योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)
Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary
आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १६ ) श्वसन = वायु = श्वासक्रिया-संबद्ध वायु । साधारण लोगों में इस वायु पर कोई वशीकार देखा नहीं जाता; यही वायु की निरङ्कुशता है । इन्द्रियवृत्ति-शून्य मरुत् ( = प्राणवायु ) का लय अर्थात् पञ्च प्राणों की सर्वविध क्रियाओं का न होना । इस अवस्था में शरीर जीवित ही रहता है, यद्यपि बाह्यदृष्टि से ( अर्थात् चिकित्साशास्त्र की दृष्टि से ) मृत प्रतीत होता है । निरोध चूँकि सात्त्विकता, निरायास तथा सुखपूर्वक होता है, अतः रोधकाल में शरीर धातुयें विकृत नहीं हो जातीं; वे स्तम्भित अवस्था (suspended animation) की स्थिति में रहती हैं । न दृष्टिलक्ष्याणि न चित्तबन्धो न देशकालौ न च वातुरोधः । न धारणाध्यानपरिश्रमो वा समेधमाने सति राजयोगे ।। १४।। अनुवाद--राजयोग जब सम्यक् रूप से विकसित हो जाता है तब न लक्ष्यों पर दृष्टियों को स्थिर रखना पड़ता है ( अर्थात् स्थिर रखने की चेष्टा नहीं करनी पड़ती ), न चित्तबन्ध की आवश्यकता रहती है, न वायुरोध की आवश्यकता रहती है और न धारणा एवं ध्यान के लिए श्रम करना पड़ता है । व्याख्या--'दृष्टियों' का विवरण हठशास्त्र में मिलता है । न देशकालौ—देश और काल से इसका तात्पर्य नहीं है । योगसूत्र (२।५०) में जो देशकालपरिदृष्टि कही गई है, वही इसका लक्ष्य है । राजयोग—योगसूत्र (१।१८) का जो असंज्ञात योग है ( जिसमें वृत्तियां पूर्णतः नहीं रहतीं; केवल संस्कार रहता है ) वही राजयोग है—यह कई आचार्यों का कहना है—असंप्रज्ञातो निरालम्बो निर्बीजो राजयोगो निरोधश्चेते असंप्रज्ञातस्य प्रसिद्धाः पर्यायाः ( ज्योत्स्नाटीका ४।७) । 'निर्विकल्प' शब्द भी