योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)
Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary
आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २६ ) का विधारण ( = निर्माण वर्धन, पोषण ) करता है। ये पाँच रूप हैं--प्राण, उदान, व्यान, समान तथा अपान । हठयोग के ग्रन्थों मे इन पांचों की क्रियाओं का विशद विवरण मिलता है। गगनावशेष--गगन=आकाश । आकाश जिस प्रकार अमूर्त तथा बाधाहीन है, यह भाव उसी प्रकार का है--यह अभिप्राय है¹; तुल० शून्य, अतिशून्य, महाशून्य ( ह० यो० प्र० ४।७१-७४ ) । निवर्तयन्तीं निखिलेन्द्रियाणि¹ प्रवर्तयन्तीं परमात्मयोगम् । संविन्मयीं तां सहजामवस्थां कदा गमिष्यामि गतान्यभावः² । २३॥ [ १. निभृतेन्द्रियाणां (पाठ०)--भ्रष्ट पाठ है, क्योंकि षष्ठीविभक्ति का का कोई स्वारस्य नहीं है । २. गतान्यभागः (पाठ०) = गत हुआ है अन्य भाग जिसका, वह ( बहु- व्रीहि) । यह मैं ( अहम् ) का विशेषण है । इस विशेषण की संगति नहीं है । ] अनुवाद—सभी इन्द्रियों को निवृत्त करने वाली, परमात्मयोग की प्रवर्त्तिका तथा संविन्मयी उस सहज अवस्था को कब मैं अन्य भावों को छोड़ कर प्राप्त करूँगा । १. 'आकाश-सदृश' होने पर भी वस्तुतः आकाश की तरह बहुयोजनव्यापी नहीं है। उपमा जिसकी विवक्षा के लिए दी जाती है, उसका ही ग्रहण करना चाहिए द्र०-'आकाशवत् सर्वगतश्च नित्य इत्यपि प्रसिद्धमहत्त्वेन आकाशेन उपमानं क्रियते निरतिशयमहत्त्वाय, नाकाशसमत्वाय । यथेषुरिव सविता धावति इति क्षिप्रगतित्वाय उच्यते, नेषुतुल्यगतित्वाय तद्वत्' ( शारीरकभाष्य २।३।७ ) ।