योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)
Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary
आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १८ ) न द्रष्टा¹नास्ति च दृश्यभावः सा जृम्भते केवलसंविदेव ॥१६॥ [ १. दृश्यता (पाठा०)--यह पाठ असंगत है क्योंकि दृश्यता और दृश्य-भाव ( जो शब्द यहाँ प्रयुक्त हुआ है ) एक ही पदार्थ है । ] अनुवाद--जो अहंकार और ममत्व की बुद्धि का त्याग करके महान् राजयोग में स्थिरचित्त हो चुके हैं, ऐसे लोगों में दर्शक-भाव तथा दृश्य- भाव नहीं रहते; ( उस अवस्था में ) केवल संविद् ( ज्ञानमात्र ) प्रकाशित होती है । व्याख्या--श्रीयुक्तराजयोग = श्रीराजयोग । 'श्री' का प्रयोग करके राज- योग की गौरवित-महिमान्वित स्थिति दिखाई गई है । 'श्री' का ऐसा प्रयोग शाम्भवी मुद्रा के साथ भी देखा जाता है ( श्री शाम्भव्या, ह० यो० प्र० ४।३८ ) । ममत्व--'ममता' शब्द पर भास्कर कहते हैं--ममशब्दो विभक्ति- प्रतिरूपकमव्ययं ममेदमित्याकारकबुद्धिपरम् । सा च भेदघटितसंबन्धं स्वःसतो विषयी करोति ( ललितासहस्रनामभाष्य, पृ० ६४ ) । नेत्रे ययो¹न्मेषनिमेषशून्ये वायुर्यया²वर्जितरेच-पूरः । मनश्च संकल्पविकल्पशून्यं मनोन्मनी सा मयि सन्निधत्ताम्³ ॥१७॥ [ १. यथोन्मेष (पाठा०)--यह पाठ असंगत है क्योंकि 'तया' शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है । २. यथा (पाठा०) पूर्ववत् असंगत । श्लोक में उपमा देने का कोई आग्रह नहीं है--यह द्रष्टव्य है ।