भारतकोश
योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary

आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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( २३ ) उत्तरार्ध के साथ इसका अन्वय नहीं हो सकता और पूर्वार्ध का वाक्य असंपूर्ण रह जाता है। 'सावधान:' का अन्वय १९ वें श्लोक के उत्तरार्ध के साथ हो सकता है; पर क्या ऐसा करना उचित होगा ? ३. अपनीयमानम् (पाठा०) । 'अपनीयमानं चेतः' कहने का कोई सार्थक्य नहीं है, अतः यह पाठ असंगत है। आलम्बनादावपचीयमाने (पाठा०)— आलम्बनादि के ह्रास या क्षय होने पर। आलम्बन का ग्रहण और त्याग होते हैं; यह त्याग वस्तुतः ह्रास नहीं है, अतः यह पाठ भी संगत नहीं प्रतीत होता । ] अनुवाद-जो चित्त संकल्पों की धारा का बलपूर्वक छेदन करने में निरन्तर सावधान (स्मृतियुक्त) है तथा आलम्बन के नाश के कारण अपचययुक्त क्षयशील (अर्थात् विक्षेपहीन, विषय-लोलताशून्य) है, वह धीरे-धीरे शान्ति को प्राप्त होता है। व्याख्या-शान्त चित्त के विषय में निम्नोक्त श्रौत उपमा द्रष्टव्य है- यथा निरिन्धनो वह्निः स्वयोनावुपशाम्यति । तथा वृत्तिक्षयाच् चित्तं स्वयोनावु- पशाम्यति ॥ (मैत्रायणी आर० ६।३४)। संकल्प-छेदन = संकल्प न करना । निःश्वासलोपैनिभृतैः १ शरीरैर् नेत्राम्बुजैरर्धनिमीलितैश्च २ । आविर्भवन्तीममनस्कमुद्राम् ३ आलोकायामो मुनिपुङ्गवानाम् ॥२१॥ [ १. विधूतैः (पाठा०) । ऐसा प्रतीत होता है कि जब 'निभृतैः' पाठ का सार्थक्य अज्ञात-सा हो गया तब यह पाठ कल्पित किया गया । २. नेत्राञ्जनैरर्धनिमीलितैश्च (पाठा०)। यह पाठ भ्रष्ट है क्योंकि नेत्र का अञ्जन अर्धनिमीलित नहीं हो सकता । ३. आविर्भवन्तीह मनस्कमुद्राम् (पाठा०) । इसका पदच्छेद 'आविर्भवन्ति इह' करने पर कोई संगति नहीं होती । 'आविर्भवन्ती इह' करके पद