ह० यो० प्र० १-३९; ३।२३ ) तथा ज्ञानसंकलिनी-तन्त्र ७७। इस मत का मूल श्रुति में है ( प्रश्न० ३।६ ) । ये नाडियाँ हृदय से सर्वतोगामी होकर पूरे शरीर में व्याप्त रहती हैं। आहत (=अभिघात से उत्पन्न ) न होने के कारण यह ध्वनि 'अनाहतनाद' कहलाता है। यह प्रधानतः अनाहत चक्र में उदित होता है। पहले पहल यह दक्षिणकर्ण में सुना जाता है ( ऐसा ही प्रतीत होता है ); बाद में पूरे शरीर में ऊर्ध्वगतिमान् धारा की तरह ज्ञात होता है ! इस अनाहत के द्वारा ही कुण्डलिनी को ब्रह्मरन्ध्र में लाया जाता है। नाद यहाँ बिन्दुरूप से परिणत होता है—ऐसा योगियों का कहना है। ( द्र० घेरण्डसंहिता उप० ५ )। नादानुसन्धान नमोऽस्तु तुभ्यं त्वां मन्महे तत्त्वपदं लयानाम्¹। भवत्प्रसादात् पवनेन साकं विलीयते विष्णुपदे मनो मे ॥४॥ [ १. त्वां साधनं तत्त्वपदस्य जाने ( पाठा० )—अर्थात् तुम तत्त्वपद का साधन हो—ऐसा मैं जानता हूँ ] अनुवाद—हे नादानुसन्धान, तुम्हे नमस्कार है। लयों में तुम ही तत्त्व- पद हो—ऐसा हम समझते हैं। तुम्हारी प्रसन्नता ( =स्वच्छता, निर्मलता) होने पर वायु (=प्राणवायु) के साथ मेरा मन विष्णुपद में विलीन होता है। व्याख्या—नादानुसन्धान के लिए ह० यो० प्र० ४।६६-६८ तथा घेरण्ड- संहिता उप० ५ द्रष्टव्य है। इसका निकट सम्बन्ध राजयोग से है। चित्तलय में