भारतकोश
योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary

आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य) द्वारा

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( १५ ) ( = संयत ) होकर प्रतीचीन मार्ग ( = अधोमार्ग ) से धीरे-धीरे विष्णु के दो पदों के अन्तराल में ( = विष्णुपद में ) लीन हो जाता है । व्याख्या--हठयोग के ग्रन्थों में 'प्राण का विष्णुपद में लय होना' कहा गया है--समीरणे विष्णुपदे निविष्टे (योगियाज्ञ० १२।२९ । इसी प्रकार मन का ( सप्राण मन का ) विष्णुपद में लय भी कहा गया है--मनस्तत्र लयं याति तद्विष्णोः परमं पदम् ( ह० यो० प्र० ४।१०० । परवैराग्य के द्वारा मन का वृत्तिशून्य होकर संस्कारशेष अवस्था में रहना ही मन का यह लय है । अनाहतध्वनि, ज्योतिर्धारणा मनोलय एवं विष्णु के परमपद के विषय में घेरण्डसंहिता का यह कथन साधकों के लिए परम उपादेय है--ध्वनेरन्तर्गत ज्योतिर् ज्योतिरन्तर्गतं मनः । तन्मनो विलयं याति तद् विष्णोः परमं पदम् ।। ( ५।८२ ) । निरङ्कुशानां श्वसनोद्गमानां निरोधनैः केवलकुम्भकाख्यैः । उदेति सर्वेन्द्रियवृत्तिशून्यो मरुल्लयः कोऽपि महामतीनाम् ॥१३॥ [ स्वप्नोद ( पाठ० )--यह भ्रष्ट पाठ है । ] अनुवाद- केवल कुम्भक के द्वारा श्वासवायु की अबाध ऊर्ध्वगति के जो बहुविध निरोध होते हैं, उनसे महामतियों ( = प्रज्ञावान् योगियों ) में जो अनिर्वचनीय वायुलय उद्भूत होता है, वह सभी इन्द्रियवृत्तियों से शून्य है । व्याख्या--'निरोधन' शब्द में जो बहुवचन है उससे ज्ञात होता है कि निरोध के अवान्तर भेद हैं ( ये भेद कुम्भक द्वारा कृत होते हैं ) । बाह्य दृष्टि से ( अर्थात् शारीरिक लक्षणों से ) ये भेद जाने नहीं जा सकते ।