भारतकोश
योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary

आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य) द्वारा

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( २२ ) प्रपञ्च शब्द का अर्थ है--विस्तृत दृश्य । इस शब्द से 'प्रतिक्षण-परिणामी अनित्य, सीमाहीन विचित्र विषय' समझा जाता है । उदासीन दृष्टि का अभिप्राय है--आसक्तिहीन अर्थात् राग द्वेष-हीन दृष्टि । 'उद्'-उपसर्ग से ऊर्ध्वभाव द्योतित होता है; यह ऊर्ध्वस्थता तभी सम्भव है जब विषयज्ञाता जीव अपनी सत्ता को विषयसत्ता से पृथक् समझे । इस प्रकार समझना तभी सम्भव होता है जब राग-द्वेष से प्रभावित न होकर प्रपञ्च को देखने की शक्ति हो, प्रपञ्च का ज्ञानपूर्वक व्यवहार करने की सामर्थ्य हो । भ्रू मध्य दृष्टि का अभ्यास इस उदासीन भाव का सहायक है । संकल्प का मूल स्वरूप है--चित्त में कल्पित या स्मृत किसी क्रिया में अस्मिता का प्रयोग । यह सभी कामों( = कामनाओं) का मूल है कामों का उच्छेद संकल्पवर्जन से ही सम्भव है—'संकल्पप्रभवान् कामान् त्यक्त्वा सर्वा- नशेषतः' ( गीता ६।२४ ); 'संकल्पात् कामः संभवति' ( मोक्षकाण्ड पृ. ८१ में उद्धृत हारीत-वाक्य ), 'काम जानामि ते मूलं संकल्पात् किल जायसे'; 'कामं संकल्पवर्जनात्' ( शान्तिपर्व ३०१।५६ ) आदि वाक्य इस प्रसंग में स्मरणीय हैं । रागादि संकल्पनिमित्तक हैं—यह न्यायसूत्र (३।१।२६) में कहा गया है । सूत्र-व्याख्याकारों के अनुसार 'संकल्प' आकाङ्क्षाविशेष, मिथ्याज्ञानविशेष, अशोभन को शोभन समझना रूप कल्पना (जो भ्रम ही है ) है । सावधान = अवधान के साथ । आत्म-विस्मृति न होना, दूसरे शब्दों में 'अपने द्रष्टृ-भाव को लक्ष्य करते रहना' अवधान है। प्रसङ्ग संकल्पपरम्पराणां संछेदने¹ सन्ततसावधानम्² । आलम्बनाशादपचीयमानं³ शनैः शनै शान्तिमुपैति चेतः ॥२०॥ १. संभेदने (पाठ०)--यह पाठ भी संगत है । २. सावधानः ( पाठ० ) । 'सावधानः' पाठ करने पर इस श्लोक के