योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)
Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary
आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २७ ) व्याख्या--परमात्मयोग--परमात्मा के साथ संयोग । 'आत्मयोग' शब्द भी योगग्रन्थों में प्रयुक्त होता है। तुल० अध्यात्मयोग (कठ-उप० १।२।१२) ! योग = चित्त का किसी अभीष्ट पर समाधान ( = समाहित होना ) । प्रत्यग्विमर्शातिशयेन पुंसां प्राचीनसंगेषु¹ पलायितेषु । प्रादुर्भवेत्काचिदजाड्यनिद्रा² प्रपञ्चचिन्तां परिवर्जयन्ती³ ॥२४॥ [ १ प्राचीनगन्धेषु ( पाठ०) । 'संबन्ध' 'सम्पर्क' 'संयोग' अर्थ में गन्ध शब्द का उल्लेख कोशों में मिलता है; पर संग अर्थ में इसका प्रयोग शायद ही कहीं मिलना हो । २ प्रादुर्भवत् क्वापि न जाड्यनिद्रा पाठ०)— भ्रष्ट पाठ । 'क्वापि' की कोई संगति नहीं है । ३. प्रपञ्च एको विलयं प्रयाति ( पाठ०)--यदि यह मूल पाठ हो तो इसे एक स्वतन्त्र वाक्य मानना होगा । प्रपञ्च का 'एक' विशेषण क्यों दिया गया— यह विचारणीय है । प्रपञ्च का विलय होना शास्त्रसंमत है । ] अनुवाद—प्रत्यगात्मसंबन्धी विमर्श के अतिशय के कारण जीवों की प्राक्तन विषयासक्ति हट जाती है ( नष्ट हो जाती है ) । ऐसा होने पर एक प्रकार की अजाड्यनिद्रा का आविर्भाव होता है तो प्रपञ्च विषयक चिन्तन का परित्याग-कारिणी है । अनुवाद--प्रत्यक् ( प्रति + अञ्चधातु + क्विप् प्रत्यय ) शब्द की प्रायेण दो व्याख्यायें की जाती हैं--(१) प्रत्येक वस्तु में अनुस्यूत; (२) विपरीत भाव का ज्ञाता । आत्मा में प्रत्यक् शब्द उपर्युक्त दोनों अर्थों में प्रयुक्त होता है ( यथायोग्य स्थलों में ); कहीं कहीं स्पष्टता के लिए प्रत्यगात्मा या प्रत्यक्- चेतन शब्द भी प्रयुक्त होता है ।