भारतकोश
योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary

आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

पृष्ठ 33, कुल 52 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 33

( १९ ) ३. शाक्त भास्कर ने इस श्लोक को ‘योगशास्त्रे मुद्राविशेषस्य संज्ञा’ कहकर उद्धृत किया है ( निमेषमुक्ते-पाठ है; पृ० ६८ ) । ] अनुवाद--जिस मनोन्मनी अवस्था ( मन का उन्मनीभाव ) के द्वारा ( अर्थात् जिसका अधिगम होने के कारण ) दोनो नेत्र उन्मेष-निमेष-हीन हो जाते हैं, रेचक और पूरक रूप वायु ( वायुक्रिया ) स्तब्ध हो जाता है तथा मन भी संकल्प एवं विकल्प से रहित हो जाता है वह ( उन्मनी भाव ) मुझमें आविर्भूत हो । व्याख्या-‘यया’ का संबन्ध ‘मनोन्मन्या’ से है ( चतुर्थ चरण में मनोन्मनी शब्द है । ) मनोन्मनी की स्थिति का आविर्भाव होने पर योगी के नेत्र, प्राणवायु और मन किस स्थिति में रहते हैं - यह यहाँ दिखाया गया है । उन्मेष = पक्ष्मसंयोग का विश्लेष--आँख का खोलना । निमेष = अक्षि- पक्ष्म का संयोग ( आँख का मूँदना ) ( ज्योत्स्नाटीका ४।३६ ) । ‘रेचक-पूरकहीन वायु’ का तात्पर्य उस अवस्था से है जिसमें श्वासक्रिया पूर्णतः अवरुद्ध हो जाती है, पर प्राणी जीवित रहता है क्योंकि निरोधबल का क्षय होने पर प्राणी व्युत्थित होता है । विकल्प को प्रायः संशय कहा जाता है ( प्रश्नोप० ६।६ भा० ) । मनोन्मनी--प्राणवायु का सुषुम्नामध्य में संचार होने पर मन का सम्यक् स्थैर्य ( = अभीष्ट ध्येयाकारवृत्तिमात्र का प्रवाह ) होता है । मन का यह स्थिरीभवन ही ‘मनोन्मनी’ कहलाता है ( ह० यो० प्र० २।४२; ४।२०) । मन का उन्मन होना = मन के द्वारा विषयमनन न होना । मनोन्मनी के लिए कभी कभी उन्मनी शब्द भी प्रयुक्त होता है । इसको ‘तुर्यावस्था’ भी कहा जाता है ( ज्योत्स्नाटीका ४।६४ ) । समल शरीर में यह अवस्था होती नहीं है । उन्मनी के लिए ह० यो० प्र० ४।८०, १०४, १०६; ब्रह्मबिन्दु ४; उत्तरगीता २।४९ द्र० । चित्तेन्द्रियाणां चिरनिग्रहेण श्वासप्रचारे शमिते यमीन्द्राः’ :

योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक) · पृष्ठ 33, कुल 52 में से · BharatKosha