भारतकोश
योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary

आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य) द्वारा

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( ६ ) नाद की हेतुता योगशास्त्र में स्पष्टतया कथित हुई है । ( द्र० ह० यो० प्र० ४।८१, ४।९८ ) । तत्त्वपदं लयानाम्—तत्त्वरूप जो पद वह तत्त्वपद । तत्त्व=वस्तु का अना- रोपित रूप¹ । पद = योगियों द्वारा गम्य ( पद्यते गम्यते योगिभिः ) । 'प्राणवायु के साथ मन का विष्णुपद में लीन होना' हठयोग का प्रसिद्ध मत है—यन्मनो विलयं याति तद् विष्णोः परमं पदम् (घेरण्ड० ५।८२); ह० यो० प्र० ४।२९ में प्राण और मन के लय के विषय से सम्बन्धित कार्यकारणपरम्परा कही गई है । 'जालन्धरौड्ड्यानकमूलबन्धान् जल्पन्ति कण्ठोदरपायुमूले² । बन्धत्रयेऽस्मिन् परिचीयमाने बन्धः कुतो दारुणकालपाशैः ॥५॥ [ १. जालन्धरोड्डयन ( पाठा० ) इस पाठ में छन्दोभङ्ग होता है । [L1