योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)
Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary
आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३१ ) किञ्चिन्न पश्यन्ति--जगत् सत्ता का कोई ज्ञान उनमें नहीं रहता--यह इस वाक्य से जाना जाता है । सिद्धिं तथाविधमनोविलयां समाधौ¹ श्रीशैलशृङ्गकुहरेषु कदोपलप्स्ये² । गात्रं यदा³ मम लताः⁴ परिवेष्टयन्ति कर्णे यदा⁵ विरचयन्ति⁶ खगाश्च नीडम् ॥ २८॥ [ १. समर्थाम् (पाठा०)--इस विशेषण का कोई स्वारस्य नहीं है । २. कदोपलभ्ये पाठा०) । यह भ्रष्ट पाठ है । ३ कदा पाठा०) । इस पाठ में भी अर्थसंगति होती है । २, ३, ४ चरणों में 'कदा' पाठ मानकर 'कब ऐसी ऐसी स्थिति होगी' यह अर्थ किया जा सकता है । ४. गात्रे यथामरलताः पाठा०)--यह अशुद्ध पाठ है । ५. द्र० टि० ३ । ६. विरचन्ति ( पाठा० ) । इस पाठ में छन्दोदोष होता है तथा यह व्याकरणदुष्ट शब्द है । अनुवाद - ( साधक स्वयं को कह रहे हैं ) श्री शैलपर्वत की गुहा में रह कर कब मैं समाधि में मनोलयकारिणी सिद्धि को प्राप्त करूँगा ? जब लतायें मेरे शरीर का वेष्टन करेंगी तथा पक्षियाँ मेरे कान में नीडों का निर्माण करेंगी ( तब उपर्युक्त सिद्धि मुझे प्राप्त होगी ) । व्याख्या-लता द्वारा गात्रवेष्टन तथा कर्ण में नीडनिर्माण--एकासन में दीर्घकाल पर्यन्त निश्चल रूप से अवस्थान करने पर ऐसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है । इतिहासपुराण में ऐसी स्थिति का वर्णन मिलता है ।¹ १. जटाटवीकोटरान्तः कृतनीडाण्डजाश्च ये । १९ । लताप्रतानैः परितो वेष्टितावयवाश्च ये । शस्यानि च प्ररूढानि यदङ्गेषु चिरस्थितिः ॥ ३० (काशीखण्ड अ० २२); द्र० शान्तिपर्व २६१।१३-३७ में वर्णित जाजलि का तपश्चरण ।