योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)
Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary
आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 31, कुल 52 में से
संदर्भ में पढ़ें२ ( १७ ) इस प्रसंग में प्रयुक्त होता है—वृत्त्यन्तर-निरोधपूर्वक--आत्मगोचरधारावाहिक- निर्विकल्पकवृत्ती राजयोगः (ज्योत्स्ना ३।१२६); अयं निर्बीज इति, निर्विकल्प इति, निरालम्ब इति, राजयोग इति चोच्यते (योगचिन्ता०, पृ० ६) । चूँकि इस अवस्था में आत्मगोचर धारावाहिक निर्विकल्पक वृत्ति रहती है, अतः 'चित्तस्य एकाग्रतैव राजयोगः' कहा गया है (ज्योत्स्नाटीका ४।७७) । यह तुर्यावस्था- नामक है (ज्योत्स्ना ४।८०) । राजयोग की सिद्धि के लिए हठ-लय-मन्त्र रूप तीन योग हैं—यह योगियों का कहना है (ह० यो० प्र० ४।१०३) । अशेष¹दृश्योज्झितदृङ्मयानाम् अवस्थितानामिह राजयोगे । न जागरो नापि सुषुप्तिभावो न जीवितं नो मरणं विचित्रम्² ॥१५॥ [ १. अशेषदृश्योर्जितदृग्जयानां ( पाठ० )--'अशेषदृश्योर्जितदृग्जय = अशेषदृश्य के द्वारा ऊर्जित जो दृक् (= आत्मा, द्रष्टा), उसकी जय'--इस अर्थ की कोई भी संगति नहीं है। ऊर्जित = शक्तिशाली, प्रबल, प्रशस्यतर, विशिष्ट । 'अशेषदृश्योर्जित दृग्जय है जिनकी वे—यह अर्थ भी संगत प्रतीत नहीं होता । २. मरणं न चित्तम् (पाठ०)--न मरण और न चित्त ही रहता है । ] अनुवाद--जो राजयोग में अवस्थित होते हैं वे अशेष दृश्य के परिहार होने के कारण ब्रह्ममय हो जाते हैं। इनमें न जाग्रत अवस्था और न सुषुप्ति अवस्था होती है; न जीवन होता है और न मरण । यह एक विचित्र स्थिति है । अहं-ममत्वादि विधाय सर्वं श्रीराजयोगे स्थिरमानसानाम् ।